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जब नून खाएं हैं तो नून का भांड़ा थोड़े फोड़ेंगे...
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सोनभद्र। आदिवासी बहुल जिले के मतदाताओं में भाजपा सरकार की ओर से वितरित किए जाने वाले मुफ्त राशन, तेल, नमक सहित अन्य योजनाओं का बड़ा प्रभाव दिखा। इन सुविधाओं का ही असर रहा कि जिन आदिवासी मतदाताओं को सपा-बसपा का परंपरागत वोट बैंक माना जाता था, उसमें भाजपा सेंधमारी में कामयाब रही। कई इलाकों में महिलाएं बूथ पर नमक का कर्ज उतारने की चर्चा करतीं रहीं। आदिवासी महिलाओं का कहना था कि जब नून खाए हैं तो नून का भांड़ा (नमक रखने का बर्तन) थोड़े ही फोड़ेंगे।
जिले की चारों विधानसभा सीटों पर सबसे ज्यादा मतदाता आदिवासी वर्ग से हैं। यही कारण रहा कि यहां की सीटें लंबे समय तक अनुसूचित जाति के लिए ही आरक्षित रही हैं। वर्ष 2012 में नए परिसीमन के बाद जब चार सीटें हुई तब भी दुद्धी सीट को अनुसूचित जाति के लिए ही आरक्षित रखा गया। इसके बाद कानूनी दांव-पेंच से दुद्धी और ओबरा दोनों क्षेत्रों में जनजाति आबादी की बहुलता के कारण उसे अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित कर दिया है। उत्तर प्रदेश की विधानसभा में जनजाति के लिए सिर्फ दो सीटें ही आरक्षित हैं और दोनों ही इसी जिले में है। जंगल, पहाड़ों के बीच रहने वाली इस आबादी पर सपा, बसपा का ज्यादा प्रभाव रहा। दोनों दल शुरू से ही इसी वर्ग को अपने केंद्र में भी रखा।
वर्ष 2017 के मोदी लहर में पहली बार चारों सीटों पर जीत दर्ज करने वाली भाजपा ने इस बार विरोधी दलों के गढ़ को भेदने के लिए नई रणनीति पर काम किया। पक्के मकान, आयुष्मान, मुफ्त में राशन, तेल से ज्यादा असर नमक का रहा। आदिवासी मतदाता नमक का कर्ज उतारने के लिए बड़ी संख्या में भाजपा के पक्ष में गोलबंद दिखे। विंढ़मगंज के मुड़िसेमर बूथ पर मतदान करने आईं सावित्री और सीता देवी ने खुलकर भाजपा को वोट देकर नमक हलाली की बात कही तो म्योरपुर के पिंडारी, डुमरचुआ, खम्हरिया, नगवां के सेमरिया, सुअरसोत, मांची, मड़पा आदि गांवों में मतदाता इन सुविधाओं के आधार पर वोट देने की बात कहते रहे। भाजपा की इस रणनीति के सफल होने का ही असर जिन आदिवासी इलाकों में भाजपा को पहले लड़ाई से बाहर माना जा रहा था, वहां भी पार्टी ने मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है।
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जिले की चारों विधानसभा सीटों पर सबसे ज्यादा मतदाता आदिवासी वर्ग से हैं। यही कारण रहा कि यहां की सीटें लंबे समय तक अनुसूचित जाति के लिए ही आरक्षित रही हैं। वर्ष 2012 में नए परिसीमन के बाद जब चार सीटें हुई तब भी दुद्धी सीट को अनुसूचित जाति के लिए ही आरक्षित रखा गया। इसके बाद कानूनी दांव-पेंच से दुद्धी और ओबरा दोनों क्षेत्रों में जनजाति आबादी की बहुलता के कारण उसे अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित कर दिया है। उत्तर प्रदेश की विधानसभा में जनजाति के लिए सिर्फ दो सीटें ही आरक्षित हैं और दोनों ही इसी जिले में है। जंगल, पहाड़ों के बीच रहने वाली इस आबादी पर सपा, बसपा का ज्यादा प्रभाव रहा। दोनों दल शुरू से ही इसी वर्ग को अपने केंद्र में भी रखा।
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वर्ष 2017 के मोदी लहर में पहली बार चारों सीटों पर जीत दर्ज करने वाली भाजपा ने इस बार विरोधी दलों के गढ़ को भेदने के लिए नई रणनीति पर काम किया। पक्के मकान, आयुष्मान, मुफ्त में राशन, तेल से ज्यादा असर नमक का रहा। आदिवासी मतदाता नमक का कर्ज उतारने के लिए बड़ी संख्या में भाजपा के पक्ष में गोलबंद दिखे। विंढ़मगंज के मुड़िसेमर बूथ पर मतदान करने आईं सावित्री और सीता देवी ने खुलकर भाजपा को वोट देकर नमक हलाली की बात कही तो म्योरपुर के पिंडारी, डुमरचुआ, खम्हरिया, नगवां के सेमरिया, सुअरसोत, मांची, मड़पा आदि गांवों में मतदाता इन सुविधाओं के आधार पर वोट देने की बात कहते रहे। भाजपा की इस रणनीति के सफल होने का ही असर जिन आदिवासी इलाकों में भाजपा को पहले लड़ाई से बाहर माना जा रहा था, वहां भी पार्टी ने मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है।
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