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ओबरा-दुद्धी सीट आरक्षण को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती
अमर उजाला ब्यूरो/सोनभद्र
Updated Wed, 18 Jan 2017 11:49 PM IST
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ओबरा और दुद्धी विधानसभा सीट को निर्वाचन आयोग द्वारा अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित करने का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। पंकज कुमार मिश्रा एवं अन्य की ओर से मंगलवार को दाखिल याचिका की तत्काल सुनवाई के लिए बुधवार को प्रार्थनापत्र दिया गया। शुक्रवार को इसकी सुनवाई की उम्मीद है।
दुद्धी तहसील क्षेत्र के कटौंधी निवासी वीरेंद्र प्रताप ने 2011 में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर अनुसूचित जनजातियों के लिए प्रतिनिधित्व तय करने का आदेश देने की मांग की थी। 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन आयोग से इस संबंध में उचित कदम उठाने के लिए कहा था। इसके बाद यूपीए सरकार ने 24 जून 2013 को इसके लिए अध्यादेश जारी किया। आयोग ने संशोधन प्रक्रिया अपनाकर 13 जनवरी 2014 को ओबरा-दुद्धी विधानसभा सीट को अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित करने की अधिसूचना जारी कर राष्ट्रपतीय मंजूरी के लिए केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्रालय को पत्रावली भेज दी थी। अधिवक्ता शेखर जी देवासा के मुताबिक अध्यादेश को एक्ट में तब्दील होने के लिए लोकसभा में अनुमोदन जरूरी था, लेकिन ऐसा नहीं हुुआ। चुनाव आयोग ने बीच-बीच में आरटीआई से दिए जवाब में स्वीकार किया था कि संविधान के अनुच्छेद 82 और 170 के तहत राष्ट्रपतीय आदेश मिलने के बाद ही अधिसूचना के क्रियान्वयन की स्थिति स्पष्ट हो जाएगी। इसलिए अभी ओबरा सामान्य और दुद्धी एससी के लिए ही आरक्षित है।
देवासा का तर्क है कि 2002 में परिसीमन आयोग का गठन हुआ था और इसकी रिपोर्ट पर 26 नवंबर 2008 को अंतिम सूची जारी कर सोनभद्र में ओबरा और घोरावल के रूप में नई सामान्य विधानसभा सीट का गठन किया था। बीच में किसी संशोधन के लिए कानून बनना जरूरी है। जब अध्यादेश कानून का रूप ही नहीं ले पाया तो अधिसूचना कैसे मान्य हो सकती है। उधर, चुनाव आयोग ने अपने निर्णय को सही ठहराया है।
दुद्धी तहसील क्षेत्र के कटौंधी निवासी वीरेंद्र प्रताप ने 2011 में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर अनुसूचित जनजातियों के लिए प्रतिनिधित्व तय करने का आदेश देने की मांग की थी। 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन आयोग से इस संबंध में उचित कदम उठाने के लिए कहा था। इसके बाद यूपीए सरकार ने 24 जून 2013 को इसके लिए अध्यादेश जारी किया। आयोग ने संशोधन प्रक्रिया अपनाकर 13 जनवरी 2014 को ओबरा-दुद्धी विधानसभा सीट को अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित करने की अधिसूचना जारी कर राष्ट्रपतीय मंजूरी के लिए केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्रालय को पत्रावली भेज दी थी। अधिवक्ता शेखर जी देवासा के मुताबिक अध्यादेश को एक्ट में तब्दील होने के लिए लोकसभा में अनुमोदन जरूरी था, लेकिन ऐसा नहीं हुुआ। चुनाव आयोग ने बीच-बीच में आरटीआई से दिए जवाब में स्वीकार किया था कि संविधान के अनुच्छेद 82 और 170 के तहत राष्ट्रपतीय आदेश मिलने के बाद ही अधिसूचना के क्रियान्वयन की स्थिति स्पष्ट हो जाएगी। इसलिए अभी ओबरा सामान्य और दुद्धी एससी के लिए ही आरक्षित है।
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देवासा का तर्क है कि 2002 में परिसीमन आयोग का गठन हुआ था और इसकी रिपोर्ट पर 26 नवंबर 2008 को अंतिम सूची जारी कर सोनभद्र में ओबरा और घोरावल के रूप में नई सामान्य विधानसभा सीट का गठन किया था। बीच में किसी संशोधन के लिए कानून बनना जरूरी है। जब अध्यादेश कानून का रूप ही नहीं ले पाया तो अधिसूचना कैसे मान्य हो सकती है। उधर, चुनाव आयोग ने अपने निर्णय को सही ठहराया है।
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