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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Sultanpur News ›   Did You Hear? The Stage Was Set, But the Conman Never Showed Up—Read the Tale of 'Netaji's Gift' and the Plea:

सुना है क्या: माहौल बना पर ठग न आ सका, नेताजी का गिफ्ट और 'एक सम्मान हमें भी दे दें' का पढ़ें किस्सा

Sat, 02 May 2026 12:32 PM IST
Akash Dwivedi Akash Dwivedi
Updated Sat, 02 May 2026 12:32 PM IST
सार

यूपी के राजनीतिक गलियारे और प्रशासन में तमाम ऐसे किस्से हैं, जो हैं तो उनके अंदरखाने के... लेकिन, चाहे-अनचाहे बाहर आ ही जाते हैं। ऐसे किस्सों को आप अमर उजाला के "सुना है क्या" सीरीज में पढ़ सकते हैं। तो आइए पढ़ते हैं इस बार क्या है खास...

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Did You Hear? The Stage Was Set, But the Conman Never Showed Up—Read the Tale of 'Netaji's Gift' and the Plea:
सुना है क्या/suna hai kya - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

यूपी के राजनीतिक गलियारे और प्रशासनिक गलियों में आज तीन किस्से काफी चर्चा में रहे। चाहे-अनचाहे आखिर ये बाहर आ ही जाते हैं। इन्हें रोकने की हर कोशिश नाकाम होती है। आज की कड़ी में 'माहौल बना पर ठग न आ सका' की कहानी। इसके अलावा 'नेताजी का गिफ्ट' और 'एक सम्मान हमें भी दे दें' के किस्से भी चर्चा में रहे। आगे पढ़ें, नई कानाफूसी...

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माहौल बना पर ठग न आ सका

हजारों करोड़ रुपये की ठगी कर एक शातिर दुबई में है। रोजाना सोशल मीडिया के जरिये ऑनलाइन मीटिंग कर रहा है। दुबई में एक मामले में वह जेल भी गया। करीब दो महीने पहले इसकी जानकारी हुई तो जांच एजेंसी की सबसे बड़ी अधिकारी ने खूब माहौल बनाया। मुखिया से भी वादा किया कि शातिर को वह भारत लाकर ही रहेंगी। इससे उनका माहौल तो बना लेकिन महाठग वापस नहीं आ सका और वह सेवा पूरी कर सेवानिवृत्त हो गईं।
 

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नेताजी का गिफ्ट

पीडीए वाले नेताजी किसी आगंतुक का जन्मदिन होता है तो उसे गिफ्ट दिया करते हैं। पहले इन अवसरों पर दिए जाने वाला लिफाफा थोड़ा भारी होता था, लेकिन बाद में नेताजी ने अपनी इस परंपरा में थोड़ा बदलाव किया। नेताजी खुद ही बताते हैं कि कई लोग तो भारी लिफाफे की वजह से वर्ष में दो बार जन्मदिन मनाने लगे थे। इसलिए अब जो कुछ देते हैं, उसे लिफाफे में नहीं, बल्कि खुला देते हैं। वजन भी कम कर दिया है।

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एक सम्मान हमें भी दे दें

श्रमिक दिवस पर एक तरफ प्रदेश भर में श्रमिकों के सम्मान की होड़ मची थी तो दूसरी तरफ देश की सर्वोच्च नौकरी कर रहे दो अफसरों का अपना ही दर्द था। शासन के गलियारे में कमरे में बैठे दोनों साहबों ने कहा, 18 घंटे की नौकरी कर रहे हैं। फैमिलीमैन जैसी फीलिंग ही नहीं आती।

कब ऊपर से हौंक दिया जाए...इसकी भी गारंटी नहीं। काम खराब कोई करे लेकिन पेशी के लिए हर वक्त तैयार रहना पड़ता है। इतने में तीसरे साहब आए और बोले...नौकर तो हम भी हैं..बस कोई सम्मान देने वाला नहीं है।

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