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Sonebhadra News: मानवाधिकारों की रक्षा के लिए चुप्पी तोड़ें, खुलकर बोलें

Sat, 10 Dec 2022 04:30 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Sat, 10 Dec 2022 04:30 AM IST
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Break the silence to protect human rights, speak openly
आदिवासी बहुल जिले में मानवाधिकारों के उल्लंघन के मामले अक्सर आते हैं। यह बात दीगर है कि इनमें से बहुत कम मामले ही होते हैं, जो शिकायत बनकर आयोग तक पहुंचते हैं। ज्यादातर लोगों को अपने इन अधिकारों की जानकारी ही नहीं है। मानवाधिकारों के प्रति लोगों को सचेत करने के नाम पर जिले में कई संगठन जरूर हैं, लेकिन उनकी सक्रियता सिर्फ कागजों तक ही सीमित हैं या फिर इससे इतर कार्यों में वह लगे हुए हैं। लोगों को अपने मानवाधिकारों के बारे में बताने, उसके संरक्षण के लिए जागरूक करने के लिए हर साल दस दिसंबर को अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस मनाया जाता है। यह दिवस एक माध्यम भी है कि लोग उन अधिकारों के बारे में जानें, जो उन्हें संविधान से मिले हैं। उसकी महत्ता को पहचानें और उसकी सुरक्षा के लिए खुलकर आवाज उठा सकें।
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मानवाधिकार हर व्यक्ति का नैसर्गिक अधिकार
मानवाधिकार हर व्यक्ति का नैसर्गिक या प्राकृतिक अधिकार है। इसके दायरे में जीवन, आजादी, बराबरी और सम्मान का अधिकार आता है। इसके अलावा गरिमामय जीवन जीने का अधिकार, राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक अधिकार भी इसमें शामिल हैं। संयुक्त राष्ट्र द्वारा अपनाए गए मानवाधिकार संबंधी घोषणापत्र में भी कहा गया था कि मानव के बुनियादी अधिकार किसी भी जाति, धर्म, लिंग, समुदाय, भाषा, समाज आदि से इतर होते हैं। रही बात मौलिक अधिकारों की तो ये देश के संविधान में उल्लिखित अधिकार हैं। ये अधिकार देश के नागरिकों को और किन्हीं परिस्थितियों में देश में निवास कर रहे सभी लोगों को प्राप्त होते हैं।
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मानवाधिकारों के उल्लंघन पर पीड़ित व्यक्ति मानवाधिकार आयोग के कार्यालय में खुद जा कर या फिर पोस्टकार्ड के माध्यम से शिकायत दर्ज करा सकता है। अगर किसी के साथ पुलिस या प्रशासन अत्याचार कर रहा है तो वे भी अपनी शिकायत भेज सकते हैं। मौलिक अधिकारों के उलंघन पर अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट और अनुच्छेद 132 के तहत सुप्रीम कोर्ट में जा सकते हैं। आपके मानवाधिकार का हनन हो रहा तो मौन न रहें। अपने साथ ही दूसरों के पक्ष में भी आवाज उठाएं। -ज्वाला प्रसाद, वरिष्ठ अधिवक्ता।
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हर व्यक्ति को अपने मौलिक अधिकारों को जानने की जरूरत है। कई बार जागरूकता की कमी के कारण लोग शोषण के शिकार होते हैं और उसे सहते रहते हैं। अगर किसी को पुलिस गिरफ्तार करती है तो उसे 24 घंटे में अदालत के समझ पेश करे। महिलाओं की गिरफ्तारी रात में नहीं हो सकती। किसी को अगर पुलिस कोर्ट में पेश करने की बजाय थाने में कई दिनों तक बैठाए रखती है तो यह मानवाधिकार का उल्लंघन हैं। जेल में भी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का हनन नहीं किया जा सकता। -चंद्र प्रकाश द्विवेदी, वरिष्ठ अधिवक्ता।

व्यक्ति के जन्म से ही मानवाधिकार का दायरा शुरू हो जाता है। यह उन मूल अधिकारों के रक्षा की गारंटी देता है, जो हमें संविधान से मिले हैं। एक सीमा के बाद अगर किसी को लगता है कि उसके मानवाधिकारों का हनन हो रहा है तो वह आवाज उठा सकता है। इसके लिए कई फोरम बने हुए हैं। सक्षम प्राधिकारी नियुक्त हैं। न्यायालय इसका सबसे बड़ा सेफगार्ड है। आर्टिकल 226 और 132 के तहत हम कोर्ट में जा सकते हैं। इस वक्त सबसे ज्यादा जरूरी लोगों को इसके प्रति जागरूक होने की है। जब तक वह अपना हक नहीं जानेंगे, उसकी रक्षा कैसे करेंगे। -एसएस कात्यायन, विशेष लोक अभियोजक, एससी-एसटी एक्ट।
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