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155 गांवों के लिए बनी परियोजना, 35 गांवों तक सिमटी

Thu, 27 Jan 2022 11:54 PM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Thu, 27 Jan 2022 11:54 PM IST
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Project made for 155 villages, limited to 35 villages
सोनभद्र। नगर से सटे बढ़ौली गांव स्थित बढ़ौली-कुसाही ग्रामीण पेयजल योजना के तहत कुल 155 गांवों में पानी की सप्लाई की जानी थी। वर्षों बाद भी योजना महज 35 गांवों तक सिमट कर रह गई है। परियोजा का लाभ शेष 120 गांव के लोगों को नहीं मिल पा रहा है। ऐसे में इन गांवों में गर्मी के दिनों में पीने के पानी के लिए काफी दिक्कतें होती हैं। ग्रामीण पेयजल योजना से राबर्ट्सगंज व चतरा ब्लाक के 155 गांवों में पाइप लाइन से पेयजल आपूर्ति की जानी थी। 1984 में 345.46 लाख की लागत से तीन चरणों में परियोजना पूरी हुई थी। पहले हेड पर ओवरहेड टंकी बनाई गई थी। दूसरे बढ़ौली और तीसरे परासी पांडेय गांव में ओवरहेड टंकी का निर्माण करते हुए 155 गांवों में पेयजल आपूर्ति की जानी थी। लेकिन इसमें परासी में बना टंकी वर्षो से खराब है। किसी गांव में पाइप लाइन बिछी तो किसी गांव में आज तक बिछ ही नहीं सकी। ऐसे में पानी की आपूर्ति शुरू नहीं हो सकी। जिन गांवों में पाइप लाइन बिछी भी तो क्षतिग्रस्त हो गई है। 155 गांवों के लिए बनी यह परियोजना अब 35 गांवों तक ही सिमट कर रह गई है। इसमें बरकरा, जैत, ममुआ, बिच्छी, मानपुर सहित कई गांवों में पानी की आपूर्ति नहीं शुरू हो सकी है। पुरानी परियोजना होने के चलते विभागीय अधिकारियों को भी पानी की आपूर्ति बंद होने की जानकारी नहीं है। विभाग की तरफ से हर बार इसके चालू होने पर बजट का रोना रोया जाता है। अब यह परियोजना अपने अंतिम पड़ाव पर पहुंच गई है। हालात यह है कि जल निगम के अधिकारियों को यह पता ही नहीं कि पानी आपूर्ति कब बंद हुई। बढ़ौली के सामाजिक कार्यकर्ता रामशकल चौबे, दिवाकर देव बताते हैं कि यदि परियोजना सही तरीके से संचालित होती तो गांवों में पीने के पानी की समस्या न होती। निर्णावती और सोनू ने बताया कि परियोजना के नाम भी सिर्फ छलावा हुआ है। अगर परियोजना पर सही तरीके से काम होता तो कई गांवों को इसका लाभ मिलता। जलनिगम ग्रामीण के अवर अभियंता सीताराम यादव ने बताया कि बढ़ौली कुसाही परियोजना काफी पुरानी है। बढ़ती आबादी की वजह से परियोजना का पानी तमाम गांवों तक नहीं पहुंच सका है। वंचित गांवों में हर घर जल योजना से पानी की आपूर्ति की जाएगी।
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