{"_id":"5bc8cf6dbdec2269774efe1e","slug":"71539886957-sonebhadra-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"अब भी दहाड़ रहा है समस्याओं का दशानन","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
अब भी दहाड़ रहा है समस्याओं का दशानन
Updated Thu, 18 Oct 2018 11:52 PM IST
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सोनभद्र। असत्य पर सत्य की जीत का प्रतीक दशहरा शुक्रवार को मनाया जाएगा। प्रतीकात्मक रूप से श्रीराम द्वारा लंका नरेश दशानन का वध किया जाएगा। यह वध बुराई का होगा और जीत अच्छाई की होगी। लेकिन असल जिंदगी में बुराई अब भी भारी है और समस्याओं का दशानन अब भी दहाड़ मार रहा है। यूपी को सर्वाधिक राजस्व देने वाले सोनभद्र में समस्याएं सिर उठाकर खड़ी हैं। नशे का बढ़ता कारोबार, युवाओं का लगातार नशे की जद में आना, भयावह होती प्रदूषण की स्थिति, बढ़ता कुपोषण, अशिक्षा जैसी तमाम समस्याएं ऐसी हैं, जो लगातार चुनौती बनती जा रही हैं। लेकिन इन पर नियंत्रण की सारी कवायदें बेकार साबित हो रही हैं।
नशा:- जिले में नशे का कारोबार तेजी से बढ़ रहा है। हेरोइन और गांजा की बिकी थम नहीं रही है। युवा लगातार नशे की जाल में फंसते जा रहे हैं और अपना सब कुछ गवां बैठ रहे हैं। कहने को पुलिस लगातार नशे के कारोबार पर अंकुश लगाने का प्रयास कर रही है। आए दिन हेरोइन के साथ कारोबारी पकड़े जा रहे हैं, लेकिन कारोबार पर नियंत्रण नहीं हो रहा है। जिले में प्रतिदिन करीब 50 लाख से अधिक का हेरोइन का कारोबार होने की आशंका है।
सड़कें:- किसी भी क्षेत्र के विकास में सड़कों की अहम भूमिका होती है। कहा जाता है कि किसी इलाके में पहुंच के साधन होंगे तभी उस क्षेत्र का विकास होगा। लेकिन जिले में तमाम ऐसे इलाके हैं, जहां सड़कें जर्जर हैं। उन पर सुरक्षित चलना भी मुश्किल होता है। यूपी सरकार ने गड्ढामुक्त सड़कों का एलान किया था। इस पर कार्य भी किया लेकिन नक्सल प्रभावित क्षेत्रों की सड़कें अब तक सही नहीं हो सकीं। यहां तक की वाराणसी-शक्तिनगर मार्ग से जुड़े लिंक मार्ग भी जर्जर पड़े हैं। सड़कों पर अरबों रुपये खर्च होने के बावजूद स्थिति काफी खराब है।
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चिकित्सा:- जिले में चिकित्सा की व्यवस्था बेहद खराब है। स्वास्थ्य सुविधा के नाम पर महज भवन खड़े हैं। उनमें मानव संसाधन की व्यवस्था नहीं है। इसका खामियाजा जिले के लोगों को भुगतना पड़ रहा है। वर्षों से बर्न यूनिट, ट्रॉमा सेंटर, टीबी अस्पताल, मैटर्निटी अस्पताल, कार्डियोलाजी सेंटर आदि जिला अस्पताल परिसर में बनकर तैयार पड़ा है। लेकिन उन पर अब भी ताला लटक रहा है। ये अस्पताल महज भवन बनकर हैं। इनमें डॉक्टर और पैरामेडिकल स्टॉफ की तैनाती अब तक नहीं हो सकी है। ग्रामीण इलाकों में भी अस्पताल भवन हैं लेकिन डॉक्टर नहीं हैं।
प्रदूषण:- जिले की आबोहवा प्रदूषित हो गई है। राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) ने जिले में बढ़ते प्रदूषण पर भी चिंता जताई है लेकिन यहां स्थिति में सुधार की जगह और भयावह होती जा रही है। यहां पानी में पारा, फ्लोराइड की अधिकता इतनी ज्यादा हो गई है कि लोगों को शुद्घ पानी नहीं मिल पा रहा है। औद्योगिक क्षेत्रों से निकलने वाला कचरा, धूल, फ्लाई ऐश परेशानी का सबब बने हुए हैं। प्रदूषण की अधिकता की वजह से लोग तमाम तरह की बीमारियों के शिकार हो रहे हैं।
