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Sultanpur News: महुआ की मीठी खुशबू से महके बागान
Sun, 05 Apr 2026 11:48 PM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, सुल्तानपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, सुल्तानपुर
Updated Sun, 05 Apr 2026 11:48 PM IST
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. धनपतगंज क्षेत्र में महुआ के पेड़ में आया फूल। संवाद
धनपतगंज। गांवों में इन दिनों बागानों में महुआ फूल टपकने की शुरुआत हो चुकी है। वातावरण में घुली इसकी मीठी सुगंध से पूरा इलाका महक उठा है। महुआ फसल की अच्छी आमद से बागान मालिकों के चेहरे खिल गए हैं और उन्हें अतिरिक्त आमदनी की उम्मीद जगी है।
प्रदेश में महुआ लंबे समय से वन उपज के रूप में अपनी खास पहचान बनाए हुए है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में इसका महत्वपूर्ण योगदान है। मार्च माह में महुआ के पेड़ों पर फूल के कूचे तैयार हो जाते हैं, जो परिपक्व होकर रात में जमीन पर गिरते हैं। भोर होते ही ग्रामीण इन्हें इकट्ठा कर धूप में सुखाते हैं।
करीब पखवाड़े भर सुखाने के बाद यह बाजार में बिक्री के लिए तैयार हो जाते हैं। महुआ का उपयोग केवल आय तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे ग्रामीण विभिन्न पारंपरिक व्यंजन जैसे फुलौरी, लप्सी और ठोकवा भी बनाते हैं। स्वास्थ्य के लिए लाभकारी महुआ का उपयोग दवा बनाने में भी होता है। शहर के व्यापारी खरीद कर इसकी आपूर्ति विभिन्न प्रदेशों में करते हैं। दवाओं में उपयोग की वजह से बागान वालों को महुआ से अच्छा मुनाफा मिलता है।
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दोहरी आमदनी का जरिया
हरना गांव निवासी पप्पू तिवारी के अनुसार महुआ को ‘पीला सोना’ कहा जाता है। एक औसत पेड़ से करीब एक क्विंटल तक महुआ फूल प्राप्त होता है। जून माह में इसी पेड़ पर फल (गुल्लू) भी आता है, जिसकी उपज लगभग 40 किलो तक होती है। इससे निकलने वाला तेल दवा और साबुन बनाने में काम आता है।
25-30 रुपये किलो बिक रहा महुआ
वर्तमान में सूखे महुआ का फूल 25 से 30 रुपये प्रति किलो बिक रहा है। इससे किसानों को अच्छी आमदनी हो रही है। सेंचुरी वेलफेयर सोसायटी के विजय तिवारी का कहना है कि अंधाधुंध कटान के कारण पिछले तीन दशकों में महुआ के पेड़ घटकर मात्र 20 प्रतिशत रह गए हैं।
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प्रदेश में महुआ लंबे समय से वन उपज के रूप में अपनी खास पहचान बनाए हुए है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में इसका महत्वपूर्ण योगदान है। मार्च माह में महुआ के पेड़ों पर फूल के कूचे तैयार हो जाते हैं, जो परिपक्व होकर रात में जमीन पर गिरते हैं। भोर होते ही ग्रामीण इन्हें इकट्ठा कर धूप में सुखाते हैं।
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करीब पखवाड़े भर सुखाने के बाद यह बाजार में बिक्री के लिए तैयार हो जाते हैं। महुआ का उपयोग केवल आय तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे ग्रामीण विभिन्न पारंपरिक व्यंजन जैसे फुलौरी, लप्सी और ठोकवा भी बनाते हैं। स्वास्थ्य के लिए लाभकारी महुआ का उपयोग दवा बनाने में भी होता है। शहर के व्यापारी खरीद कर इसकी आपूर्ति विभिन्न प्रदेशों में करते हैं। दवाओं में उपयोग की वजह से बागान वालों को महुआ से अच्छा मुनाफा मिलता है।
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दोहरी आमदनी का जरिया
हरना गांव निवासी पप्पू तिवारी के अनुसार महुआ को ‘पीला सोना’ कहा जाता है। एक औसत पेड़ से करीब एक क्विंटल तक महुआ फूल प्राप्त होता है। जून माह में इसी पेड़ पर फल (गुल्लू) भी आता है, जिसकी उपज लगभग 40 किलो तक होती है। इससे निकलने वाला तेल दवा और साबुन बनाने में काम आता है।
25-30 रुपये किलो बिक रहा महुआ
वर्तमान में सूखे महुआ का फूल 25 से 30 रुपये प्रति किलो बिक रहा है। इससे किसानों को अच्छी आमदनी हो रही है। सेंचुरी वेलफेयर सोसायटी के विजय तिवारी का कहना है कि अंधाधुंध कटान के कारण पिछले तीन दशकों में महुआ के पेड़ घटकर मात्र 20 प्रतिशत रह गए हैं।