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दलों से जनता का मोहभंग, निर्दलों पर जताया भरोसा
Updated Sat, 02 Dec 2017 12:06 AM IST
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सोनभद्र। जिले का नगर निकाय इस बार कई मायने में दिलचस्प रहा। केंद्र और विधानसभा चुनाव में मोदी लहर के बावजूद निकाय चुनाव की जीत में भाजपा को पूरी ताकत झोंकनी पड़ी। प्रदेश अध्यक्ष ने जहां चुनावी सभा की। वहीं प्रभारी मंत्री अर्चन पांडेय ने कई जगह दौरा कर प्रत्याशियों के पक्ष में सघन जनसंपर्क किया। संगठन की मेहनत और बड़े चेहरों की मौजूदगी ने प्रतिष्ठापरक सीट राबर्ट्सगंज नगरपालिका में तो जीत दिला दी, रेणुकूट, घोरावल जैसे भाजपा के गढ़ वाली जगहों पर जनता ने शिकस्त देकर अपनी नाराजगी जाहिर कर ही दी।
इसी तरह नगरपालिका अध्यक्ष और नगर पंचायत चेयरमैन के चुनाव में सपा, बसपा, कांग्रेस जैसे प्रमुख दलों को मुंह की खानी पड़ी। सात नगर पंचायत और एक नगर पालिका कुल आठ सीट में तीन भाजपा के खाते में तो पांच निर्दल के खाते में गई। रेणुकूट में 15 सालों से जीत का पर्याय बन चुके भाजपा के अनिल कुमार सिंह को जहां मामूली अंतर से अपने चिरपरिचित प्रतिद्वंदी शिवप्रताप सिंह बबलू से मात खानी पड़ी। वहीं घोरावल में भाजपा की शर्मनाक हार भी बड़ा संदेश देती नजर आई। पिपरी में भी निर्दल उम्मीदवार दिग्विजय सिंह ने सामाजिक छवि की बदौलत तीन हजार से अधिक मतों से जीत हासिल कर सारे अनुमानों को ध्वस्त कर दिया। ओबरा में भाजपा की जीत के पीछे कार्यकताओं की मेहनत के साथ पिछले तीन सालों से जनता के बीच रहकर उनका सुख-दुख बांटने वाले कन्हैयालाल जायसवाल के समर्थन ने अहम भूमिका निभाई। यहां चेयरमैन रहीं दुर्गावती देवी के पति रमेश यादव ने ऐन वक्त पर सपा के साथ आकर समीकरण को पलटने की कोशिश की लेकिन कामयाबी नहीं मिल पाई। इसी तरह चुर्क-गुर्मा में भाजपा को मिली जीत के पीछे सीट का आरक्षित होना और पिछले चुनाव के मुकाबले इस बार समीकरण अलग होना माना जा रहा है। वहीं को लेकर लोगों के मन में सत्तापक्ष से नाराजगी और स्थानीय समीकरण को अपने पक्ष में भुनाने की सपा, बसपा, कांग्रेस तीनों दलों के रणनीतिकारों ने की। चुनावी चर्चा में इनकी मजबूत उपस्थिति भी मानी जाती रही लेकिन शुक्रवार को आया परिणाम ने तीनों दलों के लोगों को मायूस करने वाला रहा।
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इसी तरह नगरपालिका अध्यक्ष और नगर पंचायत चेयरमैन के चुनाव में सपा, बसपा, कांग्रेस जैसे प्रमुख दलों को मुंह की खानी पड़ी। सात नगर पंचायत और एक नगर पालिका कुल आठ सीट में तीन भाजपा के खाते में तो पांच निर्दल के खाते में गई। रेणुकूट में 15 सालों से जीत का पर्याय बन चुके भाजपा के अनिल कुमार सिंह को जहां मामूली अंतर से अपने चिरपरिचित प्रतिद्वंदी शिवप्रताप सिंह बबलू से मात खानी पड़ी। वहीं घोरावल में भाजपा की शर्मनाक हार भी बड़ा संदेश देती नजर आई। पिपरी में भी निर्दल उम्मीदवार दिग्विजय सिंह ने सामाजिक छवि की बदौलत तीन हजार से अधिक मतों से जीत हासिल कर सारे अनुमानों को ध्वस्त कर दिया। ओबरा में भाजपा की जीत के पीछे कार्यकताओं की मेहनत के साथ पिछले तीन सालों से जनता के बीच रहकर उनका सुख-दुख बांटने वाले कन्हैयालाल जायसवाल के समर्थन ने अहम भूमिका निभाई। यहां चेयरमैन रहीं दुर्गावती देवी के पति रमेश यादव ने ऐन वक्त पर सपा के साथ आकर समीकरण को पलटने की कोशिश की लेकिन कामयाबी नहीं मिल पाई। इसी तरह चुर्क-गुर्मा में भाजपा को मिली जीत के पीछे सीट का आरक्षित होना और पिछले चुनाव के मुकाबले इस बार समीकरण अलग होना माना जा रहा है। वहीं को लेकर लोगों के मन में सत्तापक्ष से नाराजगी और स्थानीय समीकरण को अपने पक्ष में भुनाने की सपा, बसपा, कांग्रेस तीनों दलों के रणनीतिकारों ने की। चुनावी चर्चा में इनकी मजबूत उपस्थिति भी मानी जाती रही लेकिन शुक्रवार को आया परिणाम ने तीनों दलों के लोगों को मायूस करने वाला रहा।
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