बिजली:- सोनभद्र का पॉवर का हब कहा जाता है। यहां एनटीपीसी, जल और ताप विद्युत परियोजनाएं हैं। इन परियोजनाओं से देश के तमाम इलाके रोशन हो रहे हैं। लेकिन चिराग तले अंधेरा की कहावत यहां चरितार्थ हो रही है। जिले के नक्सल और दूरस्थ गांवों में अब भी बिजली की रोशनी नहीं पहुंच सकी है। हालांकि प्रशासन ने वैकल्पिक व्यवस्था के तहत सौर उर्जा का सहारा लिया है लेकिन वह नाकाफी साबित हो रहा है। जिन इलाकों में विद्युत आपूर्ति हो भी रही है, वहां आए दिन विद्युत कटौती और तकनीकी समस्या से लोग जूझ रहे हैं।
कुपोषण:- सरकारें कुपोषण को दूर भगाने का जितना प्रयास कर रही हैं, यह समस्या उतनी ही बढ़ती जा रही है। कुपोषण को दूर करने के लिए पोषाहार योजना संचालित हो रही है। किशोरियों, बच्चों को कुपोषण से मुक्त करने के लिए अभियान तक चलाया जा रहा है। लेकिन जिला कार्यक्रम अधिकारी कार्यालय से मिले आंकड़ों पर गौर करें तो करीब 50 हजार से अधिक बच्चे, किशोरियां कुपोषण की जद में हैं। गरीबी और पिछड़ेपन के चलते लोगों को दो वक्त का पौष्टिक आहार सही मायने में नहीं मिल पा रहा है। इससे लोग कुपोषित हैं। जिले के 1825 आंगनबाड़ी केंद्रों से जुड़ी आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों के साथ ही पूरा प्रशासनिक अमला कुपोषण को दूर करने के प्रयास में जुटा पड़ा है।
अशिक्षा:- जिले के पिछड़ेपन की मूल वजह अशिक्षा को माना जा रहा है। गांव-गांव में परिषदीय विद्यालयों के खुलने के साथ ही ब्लाक स्तर पर माध्यमिक विद्यालय, तमाम जगहों पर उच्च स्तरीय शिक्षा की व्यवस्था अब हो गई है लेकिन इन सबके बावजूद अब भी महिलाओं की साक्षरता दर पुरूषों की तुलना में करीब 20 फीसदी कम है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार पुरूषों की साक्षरता दर 74.92 है जबकि महिलाओं की दर 52.14 है। वर्ष 2001 की तुलना में साक्षरता दर में काफी सुधार हुआ है। वर्ष 2001 में पुरूषों की साक्षरता दर 62.95 और महिलाओं की साक्षरता दर 33.70 फीसदी थी।
जाम:- जिले में जाम की समस्या से अब तक लोगों को निजात नहीं मिल सकी है। राबर्ट्सगंज बाजार सकरा होने के नाते दोपहर में बच्चों की छुुट्टी के दौरान स्कूली बस आने-जाने से जाम लग जाता है। इससे लोगों को परेशानी होती है। इसी तरह मारकुंडी में अक्सर वाहनों की जांच के दौरान चालक अपने ट्रकों को जहां-तहां छोड़कर फरार हो जाते हैं, या फिर कहीं वाहन खराब हो जाता है तो जाम लग जाता है। बीजपुर में सिरसोती से पुनर्वास प्रथम तक की सड़क पर आए दिन वाहनों के खराब होने से दस से 12 घंटे जाम लगा रहता है। इससे तमाम तरह की परेशानी लोगों को झेलनी पड़ती है।
दुर्घटना:- वाराणसी-शक्तिनगर मार्ग की पहचान किलर रोड के रूप में हो चुकी है। इस मार्ग पर आए दिन सड़क हादसे होते रहते हैं। पिछले 15 दिनों में करीब 20 से अधिक मौतें सड़क दुर्घटना में हो चुकी हैं। इसकी वजह वाहनों की तेज रफ्तार है। पुलिस और परिवहन विभाग के अधिकारी वाहनों की तेज रफ्तार पर अंकुश नहीं लगा पा रहे हैं। इसकी वजह से आए दिन दुर्घटनाओं में तमाम लोगों के घरों में मामत पसर जा रहा है। आंकड़ों पर गौर करें तो प्रति माह जिले में महज सड़क हादसे में करीब 30 से 40 लोगों की मौत होती है। इस समस्या से निजात के लिए अब तक परिवहन और पुलिस विभाग कोई ठोस पहल नहीं कर सका है।
