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मालखानों में कैद हो गए कई मौतों के राज
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सुल्तानपुर। जिले के 16 थानों के मालखानों में 105 लोगों की मौत के राज कैद होकर रह गए हैं। पोस्टमार्टम के बाद सुरक्षित रखे गए विसरा को पुलिस समय से फोरेंसिक लैब नहीं भेजती। विलंब की वजह से विसरा नष्ट हो जाता है या फिर उसकी जांच निष्प्रभावी हो जाती है। नतीजतन पीड़ित पक्ष को समय पर मुनासिब न्याय नहीं मिल पाता।
जिले में एक जनवरी 2019 से 30 नवंबर 2019 तक कुल 673 लोगों का पोस्टमार्टम किया गया है। इनमें 105 लोगों की मौत का कारण स्पष्ट नहीं होने पर चिकित्सकों ने विसरा सुरक्षित कर संबंधित थाने की पुलिस को सौंप दिया था। पोस्टमार्टम हाउस से जार में कैद मौत का राज लेकर थाने पहुंचने वाली पुलिस उसे मालखाने में रखकर भूल गई।
जिले के 16 थानों की पुलिस ने जिन 105 लोगों का विसरा सुरक्षित रखा है उनमें 82 पुरुष और 23 महिलाओं के शव शामिल हैं। हैरत की बात ये है कि जिले के बड़े अधिकारियों तक को यह पता नहीं कि मौजूदा समय में विसरा कहां रखा जा रहा है।
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हालांकि पुलिस अधिकारी ये दावा जरूर कर रहे हैं कि विसरा को जांच के लिए फोरेंसिक लैब भेजा जाता है। बात दीगर है कि वे यह आंकड़ा नहीं बता सके कि अब तक जांच के लिए कितने विसरा भेजे गए और कितने की रिपोर्ट वापस आई।
पोस्टमार्टम में जिसकी मौत का कारण स्पष्ट नहीं होता, उसके खुलासे के लिए विसरा जांच कराई जाती है। पोस्टमार्टम करने वाले चिकित्सक मानव शरीर से आंत, लीवर, गुर्दे, छोटी आंत को शीशे के जार में सुरक्षित रख देते हैं। ताकि उसकी जांच फोरेंसिक लैब से कराई जा सके।
पुलिस अमूमन संबंधित केस में पोस्टमार्टम रिपोर्ट लगाकर कोर्ट भेज देती है। पुलिस केस में विसरा सुरक्षित रखने की बात भी कहती है, लेकिन उसकी जांच कराने को लेकर गंभीर नहीं होती। नतीजतन सालों तक चलने वाले मुकदमे के दौरान पुलिस जांच रिपोर्ट कोर्ट में पेश नहीं कर पाती। इस वजह से कई बार पीड़ित को समय पर न्याय नहीं मिल पाता।
जिला अस्पताल के सीएमएस डॉ. वीबी सिंह ने बताया कि पोस्टमार्टम के बाद जार में मृतक के लिवर का टुकड़ा, किडनी, स्पलीन (तिल्ली), स्टमक (खाने की थैली), छोटी आंत का टुकड़ा और बड़ी आंत का टुकड़ा सुरक्षित रखा जाता है। विसरा को केमिकल डालकर रखा जाता है। प्रभावी जांच के लिए विसरा को तत्काल फोरेंसिक लैब भेजना चाहिए। ऐसा नहीं होने पर संरक्षित विसरा के टिश्यू नष्ट होने लगते हैं।
सीएमएस डॉ. वीबी सिंह ने बताया कि प्रदेश में तीन फोरेंसिक लैब हैं। इनमें लखनऊ, आगरा और वाराणसी का बीएचयू है। हालांकि सुल्तानपुर के विसरा जांच के लिए लखनऊ की लैब नामित है। ऐसे में यहां से विसरा लखनऊ ही भेजा जाता है।
मौत के रहस्य से पर्दा उठाने के लिए जार में सुरक्षित रखे विसरा की जांच कराने में न ही संबंधित थानाध्यक्ष रुचि लेते हैं और न ही उस सर्किल के सीओ। नियमत: संबंधित थाने की पुलिस ही विसरा को जार में लेकर थाने पहुंचती है। थाने में उसे मालखाने में रखा जाता है। इसके बाद संबंधित थानाध्यक्ष सर्किल के सीओ से अनुमति लेकर विसरा को फोरेंसिक लैब भेजता है। इस छोटी सी प्रक्रिया में पुलिस को लंबा वक्त लग जाता है।
लंभुआ तहसील के गोपीनाथपुर गांव में 29 मई 2018 को मारपीट के दौरान जमीन पर गिरने से अशर्फीलाल की मौत हो गई थी। पुलिस ने केस दर्ज कर शव का पोस्टमार्टम कराया था। मौत का कारण स्पष्ट नहीं होने पर विसरा जांच के लिए सुरक्षित रख लिया गया था। पुलिस ने सुरक्षित विसरा को समय से फोरेंसिक लैब नहीं भेजा था। इसके चलते विसरा नष्ट हो गया था।
बाद में पुलिस ने गैर इरादतन हत्या की धारा हटाकर चार्टशीट दाखिल कर दी थी। मृतक के बेटे बसंत अग्रहरि ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर विसरा नष्ट करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी। इस पर भी कोई कार्रवाई नहीं हुई तो मृतक के पौत्र अभिषेक अग्रहरि ने दोबारा हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी। इस पर हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अख्तियार करते हुए एसआई शशिकांत पटेल के खिलाफ कार्रवाई के लिए प्रमुख सचिव गृह को निर्देश दिया था।
