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भाजपा के गढ़ में राज्य मंत्री को घेर रही सपा-बसपा
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अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित ओबरा विधानसभा सीट के मतदाता इस बार तीसरा विधायक चुनने के लिए मतदान करेंगे। राज्य मंत्री संजीव सिंह गोंड के मैदान में होने से यह जिले की वीआईपी सीट बन गई है। यहां से बसपा ने खरवार जाति का प्रत्याशी देकर समीकरणों को उलझाया है तो सपा और कांग्रेस ने गोंड जनजाति से ही प्रत्याशी उतारकर राज्य मंत्री की मुश्किलें बढ़ाई हैं। मोदी मैजिक के भरोसे वह फिर से जीत दर्ज कर प्रतिष्ठा बचाने की जद्दोजहद कर रहे हैं तो विपक्ष उन्हें शिकस्त देने के लिए जातियों के ध्रुवीकरण को रोकने में जी-जान से जुटा है।
वर्ष 2012 से पहले औद्योगिक क्षेत्र ओबरा, दुद्धी और राबर्ट्सगंज विधानसभा का हिस्सा होता था। नए परिसीमन के बाद हुए पहले चुनाव में बसपा ने सुनील यादव के सहारे पिछड़ा और अनुसूचित वोटों के गठजोड़ से जीत दर्ज की थी। हालांकि बसपा की उस जीत में भाजपा से बगावत कर मैदान में उतरे निर्दल प्रत्याशी अनिल सिंह की भी बड़ी भूमिका रही। अनिल ने 21 हजार से अधिक वोट पाकर भाजपा प्रत्याशी को बड़ा नुकसान पहुंचाया था। तब दूसरे स्थान पर रहे भाजपा के जुझारू नेता देवेंद्र शास्त्री को भी तकरीबन 24 हजार वोट मिले थे। वह महज सात हजार वोटों से चुनाव हारे थे। वर्ष 2017 में जब सीट अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हुई तो भाजपा ने गोंड जनजाति के संजीव सिंह पर दांव लगाया। वह सपा के रवि सिंह गोंड को मिले वोटों के दोगुने से भी ज्यादा मत पाकर चुनाव जीतने में कामयाब हुए थे। करीब 30 हजार वोट पाकर बसपा तीसरे स्थान पर थी और चौथे स्थान पर निर्दल प्रत्याशी सुभाष खरवार रहे, जिन्हें 6198 वोट मिले थे। सुभाष इस बार बसपा के सिंबल पर चुनाव लड़ रहे हैं तो सपा ने फिर से गोंड जाति के ही अरविंद कुमार उर्फ सुनील गोंड को मैदान में उतारा है। कांग्रेस से भी जिलाध्यक्ष रामराज गोंड प्रत्याशी हैं।
सपा, भाजपा और कांग्रेस तीनों प्रमुख दलों से गोंड प्रत्याशी होने से यह दावा किया जा रहा है कि इस वर्ग के वोटों में बिखराव होगा तो वहीं सबसे अधिक जनजाति आबादी वाले खरवार, बसपा के काडर वोटों के साथ मिलकर भाजपा के लिए चुनौती बढ़ाएंगे। राज्य मंत्री के सामने दूसरी बड़ी मुश्किल चोपन, ओबरा, रेणुकूट और अनपरा के नगरीय क्षेत्रों में कम मतदान प्रतिशत भी है। इन इलाकों में भाजपा का ही गहरा प्रभाव है, मगर मतदाताओं की बेरुखी माहौल बिगाड़ सकती है। दूसरी ओर सपा जिला पंचायत सदस्य अरविंद कुमार गोंड के जरिए पहली जीत हासिल करने की कोशिश में है। अरविंद इलाके की बड़ी ग्राम पंचायत पटवध के हैं। प्रधान और जिला पंचायत के चुनाव के कारण घर-घर में पैठ रखते हैं। उन्हें भरोसा है कि सपा के पारंपरिक वोटों को साथ लेकर वह खनन क्षेत्र में साइकिल दौड़ाने में कामयाब होंगे। बसपा का भरोसा सोशल इंजीनियरिंग पर है। एससी वोटों के बाद सबसे ज्यादा खरवार मतदाता हैं। यह वह तबका है, जो मतदान में बढ़चढ़कर हिस्सा लेता है। दुद्धी से विधायक हरिराम चेरो के बसपा में आने का लाभ पार्टी ओबरा में पाना चाहती है। चेरो, बैगा वोटरों की संख्या भी अच्छी है। बसपा की यह रणनीति सफल हुई तो परिणाम चौंकाने वाले हो सकते हैं।
