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जनता रही बेहाल, माननीयों ने नहीं पूछा कोई सवाल

Fri, 04 Feb 2022 11:39 PM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Fri, 04 Feb 2022 11:39 PM IST
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The public remained helpless, MLAs did not ask any question
वोट की खातिर रैलियों, सभाओं में खूब गरजने वाले जनप्रतिनिधि पिछले पांच वर्षों तक विधानसभा में मौन रहे। जिले में जनहित के तमाम मुद्दे होने के बावजूद उन्होंने सदन में सरकार से सवाल पूछने की रुचि नहीं दिखाई। सदर विधायक भूपेश चौबे को छोड़ दें तो अन्य किसी भी विधायक ने विधानसभा के कुल 12 सत्रों में से एक भी सवाल नहीं पूछा। सदर विधायक ने भी सिर्फ पहले सत्र में दो सवाल उठाए, उसके बाद वह भी मौन हो गए। उनके दोनों सवाल भी स्थानीय मुद्दों पर न होकर सामान्य श्रेणी में थे।
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उत्तर प्रदेश विधानसभा की वेबसाइट पर गौर करें तो पिछले पांच वर्षों के दौरान सदन में कुल 12 सत्र संचालित हुए। विधानसभा गठन के बाद वर्ष 2017 में दो सत्र चले थे। वहीं कोरोना महामारी के प्रभाव के चलते वर्ष 2020 में विधानसभा का सिर्फ एक सत्र चला। अन्य वर्षों में तीन-तीन सदन की कार्यवाही चली। इन 12 सत्रों में से जिले के विधायकों का प्रदर्शन बेहतर नहीं रहा। विभिन्न मुद्दों पर सरकार से सवाल करने के मामले में वह पूरे कार्यकाल के दौरान चुप्पी ही साधे रहे। सदर विधायक भूपेश चौबे ने वर्ष 2017 के पहले सत्र में तारांकित श्रेणी में दो सवाल रखे थे। एक प्रश्न सभी जिला मुख्यालयों को फोरलेन से जोड़ने से संबंधित था तो दूसरा ग्रामीण क्षेत्र में गैस वितरकों की ओर से किए जा रहे भ्रष्टाचार पर कार्रवाई से जुड़ा रहा। प्रथम सत्र के अलावा अन्य किसी भी सत्र में उन्होंने कोई सवाल नहीं उठाया। घोरावल विधायक डॉ. अनिल कुमार मौर्य, ओबरा के संजीव कुमार और दुद्धी से अपना दल-एस के हरिराम चेरो ने तो किसी भी सत्र में सवाल पूछने में रुचि नहीं दिखाई। उनकी भूमिका सदन में सिर्फ दर्शक के रूप में ही रही।
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खनन, वनाधिकार, उभ्भा जैसे मुद्दे भी नहीं उठे
पिछले पांच वर्षों के दौरान ऐसे कई मामले रहे जो सदन में उठाए जा सकते थे। इसमें अवैध खनन से राजस्व की क्षति और खनन कार्य पर रोक से गिट्टी-बालू के दामों में वृद्धि, बेरोजगारी की समस्या अहम है। पूरा प्रदेश और खास रूप से पूर्वांचल इससे बुरी तरह प्रभावित रहा है। यही नहीं वनाधिकार कानून के तहत आदिवासियों को वन भूमि पर पट्टा देने, उनके विस्थापन का मामला भी अरसे से सुर्खियों में रहा है। वर्ष 2017 के चुनाव में पहली बार अनुसूचित जनजाति से दो विधायक होने के बाद आदिवासियों को अपने हित से जुड़े इस मुद्दे को सदन में उठाने की उम्मीद जमी थी मगर उन्हें निराशा ही मिली। इसी तरह वर्ष 2019 में देश स्तर पर सुर्खियां बटोरने वाले उभ्भा कांड से जुड़े तमाम अनुत्तरीत सवालों को जानने की भी जिले के किसी विधायक ने पहल नहीं की। कनहर परियोजना सहित विकास के कई अन्य बिंदुओं पर जनता की उम्मीदों को झटका लगा है।
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