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दो पुष्प के लिए तरसती रही साहित्य मनीषी की कुटिया
Unnao
Updated Sat, 13 Sep 2014 05:31 AM IST
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अचलगंज। अंग्रेजों के जमाने में हिंदी में डीलिट की उपाधि पाने वाले साहित्य मनीषी डॉ. बल्देव प्रसाद मिश्र को बैसवारा क्षेत्र ही नहीं उनके पैतृक ग्राम बहुराजमऊ ने ही भुला दिया। शुक्रवार को उनकी जयंती में राजनीतिज्ञों को छोड़िए उनके अपनों ने भी सुधि नहीं ली। उनकी कुटिया उनकी जयंती पर दो पुष्प के लिए तरसती रही।
बहुराजमऊ निवासी पंडित नारायण प्रसाद मिश्र के घर 12 सितंबर 1898 को बलदेव प्रसाद मिश्र का जन्म हुआ था। श्रीमिश्र ने 1921 में एलएलबी करने के बाद 1939 में तुलसी दर्शन में डीलिट की उपाधि प्राप्त की थी। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उनकी विद्वता को देखते हुए भारत सेवक समाज संस्था की केंद्रीय समिति में मनोनीत किया था। श्रीमिश्र नागपुर विद्या पीठ मेें दस वर्षों तक हिंदी विभाग के मानस विभागाध्यक्ष रहे। अखिल भारतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन के तुलसी जयंती समारोह में भी अध्यक्ष रहे। मिश्रजी रायपुर, खरसिया तथा राजनांदगांव नगर पालिकाओं के भी अध्यक्ष रहे। वर्ष 1972 में राजनांदगांव जिले के खुज्जी विधानसभा क्षेत्र से पांचवीं विधानसभा के सदस्य चुने गए। डॉ. मिश्र ने अपने साहित्यिक जीवन में विभिन्न विषयों पर हिंदी की लगभग 90 रचनाओं का सृजन किया। साहित्य मनीषी ने 4 सितंबर 1975 को 78 वर्ष की उम्र में राजनांदगांव की पुरानी सिविल लाइन स्थित मानस भवन में अंतिम सांस ली थी।
हिंदी के समग्र विकास के प्रति समर्पित साहित्यकार को उनकी जयंती पर भी किसी ने याद नहीं किया। गत वर्ष जब अमर उजाला ने इनकी जयंती पर लेख प्रकाशित किया था तो गांव के पूर्व शिक्षक राजकिशोर शुक्ल एवं प्रधान प्रतिनिधि रामबहादुर सिंह उर्फ रामू भदौरिया के दिल में अपने गांव में जन्मे साहित्य मनीषी के प्रति कुछ कर गुजरने की बात कही थी, लेकिन आज उनकी जयंती में गांव में शून्यता दिखाई पड़ रही है।
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झाड़ियों में रखी है प्रतिमा
अचलगंज। साहित्य मनीषी डॉ. बल्देव प्रसाद मिश्र की प्रतिमा पिछले विधानसभा चुनाव के समय मंगवाई गई थी। सफलता न मिलने पर प्रतिमा को बहुराजमऊ गांव में ही झाड़ियों के बीच रखवा दी गई। यह प्रतिमा आज भी उसी स्थान पर रखी हुई है। प्रतिमा मंगाने वाले राजनैतिक व्यक्ति का कहना है कि ग्राम पंचायत की ओर से स्थान न मिलने के कारण प्रतिमा नहीं लग सकी, जबकि गांव के प्रधान प्रतिनिधि रामू भदौरिया, पूर्व शिक्षक अवधबिहारी बाजपेई, राजकिशोर शुक्ला, समाजसेवी सुखदेव सिंह ने श्रीमिश्र के दो मंजिला मकान (अब खंडहर में तब्दील) को स्मारक के रूप में बदलने की मांग जिलाधिकारी से की थी, लेकिन अभी तक कोई सुनवाई नहीं हो सकी है।
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बहुराजमऊ निवासी पंडित नारायण प्रसाद मिश्र के घर 12 सितंबर 1898 को बलदेव प्रसाद मिश्र का जन्म हुआ था। श्रीमिश्र ने 1921 में एलएलबी करने के बाद 1939 में तुलसी दर्शन में डीलिट की उपाधि प्राप्त की थी। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उनकी विद्वता को देखते हुए भारत सेवक समाज संस्था की केंद्रीय समिति में मनोनीत किया था। श्रीमिश्र नागपुर विद्या पीठ मेें दस वर्षों तक हिंदी विभाग के मानस विभागाध्यक्ष रहे। अखिल भारतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन के तुलसी जयंती समारोह में भी अध्यक्ष रहे। मिश्रजी रायपुर, खरसिया तथा राजनांदगांव नगर पालिकाओं के भी अध्यक्ष रहे। वर्ष 1972 में राजनांदगांव जिले के खुज्जी विधानसभा क्षेत्र से पांचवीं विधानसभा के सदस्य चुने गए। डॉ. मिश्र ने अपने साहित्यिक जीवन में विभिन्न विषयों पर हिंदी की लगभग 90 रचनाओं का सृजन किया। साहित्य मनीषी ने 4 सितंबर 1975 को 78 वर्ष की उम्र में राजनांदगांव की पुरानी सिविल लाइन स्थित मानस भवन में अंतिम सांस ली थी।
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हिंदी के समग्र विकास के प्रति समर्पित साहित्यकार को उनकी जयंती पर भी किसी ने याद नहीं किया। गत वर्ष जब अमर उजाला ने इनकी जयंती पर लेख प्रकाशित किया था तो गांव के पूर्व शिक्षक राजकिशोर शुक्ल एवं प्रधान प्रतिनिधि रामबहादुर सिंह उर्फ रामू भदौरिया के दिल में अपने गांव में जन्मे साहित्य मनीषी के प्रति कुछ कर गुजरने की बात कही थी, लेकिन आज उनकी जयंती में गांव में शून्यता दिखाई पड़ रही है।
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झाड़ियों में रखी है प्रतिमा
अचलगंज। साहित्य मनीषी डॉ. बल्देव प्रसाद मिश्र की प्रतिमा पिछले विधानसभा चुनाव के समय मंगवाई गई थी। सफलता न मिलने पर प्रतिमा को बहुराजमऊ गांव में ही झाड़ियों के बीच रखवा दी गई। यह प्रतिमा आज भी उसी स्थान पर रखी हुई है। प्रतिमा मंगाने वाले राजनैतिक व्यक्ति का कहना है कि ग्राम पंचायत की ओर से स्थान न मिलने के कारण प्रतिमा नहीं लग सकी, जबकि गांव के प्रधान प्रतिनिधि रामू भदौरिया, पूर्व शिक्षक अवधबिहारी बाजपेई, राजकिशोर शुक्ला, समाजसेवी सुखदेव सिंह ने श्रीमिश्र के दो मंजिला मकान (अब खंडहर में तब्दील) को स्मारक के रूप में बदलने की मांग जिलाधिकारी से की थी, लेकिन अभी तक कोई सुनवाई नहीं हो सकी है।