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जिले में एक जनवरी 2019 से 30 नवंबर 2019 तक कुल 673 लोगों का पोस्टमार्टम किया गया है। इनमें 105 लोगों की मौत का कारण स्पष्ट नहीं होने पर चिकित्सकों ने विसरा सुरक्षित कर संबंधित थाने की पुलिस को सौंप दिया था। पोस्टमार्टम हाउस से जार में कैद मौत का राज लेकर थाने पहुंचने वाली पुलिस उसे मालखाने में रखकर भूल गई।
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जिले के 16 थानों की पुलिस ने जिन 105 लोगों का विसरा सुरक्षित रखा है उनमें 82 पुरुष और 23 महिलाओं के शव शामिल हैं। हैरत की बात ये है कि जिले के बड़े अधिकारियों तक को यह पता नहीं कि मौजूदा समय में विसरा कहां रखा जा रहा है।
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हालांकि पुलिस अधिकारी ये दावा जरूर कर रहे हैं कि विसरा को जांच के लिए फोरेंसिक लैब भेजा जाता है। बात दीगर है कि वे यह आंकड़ा नहीं बता सके कि अब तक जांच के लिए कितने विसरा भेजे गए और कितने की रिपोर्ट वापस आई।
पोस्टमार्टम में जिसकी मौत का कारण स्पष्ट नहीं होता, उसके खुलासे के लिए विसरा जांच कराई जाती है। पोस्टमार्टम करने वाले चिकित्सक मानव शरीर से आंत, लीवर, गुर्दे, छोटी आंत को शीशे के जार में सुरक्षित रख देते हैं। ताकि उसकी जांच फोरेंसिक लैब से कराई जा सके।
पुलिस अमूमन संबंधित केस में पोस्टमार्टम रिपोर्ट लगाकर कोर्ट भेज देती है। पुलिस केस में विसरा सुरक्षित रखने की बात भी कहती है, लेकिन उसकी जांच कराने को लेकर गंभीर नहीं होती। नतीजतन सालों तक चलने वाले मुकदमे के दौरान पुलिस जांच रिपोर्ट कोर्ट में पेश नहीं कर पाती। इस वजह से कई बार पीड़ित को समय पर न्याय नहीं मिल पाता।
जिला अस्पताल के सीएमएस डॉ. वीबी सिंह ने बताया कि पोस्टमार्टम के बाद जार में मृतक के लिवर का टुकड़ा, किडनी, स्पलीन (तिल्ली), स्टमक (खाने की थैली), छोटी आंत का टुकड़ा और बड़ी आंत का टुकड़ा सुरक्षित रखा जाता है। विसरा को केमिकल डालकर रखा जाता है। प्रभावी जांच के लिए विसरा को तत्काल फोरेंसिक लैब भेजना चाहिए। ऐसा नहीं होने पर संरक्षित विसरा के टिश्यू नष्ट होने लगते हैं।
सीएमएस डॉ. वीबी सिंह ने बताया कि प्रदेश में तीन फोरेंसिक लैब हैं। इनमें लखनऊ, आगरा और वाराणसी का बीएचयू है। हालांकि सुल्तानपुर के विसरा जांच के लिए लखनऊ की लैब नामित है। ऐसे में यहां से विसरा लखनऊ ही भेजा जाता है।
मौत के रहस्य से पर्दा उठाने के लिए जार में सुरक्षित रखे विसरा की जांच कराने में न ही संबंधित थानाध्यक्ष रुचि लेते हैं और न ही उस सर्किल के सीओ। नियमत: संबंधित थाने की पुलिस ही विसरा को जार में लेकर थाने पहुंचती है। थाने में उसे मालखाने में रखा जाता है। इसके बाद संबंधित थानाध्यक्ष सर्किल के सीओ से अनुमति लेकर विसरा को फोरेंसिक लैब भेजता है। इस छोटी सी प्रक्रिया में पुलिस को लंबा वक्त लग जाता है।
लंभुआ तहसील के गोपीनाथपुर गांव में 29 मई 2018 को मारपीट के दौरान जमीन पर गिरने से अशर्फीलाल की मौत हो गई थी। पुलिस ने केस दर्ज कर शव का पोस्टमार्टम कराया था। मौत का कारण स्पष्ट नहीं होने पर विसरा जांच के लिए सुरक्षित रख लिया गया था। पुलिस ने सुरक्षित विसरा को समय से फोरेंसिक लैब नहीं भेजा था। इसके चलते विसरा नष्ट हो गया था।
बाद में पुलिस ने गैर इरादतन हत्या की धारा हटाकर चार्टशीट दाखिल कर दी थी। मृतक के बेटे बसंत अग्रहरि ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर विसरा नष्ट करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी। इस पर भी कोई कार्रवाई नहीं हुई तो मृतक के पौत्र अभिषेक अग्रहरि ने दोबारा हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी। इस पर हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अख्तियार करते हुए एसआई शशिकांत पटेल के खिलाफ कार्रवाई के लिए प्रमुख सचिव गृह को निर्देश दिया था।