फ्लाईओवर:- जिले में वाराणसी-शक्तिनगर मार्ग पर राबर्ट्सगंज में फ्लाईओवर का निर्माण कुछ वर्ष पूर्व हुआ था। तब से अब तक फ्लाईओवर के नीचे की सड़कों की पिचिंग, बैरिकेटिंग आदि का कार्य अब तक अधूरा पड़ा हुआ है। कई जिलाधिकारियों ने फ्लाईओवर के नीचे की सड़क को बनवाने का निर्देश दिया। बारिश के दिनों में फ्लाईओवर से गिरने वाले पानी की समस्या से निजात के लिए संबंधित कंपनी के अधिकारियों को निर्देश दिया लेकिन यह समस्या अब भी जस की तस है। नीचे के क्षेत्र में बैरिकेटिंग न होने से अक्सर किसी न किसी पीलर के पास से तेज गति से निकलने वाले बाइक सवार किसी न किसी वाहन से टकरा जाते हैं। इससे लोग आये दिन घायल होते रहते हैं। इस समस्या से अब तक निजात नहीं मिल सका है।
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नशा:- जिले में नशे का कारोबार तेजी से बढ़ रहा है। हेरोइन और गांजा की बिकी थम नहीं रही है। युवा लगातार नशे की जाल में फंसते जा रहे हैं और अपना सब कुछ गवां बैठ रहे हैं। कहने को पुलिस लगातार नशे के कारोबार पर अंकुश लगाने का प्रयास कर रही है। आए दिन हेरोइन के साथ कारोबारी पकड़े जा रहे हैं, लेकिन कारोबार पर नियंत्रण नहीं हो रहा है। जिले में प्रतिदिन करीब 50 लाख से अधिक का हेरोइन का कारोबार होने की आशंका है।
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सड़कें:- किसी भी क्षेत्र के विकास में सड़कों की अहम भूमिका होती है। कहा जाता है कि किसी इलाके में पहुंच के साधन होंगे तभी उस क्षेत्र का विकास होगा। लेकिन जिले में तमाम ऐसे इलाके हैं, जहां सड़कें जर्जर हैं। उन पर सुरक्षित चलना भी मुश्किल होता है। यूपी सरकार ने गड्ढामुक्त सड़कों का एलान किया था। इस पर कार्य भी किया लेकिन नक्सल प्रभावित क्षेत्रों की सड़कें अब तक सही नहीं हो सकीं। यहां तक की वाराणसी-शक्तिनगर मार्ग से जुड़े लिंक मार्ग भी जर्जर पड़े हैं। सड़कों पर अरबों रुपये खर्च होने के बावजूद स्थिति काफी खराब है।
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चिकित्सा:- जिले में चिकित्सा की व्यवस्था बेहद खराब है। स्वास्थ्य सुविधा के नाम पर महज भवन खड़े हैं। उनमें मानव संसाधन की व्यवस्था नहीं है। इसका खामियाजा जिले के लोगों को भुगतना पड़ रहा है। वर्षों से बर्न यूनिट, ट्रॉमा सेंटर, टीबी अस्पताल, मैटर्निटी अस्पताल, कार्डियोलाजी सेंटर आदि जिला अस्पताल परिसर में बनकर तैयार पड़ा है। लेकिन उन पर अब भी ताला लटक रहा है। ये अस्पताल महज भवन बनकर हैं। इनमें डॉक्टर और पैरामेडिकल स्टॉफ की तैनाती अब तक नहीं हो सकी है। ग्रामीण इलाकों में भी अस्पताल भवन हैं लेकिन डॉक्टर नहीं हैं।
प्रदूषण:- जिले की आबोहवा प्रदूषित हो गई है। राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) ने जिले में बढ़ते प्रदूषण पर भी चिंता जताई है लेकिन यहां स्थिति में सुधार की जगह और भयावह होती जा रही है। यहां पानी में पारा, फ्लोराइड की अधिकता इतनी ज्यादा हो गई है कि लोगों को शुद्घ पानी नहीं मिल पा रहा है। औद्योगिक क्षेत्रों से निकलने वाला कचरा, धूल, फ्लाई ऐश परेशानी का सबब बने हुए हैं। प्रदूषण की अधिकता की वजह से लोग तमाम तरह की बीमारियों के शिकार हो रहे हैं।
बिजली:- सोनभद्र का पॉवर का हब कहा जाता है। यहां एनटीपीसी, जल और ताप विद्युत परियोजनाएं हैं। इन परियोजनाओं से देश के तमाम इलाके रोशन हो रहे हैं। लेकिन चिराग तले अंधेरा की कहावत यहां चरितार्थ हो रही है। जिले के नक्सल और दूरस्थ गांवों में अब भी बिजली की रोशनी नहीं पहुंच सकी है। हालांकि प्रशासन ने वैकल्पिक व्यवस्था के तहत सौर उर्जा का सहारा लिया है लेकिन वह नाकाफी साबित हो रहा है। जिन इलाकों में विद्युत आपूर्ति हो भी रही है, वहां आए दिन विद्युत कटौती और तकनीकी समस्या से लोग जूझ रहे हैं।
