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कछुओं की तस्करी का गढ़ बना अमेठी-सुल्तानपुर

Tue, 10 Jan 2017 10:15 PM IST
Amarujala Bureau
Amarujala Bureau Updated Tue, 10 Jan 2017 10:15 PM IST
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Amethi and Sultanpur hub of turtle smuggling
एसटीएफ का दावा, अब तक की सबसे बड़ी बरामदगी - फोटो : अमर उजाला

अमेठी और सुल्तानपुर जिला कछुओं की तस्करी का हब बन गया है। कछुओं की तस्करी के तार पूर्वांचल से लेकर पश्चिम बंगाल तक जुड़े हैं। आसपास के जिलों से कछुए पकड़कर अमेठी और सुल्तानपुर लाए जाते हैं।

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यहां से उन्हें कोलकाता भेजा जाता है। मंगलवार को अमेठी जिले में नौ हजार से अधिक कछुओं की बरामदगी ने पुलिस के कान खड़े कर दिए हैं। कछुओं को देश की सबसे बड़ी बरामदगी का दावा करने वाली एसटीएफ टीम ने भी इसके पीछे किसी बड़े तस्कर का हाथ होने की आशंका जताई है। फिलहाल जिले में अभी तक इसका सरगना पुलिस के हत्थे नहीं चढ़ सका है। 
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कछुआ तस्करों का संजाल पूर्वांचल के जिलों के साथ पश्चिम बंगाल तक फैला है। आसपास के जिलों और अमेठी सुल्तानपुर के नदी के किनारे वाले इलाकों व बड़े तालाबों से कछुओं को पकड़ा जाता है। इस काम में आमतौर पर कंजर समुदाय के गरीब लोग लगाए जाते हैं। तस्करों के एजेंट उन्हें एक कछुए के लिए दो से तीन सौ रुपये देते हैं। फिर कछुओं को इकट्ठा कर उन्हें तस्करी के जरिए पश्चिम बंगाल भेजा जाता है।
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पश्चिम बंगाल पहुंचने पर एक कछुए की कीमत करीब एक हजार हो जाती है। वन विभाग के अधिकारियों के मुताबिक पश्चिम बंगाल पहुंचने पर कछुओं के मांस समेत अलग-अलग अंगों की कीमत निर्धारित होती है। कछुओं के अंगों से कुछ प्रतिबंधित दवाइयां बनाई जाती हैँ। दवाओं को तस्करी के जरिए विदेश भेजा जाता है। पहले कछुओं को ट्रेन से पश्चिम बंगाल भेजा जाता था। ट्रेनों पर शिकंजा कसने के बाद तस्करों ने सड़क मार्ग को जरिया बनाया है। इकट्ठा कछुओं को छोटे-बड़े वाहनों से कोलकाता भेजा जाता है।    

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