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कांग्रेस बिगाड़ रही गणित
घोरावल के उभ्भा में आदिवासियों के नरसंहार के बाद हुए वृहद आंदोलन का नेतृत्व करने वाले रामराज गोंड को कांग्रेस ने उम्मीदवार बनाया है। उभ्भा के बाद से गोंड जनजाति में रामराज ने गहरी पैठ बनाई है। वह पार्टी के जिलाध्यक्ष भी हैं। परंपरागत वोटों के अलावा वह स्वजातीय आदिवासी वोटों को लुभाने में लगे हैं। उनके पाले में जाने वाले एक-एक वोट सबसे ज्यादा भाजपा की ही परेशानी की वजह बनेंगे।
इनकी कमजोरी, उनकी ताकत
भाजपा प्रत्याशी संजीव सिंह गोंड की सबसे बड़ी ताकत केंद्र व प्रदेश सरकार के काम है। इसके बाद उन्हें नगरीय इलाके वाले मतदाताओं पर भरोसा है, जिन्हें भाजपा का वोटर माना जाता है। कमजोरी यह है कि इन इलाकों में मतदान का प्रतिशत पिछले दो चुनाव में महज 30-35 प्रतिशत ही रहा है। बेरोजगारी का मुद्दा गरमाने से भी उन्हें नुकसान हो सकता है। वहीं सपा प्रत्याशी अरविंद कुमार गोंड युवा चेहरा हैं। पटवध सहित आसपास के गांवों में पकड़ मजबूत है। हालांकि गोंड जाति से ही तीन प्रत्याशी होने के कारण अपनी बिरादरी का पूरा साथ उन्हें नहीं मिल पा रहा। सुभाष खरवार की मजबूती बसपा के परंपरागत वोटों के साथ बहुल जाति खरवार और बैगा वोटों का जुड़ना है। इन वोटरों को सहेजे रखना उनके लिए चुनौती है। इसमें असफल होने पर मुकाबले से बाहर होने का भी खतरा है।
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वर्ष 2012 से पहले औद्योगिक क्षेत्र ओबरा, दुद्धी और राबर्ट्सगंज विधानसभा का हिस्सा होता था। नए परिसीमन के बाद हुए पहले चुनाव में बसपा ने सुनील यादव के सहारे पिछड़ा और अनुसूचित वोटों के गठजोड़ से जीत दर्ज की थी। हालांकि बसपा की उस जीत में भाजपा से बगावत कर मैदान में उतरे निर्दल प्रत्याशी अनिल सिंह की भी बड़ी भूमिका रही। अनिल ने 21 हजार से अधिक वोट पाकर भाजपा प्रत्याशी को बड़ा नुकसान पहुंचाया था। तब दूसरे स्थान पर रहे भाजपा के जुझारू नेता देवेंद्र शास्त्री को भी तकरीबन 24 हजार वोट मिले थे। वह महज सात हजार वोटों से चुनाव हारे थे। वर्ष 2017 में जब सीट अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हुई तो भाजपा ने गोंड जनजाति के संजीव सिंह पर दांव लगाया। वह सपा के रवि सिंह गोंड को मिले वोटों के दोगुने से भी ज्यादा मत पाकर चुनाव जीतने में कामयाब हुए थे। करीब 30 हजार वोट पाकर बसपा तीसरे स्थान पर थी और चौथे स्थान पर निर्दल प्रत्याशी सुभाष खरवार रहे, जिन्हें 6198 वोट मिले थे। सुभाष इस बार बसपा के सिंबल पर चुनाव लड़ रहे हैं तो सपा ने फिर से गोंड जाति के ही अरविंद कुमार उर्फ सुनील गोंड को मैदान में उतारा है। कांग्रेस से भी जिलाध्यक्ष रामराज गोंड प्रत्याशी हैं।
