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सोनभद्र के वायुमंडल में तैर रही मरकरी
Updated Tue, 18 Sep 2018 12:13 AM IST
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सोनभद्र। कोयला खदानों से हर दिन निकलता हजारों टन कोयला और बिजली परियोजनाओं से हर दिन निकलती हजारों टन फ्लाई ऐश के चलते सोनभद्र-सिंगरौली के वायुमंडल में मरकरी जैसे खतरनाक रासायनिक तत्व तैरने लगे हैं। सात-आठ माह पूर्व जिले में आई एनजीटी की कोर कमेटी ने यहां की हवा में 173 से 521 माइक्रोग्राम घनमीटर तक मरकरी की मौजूदगी बताई है।
राबर्ट्र्सगंज में सोमवार को क्लाइमेट ट्रेंड्स संस्था की तरफ से वायु प्रदूषण को लेकर हुई कार्यशाला में इसका खुलासा किया गया तो हर किसी के पेशानी पर बल पड़ गए। लोक विज्ञान संस्थान देहरादून के रिसर्च एंड टेक्निकल हेड अनिल गौतम के अनुसार यह स्थिति तब सामने आई है, जब यहां के हवा में मरकरी, लेड जैसे खतरनाक रासायनिक तत्वों के नियमित निगरानी की व्यवस्था मुकम्मल रूप से अभी तक नहीं हो पाया है। उनका कहना था कि फिलहाल स्थिति के निगरानी का दायित्व राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को सौंपा गया है, लेकिन इसको लेकर विस्तृत अध्ययन के लिए जिले में एक केंद्र की जरूरत है। यह भी बताया कि हवा में मरकरी का मानक अभी तक 12 माइक्राग्राम घनमीटर प्रस्तावित किया गया है। अगर इसको हम पुष्ट माने तो भी यहां के हालात कितने खराब हो चुके हैं, यह बताने के लिए ऊपर का आंकड़ा काफी है। उन्होंने फ्लोराइड, आर्सेनिक, लेड, क्लोरीन को लेकर कई आंकड़े दर्शाए और स्थिति को खतरनाक बताते हुए, मानव जीवन बचाए रखने के लिए अभी से ठोस पहल की जरूरत जताई। पर्यावरणविद सीमा, वरिष्ठ अनुसंधानकर्ता ऐश्वर्या, धर्मेंद्र सिंह भदौर्या, ओम अवस्थी ने भी प्रदूषण पर अपने विचार रखे और इस पर अंकुश के लिए जागरूकता को जरूरी बताया। एनजीटी की तरफ से तय किए मानक की क्या स्थिति है, उसका पालन किस रूप में संभव है, इस पर भी लोगों ने विचार व्यक्त किए।
प्रतिवर्ष 1030 करोड़ टन जला रहे कोयला
सोनभद्र। मरकरी उत्सर्जन का बड़ा कारण माने जाने वाले कोयले की खपत की स्थिति यह है कि सोनभद्र-सिंगरौली में प्रतिदिन 21 हजार मेगावाट विद्युत उत्पादन के लिए, प्रतिवर्ष 1030 करोड़ टन कोयला जलाया जा रहा है। एनजीटी कोर कमेटी के रिपोर्ट के मुताबिक इससे प्रतिवर्ष 6500 टन श्वसनीय धूल कण, 79017 टन सल्फर डाई ऑक्साइड, 89948 टन प्रतिवर्ष नाइट्रोजल आक्साइड और 14.169 टन प्रतिवर्ष पारा यहां के वायुमंडल में घुल रहा है। पर्यावरण वैज्ञानिक अनिल गौतम का कहना था कि इसके रोकथाम के लिए जरूरी है कि नियमों, निर्देशों का कड़ाई से पालन हो और इसके नियमित निगरानी के लिए अलग से एक केंद्र की व्यवस्था हो।
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सोनभद्र के वायुमंडल में तैर रही मरकरी
173 से 521 माइक्रोग्राम घनमीटर तक मौजूदगी
वायु प्रदूषण पर हुई कार्यशाला में किया खुलासा
एनजीटी के कोर कमेटी की तरफ से आई रिपोर्ट
- फोटो - 12
अमर उजाला ब्यूरो
सोनभद्र। कोयला खदानों से हर दिन निकलता हजारों टन कोयला और बिजली परियोजनाओं से हर दिन निकलती हजारों टन फ्लाई ऐश के चलते सोनभद्र-सिंगरौली के वायुमंडल में मरकरी जैसे खतरनाक रासायनिक तत्व तैरने लगे हैं। सात-आठ माह पूर्व जिले में आई एनजीटी की कोर कमेटी ने यहां की हवा में 173 से 521 माइक्रोग्राम घनमीटर तक मरकरी की मौजूदगी बताई है।
