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अजब तेरी कारीगरी रे सरकार..

Sat, 10 Jul 2021 10:30 PM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Sat, 10 Jul 2021 10:30 PM IST
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BJP wons majority seats
सुल्तानपुर। ‘अजब तेरी कारीगरी रे करतार..’सत्तर के दशक में आई फिल्म ‘दस लाख’ के इस भजन के बोल को सियासत के संदर्भ में ‘अजब तेरी कारीगरी रे सरकार..’ कर दिया जाए तो कुछ बेजा नहीं होगा। दरअसल जनता के बजाय सदस्यों के मतों के जरिए होने वाले चुनाव में सरकार का ही सिक्का चलता है।
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जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव हो या फिर ब्लॉक प्रमुख की ताजपोशी, सरकार जिसकी भी हो मतदान में उसके पक्ष में सुनामी आना पहले से ही तय मान लिया जाता है। मौजूदा ब्लॉक प्रमुख के चुनाव ने इस मिथक को कायम रखा है।
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जिले के 14 ब्लॉकों में 11 प्रमुख भाजपा के निर्वाचित हुए हैं। इसमें सात निर्विरोध हैं। कमोबेश ब्लाकों की ऐसी ही तस्वीर बसपा व सपा की सरकारों में भी देखने को मिली थी। पिछले दिनों संपन्न हुए जिला पंचायत सदस्य के चुनावों में राजनीतिक दलों ने बाकायदा पार्टी स मर्थित प्रत्याशी मैदान में उतारे थे।
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सीधे जनता के जरिए होने वाले इन चुनावों में किसी दल के पक्ष में पुरवइया तक नहीं बही थी। चुनाव में 45 सदस्यीय सदन के लिए सपा के सात, बसपा के छह, कांग्रेस के तीन व भाजपा के दो प्रत्याशी ही निर्वाचित हुए थे।
जब जिला पंचायत अध्यक्ष पद के निर्वाचन की बारी आई तो प्रदेश में सत्तारूढ़ भाजपा के पक्ष में सुनामी चल पड़ी। दो सदस्यों वाली भाजपा ने 25 वोट हासिल कर जीत दर्ज की तो सात सदस्यों के बूते फूले नहीं रही समा रही सपा को मात्र एक मत मिला।
माना जा रहा है कि उसके शेष छह सदस्य अंतरात्मा की आवाज पर विपक्षी खेमे में चले गए। कुछ ऐसे ही नतीजे पूर्व में बसपा व सपा की सरकारों में भी उनके पक्ष में रहे थे। शनिवार को आए ब्लॉक प्रमुख चुनाव के नतीजे भी सत्तारूढ़ भाजपा के पक्ष में रहे हैं।
पिछले दस दिनों के भीतर जिला पंचायत अध्यक्ष पद के चुनाव के बाद भाजपा के पक्ष में दोबारा ऐसी आंधी बही कि 14 ब्लॉकों में भाजपा समर्थित 11 प्रत्याशियों ने अपना परचम लहरा दिया। इसमें सात प्रत्याशी निर्विरोध ब्लॉक प्रमुख बनने में कामयाब रहे। हालांकि ब्लॉक प्रमुख चुनावों में ऐसा पहली बार नहीं हुआ है।

पूर्व में बसपा सरकार में पार्टी समर्थित 10 लोगों को विजयश्री मिली थी। वहीं 2016 में सपा सरकार में उसके भी नौ ब्लॉक प्रमुख निर्वाचित हुए थे। मजे की बात यह है कि बाद में सरकारें बदलने पर सदस्यों की अंतरात्मा ने एक बार फिर हिलोरें मारी और कुछ को अविश्वास के जरिए बेदखल होना पड़ा तो कुछ ने अपना चोला ही बदल लिया।
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