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वातररण में घुल रही है राख

Wed, 26 Oct 2016 11:58 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो/ सोनभद्र
अमर उजाला ब्यूरो/ सोनभद्र Updated Wed, 26 Oct 2016 11:58 PM IST
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 Ash in the atmosphere is dissolved
वातररण में घुल रही है राख
देश के तीसरे सर्वाधिक प्रदूषित क्षेत्र का दर्जा पा चुके ऊर्जांचल के बिजलीघरों से हर साल 28.078 (दो करोड़ अस्सी लाख 78 हजार) मिलियन टन राख उत्सर्जित हो रही है। इसमें महज 3.609 (36 लाख नौ हजार) मिलियन टन राख का ही सही निस्तारण हो रहा है। शेष 24.469 (दो करोड़ 44 लाख 69 हजार) मिलियन टन राख ऊर्जांचल के आबोहवा में घुलकर यहां की मिट्टी और बाशिंदों को बीमार बना रही है। यह हाल तब है, जब एनजीटी की कोर कमेटी 2020 तक स्थिति विस्फोटक मोड़ पर पहुंचने की चेतावनी दे चुकी है।
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केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के हालिया आंकड़े बताते हैं कि ऊर्जांचल (सोनभद्र-सिंगरौली) स्थित कुल 18838 मेगावाट क्षमता वाले, एनटीपीसी विंध्याचल, रिहंदनगर, सिंगरौली, रिलायंस का सासन पावर प्रोजेक्ट, राज्य सेक्टर का ओबरा, अनपरा और निजी क्षेत्र के लैंको में प्रतिवर्ष 82.176 (आठ करोड़ 21 लाख 76 हजार) मिलियन टन कोयले की खपत है। इसमें 28 मिलियन टन से अधिक राख निकल रही है।20 अगस्त 2015 को एनजीटी में सौंपी गई रिपोर्ट में कोर कमेटी ने इसको लेकर काफी चिंता जताई थी। इस पर एनजीटी ने उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश सरकार के साथ परियोजना प्रबंधनों को ऐश डैमों से इतर व्यवस्था के तहत शत-प्रतिशत राख निस्तारण का निर्देश  दिया था।
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रिपोर्ट में कहा गया था कि लगभग सभी ऐश डैम भरने के कगार पर है। समय रहते ध्यान नहीं दिया गया तो 2020 तक स्थिति विस्फोटक हो सकती है।संबंधितों की तरफ से एनजीटी को जरूरी पहल का आश्वासन दिया गया था लेकिन पिछले माह सीपीसीबी के अधिकारी डा. एसके पालीवाल के हवाले से जो आंकड़े आए, उसने चौंका कर रख दिया है। इसमें स्पष्ट है कि प्रतिवर्ष ऊर्जांचल की आबोहवा में 2.44 करोड़ टन राख घुल रही है। जिसका सीधा  असर यहां की मिट्टी, हवा,      पानी और लोगों के स्वास्थ्य पर  पड़ रहा है।
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