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अनिल के सामने रमेश तो फिर भिड़ रहे अविनाश और भूपेश
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पिछले पांच वर्षों में जिले की सियासत ने खूब करवटें बदली हैं। दलबदल के खेल ने समीकरणों को उलझा दिया है। कोई भी सीट इससे अछूती नहीं है। माहौल भले ही बदल गया हो, मगर सियासी अखाड़े में ताल ठोंकने वाले पहलवान इस बार भी वही हैं। जिले की ज्यादातर सीटों पर प्रमुख दलों ने उन्हीं चेहरों पर दांव लगाया है जो पिछली बार भी चुनावी समर में आमने-सामने थे। पिछले चुुनाव की गलतियों से सबक लेकर एक तरफ पराजित उम्मीदवार जीत पाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं तो दूसरी ओर विजेता प्रत्याशी वही इतिहास दोहराने के लिए कमर कस मैदान में उतर चुके हैं।
वर्ष 2017 के चुनाव में मोदी लहर के दौरान भाजपा और अपना दल-एस गठबंधन ने जिले की चारों सीटों पर जीत का परचम लहराया था। तब राबर्ट्सगंज सीट से भाजपा के भूपेश चौबे ने सपा के अविनाश कुशवाहा को मात दी थी तो घोरावल में भाजपा के डॉ. अनिल कुमार मौर्य ने सपा के रमेश दुबे को हराया था। दुद्धी सीट पर अपना दल-एस के हरिराम चेरो सपा प्रत्याशी विजय सिंह गोंड को पटखनी देकर विधायक बने थे। ओबरा में भाजपा के ही संजीव सिंह गोंड ने सपा के रवि सिंह गोंड को पराजित किया था। इस बार भी सियासी दंगल में यही चेहरे मैदान में हैं। घोरावल और राबर्ट्सगंज में सपा और भाजपा दोनों ने उम्मीदवार नहीं बदले हैं।
दुद्धी में सपा ने विजय सिंह गोंड को फिर उतारा है जबकि हरिराम चेरो कप प्लेट को छोड़ हाथी की सवारी कर रहे हैं। ओबरा में भाजपा ने तो वही उम्मीदवार दिया है लेकिन सपा ने रवि सिंह गोंड की जगह अरविंद कुमार गोंड को मौका दिया है। बसपा और कांग्रेस ने सभी सीटों के लिए अपने प्रत्याशी बदल दिए हैं। कई निर्दलीय और क्षेत्रीय दल भी मैदान में ताल ठोंककर सियासी माहौल को रोचक बनाने में जुटे हैं। पुराने मोहरों की बदौलत मैदान मारने में जुटे राजनीतिक दलों को नए समीकरणों में काफी मशक्कत करनी पड़ रही है। टिकट को लेकर खींचतान और प्रदेश स्तर पर हुई राजनीतिक उठापटक का असर स्थानीय स्तर पर दिखना तय माना जा रहा है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस बार प्रमुख दलों के चेहरे भले ही वही हैं, मगर लड़ाई बिलकुल नई है। लिहाजा इसे जीतने के लिए पासे भी नए ढंग से फेंकने होंगे।
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वर्ष 2017 के चुनाव में मोदी लहर के दौरान भाजपा और अपना दल-एस गठबंधन ने जिले की चारों सीटों पर जीत का परचम लहराया था। तब राबर्ट्सगंज सीट से भाजपा के भूपेश चौबे ने सपा के अविनाश कुशवाहा को मात दी थी तो घोरावल में भाजपा के डॉ. अनिल कुमार मौर्य ने सपा के रमेश दुबे को हराया था। दुद्धी सीट पर अपना दल-एस के हरिराम चेरो सपा प्रत्याशी विजय सिंह गोंड को पटखनी देकर विधायक बने थे। ओबरा में भाजपा के ही संजीव सिंह गोंड ने सपा के रवि सिंह गोंड को पराजित किया था। इस बार भी सियासी दंगल में यही चेहरे मैदान में हैं। घोरावल और राबर्ट्सगंज में सपा और भाजपा दोनों ने उम्मीदवार नहीं बदले हैं।
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दुद्धी में सपा ने विजय सिंह गोंड को फिर उतारा है जबकि हरिराम चेरो कप प्लेट को छोड़ हाथी की सवारी कर रहे हैं। ओबरा में भाजपा ने तो वही उम्मीदवार दिया है लेकिन सपा ने रवि सिंह गोंड की जगह अरविंद कुमार गोंड को मौका दिया है। बसपा और कांग्रेस ने सभी सीटों के लिए अपने प्रत्याशी बदल दिए हैं। कई निर्दलीय और क्षेत्रीय दल भी मैदान में ताल ठोंककर सियासी माहौल को रोचक बनाने में जुटे हैं। पुराने मोहरों की बदौलत मैदान मारने में जुटे राजनीतिक दलों को नए समीकरणों में काफी मशक्कत करनी पड़ रही है। टिकट को लेकर खींचतान और प्रदेश स्तर पर हुई राजनीतिक उठापटक का असर स्थानीय स्तर पर दिखना तय माना जा रहा है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस बार प्रमुख दलों के चेहरे भले ही वही हैं, मगर लड़ाई बिलकुल नई है। लिहाजा इसे जीतने के लिए पासे भी नए ढंग से फेंकने होंगे।
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