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जिले से था नारायण देसाई का नाता
संवाददाता अमर उजाला सोनभद्र
Updated Mon, 16 Mar 2015 11:32 PM IST
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राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के निजी सचिव, गुजरात विद्यापीठ के कुलपति और महात्मा गांधी डायरी के लेखक रहे प्रसिद्ध गांधीवादी नारायण देसाई का सोनभद्र से गहरा नाता रहा है।
वर्ष 1970 से 2009 के बीच उनका यहां कई बार आना-जाना हुआ। देश की सीमाओं पर शांति स्थापित करने के लिए गठित तरुण शांति सेना के जरिए भी उनका यहां से जुड़ाव बना रहा।
उन्होंने कई टोलियों को वेद्छी (सूरत) स्थित संपूर्ण क्रांति विद्यालय में बुलाकर प्रशिक्षित भी किया। रविवार को जब देसाई के निधन की खबर मिली तो हर कोई मर्माहत हो उठा।
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बनवासी सेवा आश्रम की संचालक शुभा प्रेम बताती हैं कि बचपन से ही उनके सान्निध्य ने काफी कुछ सीखने का मौका दिया।
सहज स्वभाव, हर पहलू पर खुलकर चर्चा, युवाओं को रचनात्मक कार्य के प्रति प्रेरित करने की ललक, अहिंसा का पुरजोर समर्थन जैसी चीजें उनके व्यक्तित्व का अलग ही बखान करती थीं।
आश्रम के ही कार्यकर्ता देवनाथ भाई ने उनके निधन पर काफी दुख जताते हैं। सोनभद्र प्रवास के समय देसाई के नजदीक रहने वाले समाजवादी विचारक अजय शेखर कहते हैं कि उनका सौम्य स्वभाव,
देश के प्रति समर्पण और अहिंसा के प्रति पूजा की भावना हमेशा दूसरों के लिए प्रेरणा बनी रही। वर्ष 1970 से 2009 के बीच उनका कई बार आना-जाना हुआ। वर्ष 2009 में वह अंतिम बार आए हुए थे।
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वर्ष 1970 से 2009 के बीच उनका यहां कई बार आना-जाना हुआ। देश की सीमाओं पर शांति स्थापित करने के लिए गठित तरुण शांति सेना के जरिए भी उनका यहां से जुड़ाव बना रहा।
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उन्होंने कई टोलियों को वेद्छी (सूरत) स्थित संपूर्ण क्रांति विद्यालय में बुलाकर प्रशिक्षित भी किया। रविवार को जब देसाई के निधन की खबर मिली तो हर कोई मर्माहत हो उठा।
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बनवासी सेवा आश्रम की संचालक शुभा प्रेम बताती हैं कि बचपन से ही उनके सान्निध्य ने काफी कुछ सीखने का मौका दिया।
सहज स्वभाव, हर पहलू पर खुलकर चर्चा, युवाओं को रचनात्मक कार्य के प्रति प्रेरित करने की ललक, अहिंसा का पुरजोर समर्थन जैसी चीजें उनके व्यक्तित्व का अलग ही बखान करती थीं।
आश्रम के ही कार्यकर्ता देवनाथ भाई ने उनके निधन पर काफी दुख जताते हैं। सोनभद्र प्रवास के समय देसाई के नजदीक रहने वाले समाजवादी विचारक अजय शेखर कहते हैं कि उनका सौम्य स्वभाव,
देश के प्रति समर्पण और अहिंसा के प्रति पूजा की भावना हमेशा दूसरों के लिए प्रेरणा बनी रही। वर्ष 1970 से 2009 के बीच उनका कई बार आना-जाना हुआ। वर्ष 2009 में वह अंतिम बार आए हुए थे।