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जिनसे थी सहारे की आस, वही छोड़ गए वृद्धाश्रम के पास

Thu, 30 Sep 2021 11:15 PM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Thu, 30 Sep 2021 11:15 PM IST
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Those who had the hope of support, left them near the old age home
मां-बाप अपने बच्चों के पालन-पोषण में कोई कसर नहीं छोड़ते। खुद का पेट काटकर बच्चों का पेट भरते हैं। उनकी खुशियों और उनकी ख्वाहिशों को पूरा करने के लिए अपना सब न्यौछावर कर देते हैं। उन्हें बस इतनी सी ही आस रहती है कि बेटा बड़ा होकर उनके बुढ़ापे का सहारा बनेगा। विडंबना है कि बच्चों के लिए तमाम कुर्बानियां देने और दुख सहने के बाद भी कई मां-बाप को बुढ़ापे में अपनी संतान से दुत्कार ही नसीब होती है। दुखद ये होता है कि जिसे वो अपनी जिंदगी में सबसे ज्यादा चाहते हैं, वहीं उन्हें वृद्धाश्रम की चौखट पर छोड़ देते हैं। सलखन स्थित वृद्धा आश्रम में एक-दो नहीं बल्कि ऐसे कई बुजुर्ग हैं। उनके कई किस्से भी हैं जिन्हें सुनकर किसी का भी दिल पसीज जाए। बुढ़ापा चढ़ते ही किसी के बेटे ने मुंह मोड़ दिया तो किसी ने उन्हें घर के बाहर बेसहारा छोड़ दिया। अब वह किसी तरह वृद्धाश्रम में रहकर जिंदगी के दिन काट रहे हैं। अब ये बुजुर्ग ही एक दूसरे का दुख बांट रहे हैं। एक दूसरे का सहारा बन रहे हैं। कुल डेढ़ सौ बेड की क्षमता वाले इस वृद्धाश्रम में फिलहाल 60 वृद्ध रह रहे हैं। हर किसी के जेहन और दिल में दर्द का सागर छिपा है, मगर वह उसे जाहिर नहीं करना चाहते। अपनों से दूर होकर वह छटपटा रहे हैं। फिर भी मन में यह संतोष बना हुआ है कि दूर होकर ही कम से कम उनके बच्चे सुकून में तो हैं। वृद्धाश्रम के प्रबंधक राम प्रसाद ने बताया कि ज्यादातर वृद्ध आसपास के इलाकों के ही रहने वाले हैं। शासन के निर्देशों के तहत उन्हें सुविधाएं मुहैया कराई जा रही हैं।
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