राबट्र्सगंज में सोमवार को क्लाइमेट ट्रेंड्स संस्था की तरफ से वायु प्रदूषण को लेकर हुई कार्यशाला में इसका खुलासा किया गया तो हर किसी के पेशानी पर बल पड़ गए। लोक विज्ञान संस्थान देहरादून के रिसर्च एंड टेक्निकल हेड अनिल गौतम की माने तो यह स्थिति तब सामने आई है, जब यहां के हवा में मरकरी, लेड जैसे खतरनाक रासायनिक तत्वों के नियमित निगरानी की व्यवस्था मुकम्मल रूप से अभी तक नहीं हो पाया है। उनका कहना था कि फिलहाल स्थिति के निगरानी का दायित्व राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को सौंपा गया है, लेकिन इसको लेकर विस्तृत अध्ययन के लिए जिले में एक केंद्र की जरूरत है। यह भी बताया कि हवा में मरकरी का मानक अभी तक 12 माइक्राग्राम घनमीटर प्रस्तावित किया गया है। अगर इसको हम पुष्ट मानें तो भी यहां के हालात कितने खराब हो चुके हैं, यह बताने के लिए ऊपर का आंकड़ा काफी है। उन्होंने फ्लोराइड, आर्सेनिक, लेड, क्लोरीन को लेकर कई आंकड़े दर्शाए और स्थिति को खतरनाक बताते हुए, मानव जीवन बचाए रखने के लिए अभी से ठोस पहल की जरूरत जताई। पर्यावरणविद सीमा, वरिष्ठ अनुसंधानकर्ता ऐश्वर्या, धर्मेंद्र सिंह भदौर्या, ओम अवस्थी ने भी प्रदूषण पर अपने विचार रखे और इस पर अंकुश के लिए जागरूकता को जरूरी बताया। एनजीटी की तरफ से तय किए मानक की क्या स्थिति है, उसका पालन किस रूप में संभव है, इस पर भी लोगों ने खुलकर विचार व्यक्त किए।
इनसेट
प्रतिवर्ष 1030 करोड़ टन जला रहे कोयला
सोनभद्र। मरकरी उत्सर्जन का बड़ा कारण माने जाने वाले कोयले की खपत की स्थिति यह है कि सोनभद्र-सिंगरौली में प्रतिदिन 21 हजार मेगावाट विद्युत उत्पादन के लिए, प्रतिवर्ष 1030 करोड़ टन कोयला जलाया जा रहा है। एनजीटी कोर कमेटी के रिपोर्ट के मुताबिक इससे प्रतिवर्ष 6500 टन श्वसनीय धूल कण, 79017 टन सल्फर डाई ऑक्साइड, 89948 टन प्रतिवर्ष नाइट्रोजल आक्साइड और 14.169 टन प्रतिवर्ष पारा यहां के वायुमंडल में घुल रहा है। पर्यावरण वैज्ञानिक अनिल गौतम का कहना था कि इसके रोकथाम के लिए जरूरी है कि नियमों, निर्देशों का कड़ाई से पालन हो और इसके नियमित निगरानी के लिए अलग से एक केंद्र की व्यवस्एथा हो।
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राबर्ट्र्सगंज में सोमवार को क्लाइमेट ट्रेंड्स संस्था की तरफ से वायु प्रदूषण को लेकर हुई कार्यशाला में इसका खुलासा किया गया तो हर किसी के पेशानी पर बल पड़ गए। लोक विज्ञान संस्थान देहरादून के रिसर्च एंड टेक्निकल हेड अनिल गौतम के अनुसार यह स्थिति तब सामने आई है, जब यहां के हवा में मरकरी, लेड जैसे खतरनाक रासायनिक तत्वों के नियमित निगरानी की व्यवस्था मुकम्मल रूप से अभी तक नहीं हो पाया है। उनका कहना था कि फिलहाल स्थिति के निगरानी का दायित्व राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को सौंपा गया है, लेकिन इसको लेकर विस्तृत अध्ययन के लिए जिले में एक केंद्र की जरूरत है। यह भी बताया कि हवा में मरकरी का मानक अभी तक 12 माइक्राग्राम घनमीटर प्रस्तावित किया गया है। अगर इसको हम पुष्ट माने तो भी यहां के हालात कितने खराब हो चुके हैं, यह बताने के लिए ऊपर का आंकड़ा काफी है। उन्होंने फ्लोराइड, आर्सेनिक, लेड, क्लोरीन को लेकर कई आंकड़े दर्शाए और स्थिति को खतरनाक बताते हुए, मानव जीवन बचाए रखने के लिए अभी से ठोस पहल की जरूरत जताई। पर्यावरणविद सीमा, वरिष्ठ अनुसंधानकर्ता ऐश्वर्या, धर्मेंद्र सिंह भदौर्या, ओम अवस्थी ने भी प्रदूषण पर अपने विचार रखे और इस पर अंकुश के लिए जागरूकता को जरूरी बताया। एनजीटी की तरफ से तय किए मानक की क्या स्थिति है, उसका पालन किस रूप में संभव है, इस पर भी लोगों ने विचार व्यक्त किए।
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प्रतिवर्ष 1030 करोड़ टन जला रहे कोयला
