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UP Chunav 2022: यूपी की अंतिम चार सीटों का हाल, मुफ्त राशन और नमक-तेल ने रोचक किया चुनावी खेल

Sun, 06 Mar 2022 04:41 PM IST
उत्पल कांत अमर उजाला नेटवर्क, सोनभद्र
अमर उजाला नेटवर्क, सोनभद्र Published by: उत्पल कांत Updated Sun, 06 Mar 2022 04:41 PM IST
सार

यूपी की अंतिम चार विधानसभा सीटों पर भाजपा फिर से इतिहास दोहराने की कोशिश में जुटी है तो सपा-बसपा अपने वोटों पर पकड़ मजबूत बनाने की जद्दोजहद कर रहे हैं। दिग्गजों के दौरों ने चुनावी माहौल को रोचक बना दिया है।

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UP Election 2022: The condition of the last four seats of UP, free ration and salt-oil made the election game interesting
सोनभद्र - फोटो : सोशल मीडिया।

विस्तार

यूपी विधानसभा चुनाव के अंतिम चरण में प्रदेश की अंतिम चार विधानसभा सीटों पर भी मतदान होना है। यह चारों सीटें सोनभद्र में है। चार राज्यों की सीमा से सटे इस जिले की चारों सीटों का माहौल भी अलग-अलग है। सोनांचल का भविष्य तय करने वाले इस चुनाव में सबकी निगाहें आदिवासी वोटरों पर है।

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आदिवासियों में गहरी पैठ रखने वाले सपा-बसपा को वर्ष 2017 में भाजपा ने तगड़ा झटका देते हुए चारों सीटें अपने पाले में कर ली थी। इनमें तीन सीटों पर भाजपा खुद जीती तो एक सीट गठबंधन की सहयोगी अपना दल को मिली। भाजपा फिर से इतिहास दोहराने की कोशिश में जुटी है तो सपा-बसपा अपने वोटों पर पकड़ मजबूत बनाने की जद्दोजहद कर रहे हैं।
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पीएम मोदी, सीएम योगी और सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के दौरों ने चुनावी माहौल को रोचक बना दिया है। शुरुआत में कुछ स्थानों पर त्रिकोणीय दिख रही लड़ाई अब सीधे सपा-भाजपा के बीच सिमट गई है। भाजपा वोटरों को मुफ्त राशन, तेल और नमक वितरण की याद दिलाकर गांव-गांव में सबका साथ-सबका विकास का नारा बुलंद कर रही है तो सपा पिछले पांच सालों के काम में कमियां और बेरोजगारी, महंगाई जैसे मुद्दों को उछालकर सरकार से नाराज वोटरों को एकजुट करने में जुटी है।
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दुद्धी: दरकने लगा है विजय का गढ़

उत्तर प्रदेश की अंतिम विधानसभा सीट दुद्धी है। यहां से सात बार लगातार जीतने वाले विजय सिंह गोंड फिर से सपा के टिकट पर मैदान में हैं। यहां अब तक भाजपा का कमल नहीं खिला है। पिछली बार गठबंधन में अपना दल-एस को जीत मिली थी, लेकिन चुनाव से ठीक पहले विधायक हरिराम चेरो पाला बदलकर बसपा में चले गए थे। विजय सिंह गोंड के ही शिष्य रामदुलार गोंड को प्रत्याशी बनाकर भाजपा ने बड़ा दांव खेला है।

गुरु के नक्शेकदम पर चलते हुए रामराज बहुल बिरादरी गोंड मतदाताओं को तोड़ने में लगे हैं। कुछ हद तक उन्हें सफलता भी मिली है। विजय के गढ़ में बढ़ती दरारें समर्थकों की चिंता बढ़ा रही हैं। इसी विधानसभा क्षेत्र में वह 11 गांव भी है, जो इस बार विधानसभा चुनाव में अंतिम बार वोट करेंगे। कनहर परियोजना के डूब क्षेत्र में शामिल इन गांवों के लोग अंतिम सीट पर अंतिम बार वोट कर नया इतिहास लिखने को भी मुखर हैं।