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सपा, भाजपा और कांग्रेस तीनों प्रमुख दलों से गोंड प्रत्याशी होने से यह दावा किया जा रहा है कि इस वर्ग के वोटों में बिखराव होगा तो वहीं सबसे अधिक जनजाति आबादी वाले खरवार, बसपा के काडर वोटों के साथ मिलकर भाजपा के लिए चुनौती बढ़ाएंगे। राज्य मंत्री के सामने दूसरी बड़ी मुश्किल चोपन, ओबरा, रेणुकूट और अनपरा के नगरीय क्षेत्रों में कम मतदान प्रतिशत भी है। इन इलाकों में भाजपा का ही गहरा प्रभाव है, मगर मतदाताओं की बेरुखी माहौल बिगाड़ सकती है। दूसरी ओर सपा जिला पंचायत सदस्य अरविंद कुमार गोंड के जरिए पहली जीत हासिल करने की कोशिश में है। अरविंद इलाके की बड़ी ग्राम पंचायत पटवध के हैं। प्रधान और जिला पंचायत के चुनाव के कारण घर-घर में पैठ रखते हैं। उन्हें भरोसा है कि सपा के पारंपरिक वोटों को साथ लेकर वह खनन क्षेत्र में साइकिल दौड़ाने में कामयाब होंगे। बसपा का भरोसा सोशल इंजीनियरिंग पर है। एससी वोटों के बाद सबसे ज्यादा खरवार मतदाता हैं। यह वह तबका है, जो मतदान में बढ़चढ़कर हिस्सा लेता है। दुद्धी से विधायक हरिराम चेरो के बसपा में आने का लाभ पार्टी ओबरा में पाना चाहती है। चेरो, बैगा वोटरों की संख्या भी अच्छी है। बसपा की यह रणनीति सफल हुई तो परिणाम चौंकाने वाले हो सकते हैं।
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कांग्रेस बिगाड़ रही गणित
घोरावल के उभ्भा में आदिवासियों के नरसंहार के बाद हुए वृहद आंदोलन का नेतृत्व करने वाले रामराज गोंड को कांग्रेस ने उम्मीदवार बनाया है। उभ्भा के बाद से गोंड जनजाति में रामराज ने गहरी पैठ बनाई है। वह पार्टी के जिलाध्यक्ष भी हैं। परंपरागत वोटों के अलावा वह स्वजातीय आदिवासी वोटों को लुभाने में लगे हैं। उनके पाले में जाने वाले एक-एक वोट सबसे ज्यादा भाजपा की ही परेशानी की वजह बनेंगे।
इनकी कमजोरी, उनकी ताकत
भाजपा प्रत्याशी संजीव सिंह गोंड की सबसे बड़ी ताकत केंद्र व प्रदेश सरकार के काम है। इसके बाद उन्हें नगरीय इलाके वाले मतदाताओं पर भरोसा है, जिन्हें भाजपा का वोटर माना जाता है। कमजोरी यह है कि इन इलाकों में मतदान का प्रतिशत पिछले दो चुनाव में महज 30-35 प्रतिशत ही रहा है। बेरोजगारी का मुद्दा गरमाने से भी उन्हें नुकसान हो सकता है। वहीं सपा प्रत्याशी अरविंद कुमार गोंड युवा चेहरा हैं। पटवध सहित आसपास के गांवों में पकड़ मजबूत है। हालांकि गोंड जाति से ही तीन प्रत्याशी होने के कारण अपनी बिरादरी का पूरा साथ उन्हें नहीं मिल पा रहा। सुभाष खरवार की मजबूती बसपा के परंपरागत वोटों के साथ बहुल जाति खरवार और बैगा वोटों का जुड़ना है। इन वोटरों को सहेजे रखना उनके लिए चुनौती है। इसमें असफल होने पर मुकाबले से बाहर होने का भी खतरा है।
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