सोनभद्र। मरकरी उत्सर्जन का बड़ा कारण माने जाने वाले कोयले की खपत की स्थिति यह है कि सोनभद्र-सिंगरौली में प्रतिदिन 21 हजार मेगावाट विद्युत उत्पादन के लिए, प्रतिवर्ष 1030 करोड़ टन कोयला जलाया जा रहा है। एनजीटी कोर कमेटी के रिपोर्ट के मुताबिक इससे प्रतिवर्ष 6500 टन श्वसनीय धूल कण, 79017 टन सल्फर डाई ऑक्साइड, 89948 टन प्रतिवर्ष नाइट्रोजल आक्साइड और 14.169 टन प्रतिवर्ष पारा यहां के वायुमंडल में घुल रहा है। पर्यावरण वैज्ञानिक अनिल गौतम का कहना था कि इसके रोकथाम के लिए जरूरी है कि नियमों, निर्देशों का कड़ाई से पालन हो और इसके नियमित निगरानी के लिए अलग से एक केंद्र की व्यवस्था हो।
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सोनभद्र के वायुमंडल में तैर रही मरकरी
173 से 521 माइक्रोग्राम घनमीटर तक मौजूदगी
वायु प्रदूषण पर हुई कार्यशाला में किया खुलासा
एनजीटी के कोर कमेटी की तरफ से आई रिपोर्ट
- फोटो - 12
अमर उजाला ब्यूरो
सोनभद्र। कोयला खदानों से हर दिन निकलता हजारों टन कोयला और बिजली परियोजनाओं से हर दिन निकलती हजारों टन फ्लाई ऐश के चलते सोनभद्र-सिंगरौली के वायुमंडल में मरकरी जैसे खतरनाक रासायनिक तत्व तैरने लगे हैं। सात-आठ माह पूर्व जिले में आई एनजीटी की कोर कमेटी ने यहां की हवा में 173 से 521 माइक्रोग्राम घनमीटर तक मरकरी की मौजूदगी बताई है।
राबट्र्सगंज में सोमवार को क्लाइमेट ट्रेंड्स संस्था की तरफ से वायु प्रदूषण को लेकर हुई कार्यशाला में इसका खुलासा किया गया तो हर किसी के पेशानी पर बल पड़ गए। लोक विज्ञान संस्थान देहरादून के रिसर्च एंड टेक्निकल हेड अनिल गौतम की माने तो यह स्थिति तब सामने आई है, जब यहां के हवा में मरकरी, लेड जैसे खतरनाक रासायनिक तत्वों के नियमित निगरानी की व्यवस्था मुकम्मल रूप से अभी तक नहीं हो पाया है। उनका कहना था कि फिलहाल स्थिति के निगरानी का दायित्व राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को सौंपा गया है, लेकिन इसको लेकर विस्तृत अध्ययन के लिए जिले में एक केंद्र की जरूरत है। यह भी बताया कि हवा में मरकरी का मानक अभी तक 12 माइक्राग्राम घनमीटर प्रस्तावित किया गया है। अगर इसको हम पुष्ट मानें तो भी यहां के हालात कितने खराब हो चुके हैं, यह बताने के लिए ऊपर का आंकड़ा काफी है। उन्होंने फ्लोराइड, आर्सेनिक, लेड, क्लोरीन को लेकर कई आंकड़े दर्शाए और स्थिति को खतरनाक बताते हुए, मानव जीवन बचाए रखने के लिए अभी से ठोस पहल की जरूरत जताई। पर्यावरणविद सीमा, वरिष्ठ अनुसंधानकर्ता ऐश्वर्या, धर्मेंद्र सिंह भदौर्या, ओम अवस्थी ने भी प्रदूषण पर अपने विचार रखे और इस पर अंकुश के लिए जागरूकता को जरूरी बताया। एनजीटी की तरफ से तय किए मानक की क्या स्थिति है, उसका पालन किस रूप में संभव है, इस पर भी लोगों ने खुलकर विचार व्यक्त किए।
इनसेट
प्रतिवर्ष 1030 करोड़ टन जला रहे कोयला
सोनभद्र। मरकरी उत्सर्जन का बड़ा कारण माने जाने वाले कोयले की खपत की स्थिति यह है कि सोनभद्र-सिंगरौली में प्रतिदिन 21 हजार मेगावाट विद्युत उत्पादन के लिए, प्रतिवर्ष 1030 करोड़ टन कोयला जलाया जा रहा है। एनजीटी कोर कमेटी के रिपोर्ट के मुताबिक इससे प्रतिवर्ष 6500 टन श्वसनीय धूल कण, 79017 टन सल्फर डाई ऑक्साइड, 89948 टन प्रतिवर्ष नाइट्रोजल आक्साइड और 14.169 टन प्रतिवर्ष पारा यहां के वायुमंडल में घुल रहा है। पर्यावरण वैज्ञानिक अनिल गौतम का कहना था कि इसके रोकथाम के लिए जरूरी है कि नियमों, निर्देशों का कड़ाई से पालन हो और इसके नियमित निगरानी के लिए अलग से एक केंद्र की व्यवस्एथा हो।