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लकड़ी तस्करी की राह बनीं घाघरा-शारदा
अमर उजाला ब्यूरो
Updated Fri, 27 May 2016 12:05 AM IST
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तंबौर क्षेत्र में ढोए जा रहे लकड़ी के बोटे।
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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शारदा व घाघरा नदियां लकड़ी तस्करी के लिए मुफीद साबित हो रही हैं। पड़ोसी जिले लखीमपुर खीरी व बहराइच के जंगल सीतापुर जिले के तस्करों क रास आ रहे हैं। इन्ही जंगलों की लकड़ी सीतापुर लाकर उनकी खरीद-फरोख्त की जाती है। सीतापुर की मंडियों में बेशकीमती लकड़ियों के भंडार देखे जा सकते हैं।
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लोग दंग रह जाते हैं कि आखिर इस जिले में इतनी लकड़ी कहां से आई। वजह ये है कि सीतापुर जिले में ऐसे जंगल हैं ही नहीं, जिससे कटान हो सके। यही वजह है कि यहां अवैध लकड़ी का कारोबार पड़ोसी जिलों पर ही निर्भर है। उनके इस गोरखधंधे में शारदा व घाघरा समेत अन्य नदियां कॅरिअर का काम कर रही हैं।
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नदियों के सहारे जिले में बड़े पैमाने पर अवैध लकड़ी का कारोबार किया जाता है। इसमें खासकर तटीय क्षेत्र की पुलिस व वन विभाग के कर्मचारियों से तालमेल बैठाकर लकड़ी माफिया अपना अवैध कारोबार चमका रहे हैं। बरसात में धंधा खूब परवान चढ़ता है।
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जिले के 440 हेक्टेयर भू-भाग पर वन क्षेत्र है। जो हरियाली के हिसाब से बेहद कम है। वहीं ये वन ऐसे नहीं हैं जिनमें कीमती लकड़ियां हों। इन जंगलों में बबूल, यूकेलिप्टस जैसे पेड़ लगे हैं। इसके अलावा वन क्षेत्र छोटे-छोटे टुकड़ों में बटा है। जिस पर वनकर्मियों का पहरा लगता है।
यहां के जंगलों में बबूल जैसी लकड़ी हैं। यह लकड़ी वन माफिया के किसी काम की नहीं है। जबकि पड़ोसी जिला लखीमपुर व बहराइच जिले में बड़े जंगल हैं। यहां बेशकीमती लकड़ियां पाईं जाती हैं। इन्हीं जिलों से सीतापुर के लकड़ी माफिया संपर्क साधे हैं। लखीमपुर जिले में लकड़ी माफिया कीमती वृक्षों की कटान कर शारदा व घाघरा नदी में डाल देते हैं।
जिसके बाद वह नदी के पानी में बहते हुए लहरपुर व तंबौर से होती हुई रेउसा क्षेत्र से गुजरती है। लकड़ी माफिया तंबौर व रेउसा क्षेत्र में बड़े पैमाने पर लकड़ियों को पानी से निकालकर करीब की लकड़ी मंडी में पहुंचाते हैं।
तंबौर क्षेत्र में मानपुर, सेतुही, बेलवा, थानगांव के कोनी समेत कई घाट लकड़ियों को इस पार लाने में काम आ रहे हैं। बरसात के दिनों में यह अवैध धंधा खूब परवान चढ़ता है। गर्मियों में नदी में पानी कम होते ही कारोबार मंदा होता जाता है। बरसात आने वाली है। लकड़ी माफिया अभी से जुगाड़ लगा रहे हैं।
...इनके लिए तो बाढ़ बन जाती वरदान
जिले के गांजर में आने वाली बाढ़ भले ही कइयों की खुशियों पर भारी पड़ती हो पर लकड़ी माफिया के लिए यह बाढ़ वरदान से कम नहीं है। बाढ़ आने पर इन लकड़ी माफिया की चांदी हो जाती है। जहां लोग बाढ़ की समस्या से जूझ रहे होते हैं। वहीं लकड़ी माफिया अपने धंधे में जुटे रहते हैं।
जिम्मेदारों का हाल ये है कि वे अपना हिस्सा पाकर चुप रहते हैं और लकड़ी का कारोबार चला करता है। जानकारों का कहना है कि जब पड़ोस के जिलों से लकड़ी माफिया का काम आसानी से चल रहा है। तब वे अपने जिले में अवैध कटान क्यों करें। शायद ये ही वजह है कि यहां पर लकड़ी भी पहुंचती रहती है और कटान भी नजर नहीं आता है। इससे लकड़ी माफिया भी खुश और पुलिस व वन विभाग भी खामोश रहते हैं।
ऐसे करते हैं पहचान
कटान के तुरंत बाद लकड़ी माफिया बोटों पर विशेष तरह का निशान बना देते हैं। इसी निशान को देखकर लकड़ी माफिया बंटवारा करते हैं, कि नदी में बह रही लकड़ी आखिर किसके हिस्से की है।
महज 500 से 1000 रुपये में आता पूरा पेड़
जानकारों की माने तो लखीमपुर के जंगलों में ऐसे तमाम लोग घूमते हैं, जो सिर्फ पेड़ों का अवैध कटान करते हैं। लकड़ी माफिया ऐसे ही लोगों से संपर्क करते हैं। बाद में 500 रुपये से 1000 रुपये देकर पेड़ों का कटवा कर नदी में फेंकवा देते हैं। नदी में बहते हुए लकड़ी जब सीतापुर पहुंचती है, तब उसका व्यवसाय शुरू होता है। महज 500 से 1000 रुपये लगाकर लकड़ी माफिया 5 हजार से 10 हजार रुपये तक कमाते हैं।