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टीबी के मरीज बीच में छोड़ देते हैं इलाज
ब्यूरो/ अमर उजाला /सोनभद्र
Updated Tue, 22 Mar 2016 09:22 PM IST
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जिले में क्षय रोग (तपेदिक) रोग के ज्यादातर मरीज बीच में ही इलाज छोड़ देते हैं। वजह कि वे घर से दूर डाट्स केंद्रों पर नहीं पहुंच पाते। जानकारी के अभाव में कई मरीज जिला अस्पताल का भी चक्कर काटते नजर आते हैं। ऐसे मरीज फिर बीमार होने पर वायरस के जरिए दूसरों को भी बीमार बना देते हैं। जिले में 1900 मरीज टीबी से पीड़ित हैं। जबकि 25 ऐसे मरीज हैं जो मल्टी ड्रग रेजिस्टेंट टीबी से प्रभावित हैं। इन मरीजों का उपचार जिले में संचालित 26 डाट्स सेंटरों से हो रहा है।
जिलेे में 31 मार्च के बीच विश्व क्षय रोग दिवस मनाया जाना है। इसके तहत टीबी के मरीजों को जागरूक किया जाना है ताकि उन्हें इस जानलेवा बीमारी से बचाया जा सके। यहां कुल 26 डाट्स सेंटर संचालित हैं और 1900 मरीज हैं लेकिन इन डाट्स सेंटरों पर मरीजों का उपचार नाममात्र ही होता है। अक्सर सेंटरों के बंद होने के नाते मरीज जिला अस्पताल का चक्कर लगाना पड़ता है। जिला क्षय रोग अधिकारी डा. आरबी गौतम कहते हैं कि यहां से टीबी की जांच के लिए सैंपल बीएचयू भेजा जाता है।
वहां से आई हुई रिपोर्ट के आधार पर मरीज को एक सप्ताह के उपचार के लिए फिर बीएचयू भेजा जाता है। फिर वहां से लौटकर आने पर मरीज को उसके घर के नजदीकी डाट्स सेंटरों से दवाएं दी जाती हैं। बताया कि ज्यादातर ऐसे मरीज होते हैं जो बीच में ही इलाज छोड़ देते हैं। ऐसे मरीज दोबारा बीमार होने पर काफी खतरनाक हो जाते हैं। डॉ. गौतम ने बताया कि टीबी मरीजों को दवाएं देने के लिए छह सुपरवाइजर तैनात किए गए हैं।
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जिलेे में 31 मार्च के बीच विश्व क्षय रोग दिवस मनाया जाना है। इसके तहत टीबी के मरीजों को जागरूक किया जाना है ताकि उन्हें इस जानलेवा बीमारी से बचाया जा सके। यहां कुल 26 डाट्स सेंटर संचालित हैं और 1900 मरीज हैं लेकिन इन डाट्स सेंटरों पर मरीजों का उपचार नाममात्र ही होता है। अक्सर सेंटरों के बंद होने के नाते मरीज जिला अस्पताल का चक्कर लगाना पड़ता है। जिला क्षय रोग अधिकारी डा. आरबी गौतम कहते हैं कि यहां से टीबी की जांच के लिए सैंपल बीएचयू भेजा जाता है।
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वहां से आई हुई रिपोर्ट के आधार पर मरीज को एक सप्ताह के उपचार के लिए फिर बीएचयू भेजा जाता है। फिर वहां से लौटकर आने पर मरीज को उसके घर के नजदीकी डाट्स सेंटरों से दवाएं दी जाती हैं। बताया कि ज्यादातर ऐसे मरीज होते हैं जो बीच में ही इलाज छोड़ देते हैं। ऐसे मरीज दोबारा बीमार होने पर काफी खतरनाक हो जाते हैं। डॉ. गौतम ने बताया कि टीबी मरीजों को दवाएं देने के लिए छह सुपरवाइजर तैनात किए गए हैं।
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