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लॉकडाउन से चौपट हुआ फूलों का कारोबार
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सुल्तानपुर। कोरोना वायरस को लेकर हुए लॉकडाउन ने फूलों का व्यवसाय करने वालों की कमर तोड़ दी है। फूल-मालाओं की खपत वाले धार्मिक स्थलों पर श्रद्धालुओं की आवाजाही ठप है। सड़क से गुजरने वाले वाहनों की रफ्तार पर ब्रेक लग गया है। अप्रैल-मई में होने वाले अधिकतर शादी-विवाह स्थगित हो चुके हैं। ऐसे में इस व्यवसाय से जुड़े माली आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं।
चांदा कस्बे के आसपास कई गांवों में माली बिरादरी के लोग रहते है। इनका मुख्य व्यवसाय फूलों का उत्पादन और बिक्री है। यही जीवनयापन का जरिया भी है। आम तौर पर ये लोग बटाई पर जमीन लेकर फूलों की खेती करते हैं।
परिवार के बच्चे, बूढ़े और महिलाएं मिलकर माला बनाते हैं। आसपास के मंदिरों, बाजारों तथा आने जाने वाले वाहन इनके ग्राहक होते है। सहालग के दिनों में दूल्हे क़ी गाड़ी दुल्हन का कमरे की साज-सज्जा इनके आय का मुख्य स्रोत होता है।
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कोरोना महामारी के चलते देश व्यापी लॉकडाऊन जारी है। इसका खामियाजा हर तबके के लोग भुगत रहे है। बाजार बंद है। गाड़ियों का आना-जाना ठप है। मंदिर के कपाट बंद हैं। मंदिर में भक्तों का आना-जाना भी नहीं हो रहा है। अप्रैल औऱ मई महीने मे होने वाली अधिकतर शादियां स्थगित हो चुकी हैं।
फुटेला के बृजनाथ माली बताते हैं कि बटाई पर ली गई जमीन पर फूल की खेती की थी। एक बीघा भूमि की जोताई, खाद, पौध और सिंचाई पर करीब 40 हजार रुपये खर्च दिए हैं। फूल की फसल भी बहुत अच्छा हुई है लेकिन व्यवसाय का आधार ही छिन गया है।
कुछ समझ में नहीं आ रहा है। आखिर किया क्या जाए। सीताराम माली बताते हैं कि एक बीघा से अधिक भूमि पर गेंदा के फूल की खेती किया हूं। 50 हजार लागत आई है। इस वर्ष सहालग क़ी अच्छी बुकिंग हुई थी। सोचा था कुछ जरूरी काम इस वर्ष निपटा लेंगे लेकिन सब किए कराए पर पानी फिर गया है। कर्ज ऊपर से हो गया है। लगता है अब संभलने में सालों लग जाएंगे।
वसंतलाल बताते हैं मेरे पास खेत नहीं है सिर्फ माला बेच कर छह लोगों का परिवार चलता है। वर्तमान समय में सब बंद है। ऐसे में दो जून की रोटी का संकट खड़ा हो गया है। कोथरा के रामफेर माली बताते हैं कि बाजारों में दुकान-दुकान माला फूल बेच कर घर की गाड़ी चलती है। महीने भर से सब बंद है।
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चांदा कस्बे के आसपास कई गांवों में माली बिरादरी के लोग रहते है। इनका मुख्य व्यवसाय फूलों का उत्पादन और बिक्री है। यही जीवनयापन का जरिया भी है। आम तौर पर ये लोग बटाई पर जमीन लेकर फूलों की खेती करते हैं।
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परिवार के बच्चे, बूढ़े और महिलाएं मिलकर माला बनाते हैं। आसपास के मंदिरों, बाजारों तथा आने जाने वाले वाहन इनके ग्राहक होते है। सहालग के दिनों में दूल्हे क़ी गाड़ी दुल्हन का कमरे की साज-सज्जा इनके आय का मुख्य स्रोत होता है।
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कोरोना महामारी के चलते देश व्यापी लॉकडाऊन जारी है। इसका खामियाजा हर तबके के लोग भुगत रहे है। बाजार बंद है। गाड़ियों का आना-जाना ठप है। मंदिर के कपाट बंद हैं। मंदिर में भक्तों का आना-जाना भी नहीं हो रहा है। अप्रैल औऱ मई महीने मे होने वाली अधिकतर शादियां स्थगित हो चुकी हैं।
फुटेला के बृजनाथ माली बताते हैं कि बटाई पर ली गई जमीन पर फूल की खेती की थी। एक बीघा भूमि की जोताई, खाद, पौध और सिंचाई पर करीब 40 हजार रुपये खर्च दिए हैं। फूल की फसल भी बहुत अच्छा हुई है लेकिन व्यवसाय का आधार ही छिन गया है।
कुछ समझ में नहीं आ रहा है। आखिर किया क्या जाए। सीताराम माली बताते हैं कि एक बीघा से अधिक भूमि पर गेंदा के फूल की खेती किया हूं। 50 हजार लागत आई है। इस वर्ष सहालग क़ी अच्छी बुकिंग हुई थी। सोचा था कुछ जरूरी काम इस वर्ष निपटा लेंगे लेकिन सब किए कराए पर पानी फिर गया है। कर्ज ऊपर से हो गया है। लगता है अब संभलने में सालों लग जाएंगे।
वसंतलाल बताते हैं मेरे पास खेत नहीं है सिर्फ माला बेच कर छह लोगों का परिवार चलता है। वर्तमान समय में सब बंद है। ऐसे में दो जून की रोटी का संकट खड़ा हो गया है। कोथरा के रामफेर माली बताते हैं कि बाजारों में दुकान-दुकान माला फूल बेच कर घर की गाड़ी चलती है। महीने भर से सब बंद है।