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भूमि हथियाने वालों पर विभाग की नजरें टेढ़ी
ब्यूरो/ अमर उजाला /सोनभद्र
Updated Sun, 07 Aug 2016 12:31 AM IST
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सोनभद्र के मूल बाशिंदों की बजाय, बाहर से आकर खुद को यहां का मूल बाशिंदा बताते हुए धारा चार की जमीन हथियाने वालों पर वन विभाग की नजर टेढ़ी हो गई है। एनजीटी के आदेश पर रेणुकूट वन प्रभाग में अब तक ऐसे सात सौ नामों की सूची तैयार हो चुकी है। इसके साथ ही और नामों की भी सूची तैयार की जा रही है। इसमें कई कद्दावरों का भी नाम शामिल है। इन सभी के नामांतरण की कार्यवाही खारिज कर धारा बीस के प्रकाशन की प्रक्रिया अपनाई जाएगी। नामांतरण कार्यवाही में जो मामले लंबित थे, उनकी भी प्रक्रिया रोक दी गई है। धारा बीस का नए सिरे से प्रस्ताव तैयार करने के लिए, शासन की ओर से भी पूर्व में भेज प्रस्ताव को वापस कर दिया गया है।
बनवासी सेवा आश्रम की याचिका के क्रम में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर 1986 में सर्वे सेटलमेंट प्रक्रिया अपनाई गई थी। इसके तहत मूल बाशिंदों को उनके जोत-कोड़, पुश्तैनी घर-मकान पर भौमिक अधिकार देना था। 1994 में इसे पूरा मानते हुए, रोक दिया गया। इस दौरान जिले में महज बारह गांव ही ऐसे बताए गए, जहां सर्वे प्रक्रिया जारी रहने की बात कही गई लेकिन इसकी आड़ लेकर अन्य गांवों में साधन संपन्न और बाहर से आए लोगों ने वन विभाग की जमीन पर पुश्तैनी दावा पेश कर जमीन हथियाने का खेल जारी रखा। दो वर्ष पूर्व प्रमुख सचिव वन रहे वीएन गर्ग के रिपोर्ट की मानें तो इस खेल में कई सफेदपोशों के साथ अधिकारियों ने खुले हाथों से लूट की।
सबसे ज्यादा गड़बड़ी ओबरा, रेणुकूट वन और कैमूर वन्य जीव प्रभाग में हुई है। अब जब एनजीटी ने ऐसे मामलों को चिह्नित कर वन भूमि को वापस धारा चार में लेकर धारा बीस में शामिल करने का आदेश दिया है तो संबंधितों की धड़कनें बढ़ गई हैं। उधर, डीएफओ रेणुकूट तुलसीदास का कहना था कि उनके यहां अब तक सात सौ की सूची तैयार हो चुकी है। अभी सूची में और नाम बढ़ेंगे। जिनकी सूची बन चुकी है, उनका नामांतरण खारिज करने की भी प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।
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बनवासी सेवा आश्रम की याचिका के क्रम में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर 1986 में सर्वे सेटलमेंट प्रक्रिया अपनाई गई थी। इसके तहत मूल बाशिंदों को उनके जोत-कोड़, पुश्तैनी घर-मकान पर भौमिक अधिकार देना था। 1994 में इसे पूरा मानते हुए, रोक दिया गया। इस दौरान जिले में महज बारह गांव ही ऐसे बताए गए, जहां सर्वे प्रक्रिया जारी रहने की बात कही गई लेकिन इसकी आड़ लेकर अन्य गांवों में साधन संपन्न और बाहर से आए लोगों ने वन विभाग की जमीन पर पुश्तैनी दावा पेश कर जमीन हथियाने का खेल जारी रखा। दो वर्ष पूर्व प्रमुख सचिव वन रहे वीएन गर्ग के रिपोर्ट की मानें तो इस खेल में कई सफेदपोशों के साथ अधिकारियों ने खुले हाथों से लूट की।
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सबसे ज्यादा गड़बड़ी ओबरा, रेणुकूट वन और कैमूर वन्य जीव प्रभाग में हुई है। अब जब एनजीटी ने ऐसे मामलों को चिह्नित कर वन भूमि को वापस धारा चार में लेकर धारा बीस में शामिल करने का आदेश दिया है तो संबंधितों की धड़कनें बढ़ गई हैं। उधर, डीएफओ रेणुकूट तुलसीदास का कहना था कि उनके यहां अब तक सात सौ की सूची तैयार हो चुकी है। अभी सूची में और नाम बढ़ेंगे। जिनकी सूची बन चुकी है, उनका नामांतरण खारिज करने की भी प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।
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