कुपोषण:- सरकारें कुपोषण को दूर भगाने का जितना प्रयास कर रही हैं, यह समस्या उतनी ही बढ़ती जा रही है। कुपोषण को दूर करने के लिए पोषाहार योजना संचालित हो रही है। किशोरियों, बच्चों को कुपोषण से मुक्त करने के लिए अभियान तक चलाया जा रहा है। लेकिन जिला कार्यक्रम अधिकारी कार्यालय से मिले आंकड़ों पर गौर करें तो करीब 50 हजार से अधिक बच्चे, किशोरियां कुपोषण की जद में हैं। गरीबी और पिछड़ेपन के चलते लोगों को दो वक्त का पौष्टिक आहार सही मायने में नहीं मिल पा रहा है। इससे लोग कुपोषित हैं। जिले के 1825 आंगनबाड़ी केंद्रों से जुड़ी आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों के साथ ही पूरा प्रशासनिक अमला कुपोषण को दूर करने के प्रयास में जुटा पड़ा है।
अशिक्षा:- जिले के पिछड़ेपन की मूल वजह अशिक्षा को माना जा रहा है। गांव-गांव में परिषदीय विद्यालयों के खुलने के साथ ही ब्लाक स्तर पर माध्यमिक विद्यालय, तमाम जगहों पर उच्च स्तरीय शिक्षा की व्यवस्था अब हो गई है लेकिन इन सबके बावजूद अब भी महिलाओं की साक्षरता दर पुरूषों की तुलना में करीब 20 फीसदी कम है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार पुरूषों की साक्षरता दर 74.92 है जबकि महिलाओं की दर 52.14 है। वर्ष 2001 की तुलना में साक्षरता दर में काफी सुधार हुआ है। वर्ष 2001 में पुरूषों की साक्षरता दर 62.95 और महिलाओं की साक्षरता दर 33.70 फीसदी थी।
जाम:- जिले में जाम की समस्या से अब तक लोगों को निजात नहीं मिल सकी है। राबर्ट्सगंज बाजार सकरा होने के नाते दोपहर में बच्चों की छुुट्टी के दौरान स्कूली बस आने-जाने से जाम लग जाता है। इससे लोगों को परेशानी होती है। इसी तरह मारकुंडी में अक्सर वाहनों की जांच के दौरान चालक अपने ट्रकों को जहां-तहां छोड़कर फरार हो जाते हैं, या फिर कहीं वाहन खराब हो जाता है तो जाम लग जाता है। बीजपुर में सिरसोती से पुनर्वास प्रथम तक की सड़क पर आए दिन वाहनों के खराब होने से दस से 12 घंटे जाम लगा रहता है। इससे तमाम तरह की परेशानी लोगों को झेलनी पड़ती है।
दुर्घटना:- वाराणसी-शक्तिनगर मार्ग की पहचान किलर रोड के रूप में हो चुकी है। इस मार्ग पर आए दिन सड़क हादसे होते रहते हैं। पिछले 15 दिनों में करीब 20 से अधिक मौतें सड़क दुर्घटना में हो चुकी हैं। इसकी वजह वाहनों की तेज रफ्तार है। पुलिस और परिवहन विभाग के अधिकारी वाहनों की तेज रफ्तार पर अंकुश नहीं लगा पा रहे हैं। इसकी वजह से आए दिन दुर्घटनाओं में तमाम लोगों के घरों में मामत पसर जा रहा है। आंकड़ों पर गौर करें तो प्रति माह जिले में महज सड़क हादसे में करीब 30 से 40 लोगों की मौत होती है। इस समस्या से निजात के लिए अब तक परिवहन और पुलिस विभाग कोई ठोस पहल नहीं कर सका है।
फ्लाईओवर:- जिले में वाराणसी-शक्तिनगर मार्ग पर राबर्ट्सगंज में फ्लाईओवर का निर्माण कुछ वर्ष पूर्व हुआ था। तब से अब तक फ्लाईओवर के नीचे की सड़कों की पिचिंग, बैरिकेटिंग आदि का कार्य अब तक अधूरा पड़ा हुआ है। कई जिलाधिकारियों ने फ्लाईओवर के नीचे की सड़क को बनवाने का निर्देश दिया। बारिश के दिनों में फ्लाईओवर से गिरने वाले पानी की समस्या से निजात के लिए संबंधित कंपनी के अधिकारियों को निर्देश दिया लेकिन यह समस्या अब भी जस की तस है। नीचे के क्षेत्र में बैरिकेटिंग न होने से अक्सर किसी न किसी पीलर के पास से तेज गति से निकलने वाले बाइक सवार किसी न किसी वाहन से टकरा जाते हैं। इससे लोग आये दिन घायल होते रहते हैं। इस समस्या से अब तक निजात नहीं मिल सका है।