राबर्ट्सगंज: हाथी ने बिगाड़ी साइकिल की चाल 

राबर्ट्सगंज सीट पर सपा से पूर्व विधायक अविनाश कुशवाहा और भाजपा से मौजूदा विधायक भूपेश चौबे मैदान में हैं। मुख्य लड़ाई इन्हीं के बीच मानी जा रही है। पक्ष-विपक्ष में सीधे बंटे वोटरों के बीच चुनाव मैदान में बसपा से उतरे अविनाश शुक्ल ने मामला उलझा दिया है। दलित और ब्राह्मण मतों के साथ वह मतदाताओं के लिए नया विकल्प दे रहे हैं। इससे सपा के परंपरागत मुस्लिम वोटर असमंजस में हैं।

मुस्लिम वोटों में विभाजन से सपा को जितना नुकसान होगा तो भाजपा उतने ही फायदे में होगी। राशन, तेल, नमक, आवास जैसी योजनाओं से भाजपा ने सुदूर वनों में रहने वाले जनजाति वोटरों में भी सेंध लगाई है। हाल यह है कि उठक-बैठक और तेल मालिश कर चर्चाओं में घिरे भूपेश कमल निशान के साथ फिर से कमाल करने की स्थिति में आ गए हैं।

घोरावल: पंजे ने मुश्किल की साइकिल की राह

घोरावल सीट पर भी मुकाबले में सीधे सपा और भाजपा ही है। यहां से सपा ने पूर्व विधायक रमेश दुबे को उतारा है तो भाजपा ने विधायक अनिल मौर्य को टिकट दिया है। वर्तमान विधायक अनिल से मतदाताओं की नाराजगी जगजाहिर हो चुकी है। बावजूद भाजपा ने उन्हें दोबारा मौका देकर बड़ा जोखिम लिया है, लेकिन मैदान में बड़हर-राजपुर स्टेट की बहू के पंजा निशान पर उतरने के बाद यह मुश्किल भी दूर हुई है।

बसपा ने कुशवाहा प्रत्याशी देकर विधायक से नाराज लोगों को एक विकल्प दिया है। ऐसे में जो वोट सपा के साथ जुड़ सकते थे, वह अब कांग्रेस और बसपा के साथ जाने लगे हैं। सपा यादव, मुस्लिम और ब्राह्मण मतों के सहारे है तो भाजपा मोदी मैजिक का सहारा लेकर सबको एकजुट करते हुए बढ़त बनाने में लगी है।
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ओबरा: राज्य मंत्री के लिए अंतर बढ़ाने का मौका

यूपी को रोशन करने वाला ऊर्जांचल क्षेत्र ओबरा विधानसभा सीट में ही है। बिजली और कोयला परियोजना वाले इस क्षेत्र में नगरीय मतदाताओं की अधिकता से भाजपा की राह आसान है। राज्य मंत्री संजीव सिंह गोंड के लिए यह चुनाव सिर्फ अंतर बढ़ाने का ही मौका माना जा रहा है।

सपा ने गोंड जनजाति से ही अरविंद उर्फ सुनील गोंड तो कांग्रेस ने रामराज गोंड को उतारकर जातीय समीकरणों में घेरने की कोशिश जरूर की थी, लेकिन उनकी कोशिशें फिलहाल साकार होती नहीं दिख रहीं। खरवार और दलित मतदाताओं के साथ लखनऊ पहुंचने की मंशा पाले बसपा के सुभाष खरवार का भ्रम भी टूटने लगा है। भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती मतदाताओं को घर से निकालकर बूथों तक पहुंचाने की है। जितनी ज्यादा वोटिंग होगी, भाजपा की जीत का अंतर भी उतना ही अधिक हो सकता है।

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