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ढह गया जातियों का किला, हर तरफ कमल खिला
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सीतापुर। जनता के जनादेश ने ध्रुवीकरण की राजनीति करने वालों को एक बार फिर से बड़ा सबक सिखाया है। नतीजों से जातियों का किला ढह चुका है। जिले की एक सीट को छोड़कर सभी जगह कमल खिल गया। इन चुनावी परिणामों ने इस बात के साफ संकेत दिए हैं कि वक्त के साथ अब जनता का मूड बदल चुका है। अब जाति-पांत के सहारे राजनीति की गाड़ी को सरपट दौड़ाने वालों को आवाम बर्दाश्त करने वाली नहीं है। उम्मीद से परे आए नतीजों ने इस बात को और मजबूती दी है।
चुनावी शंखनाद से पहले और बाद तक राजनीतिक दलों के पास विधानसभा क्षेत्रवार जातियों का गुणा-भाग था। कहीं न कहीं पार्टियों के अपनों की नाराजगी भी थी, इन सबके बीच कसौटी पर भाजपा के मौजूदा विधायकों का कामकाज और कुछ स्थानीय मुद्दे भी थे। इन सबको दरकिनार कर भाजपा हो, सपा हो, बसपा या फिर कांग्रेस, सभी ने कहीं न कहीं चुनावी समर में जातिगत आधार को फैैक्टर मानते हुए अपने सियासी पहलवानों को उतारा था। सभी दलों को अपने पहलवानों से जीत की उम्मीद भी थी। उसी हिसाब से चुनावी बिसात पूरी तरह से बिछाई थी।
अभी तक के होते आए चुनावों में नेता और पार्टियों ने वोटों की ध्रुवीकरण कर जाति-पांत के सहारे चुनावी नैया पार करने की गोटियां खूब बिछाई थीं। किस विधानसभा क्षेत्र में किस जाति मतदाताओं की संख्या अधिक है, उसी के आधार पर दल प्रत्याशियों को उतारते आए हैं।राजनीति के अतीत को देखे तो अब तक सियासत की धुरी इसी के इर्द गिर्द केंद्रित भी रही है, लेकिन अब दौर बदल चुका है। राजनीति भी बदल चुकी है और लोगों का मूड भी बदल चुका है। गुरुवार को आए चुनावी नतीजे इस बात की गवाही दे रहे हैं।
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ध्रुवीकरण की राजनीति परिणामों में दूर-दूर तक नजर नहीं आई। लहरपुर विधानसभा क्षेत्र की सीट को लेकर छोड़कर नगर, महोली, मिश्रिख, हरगांव, सिधौली, महमूदाबाद, बिसवां, सेवता में भगवा परचम फहरा गया है।
हर सीट पर नहीं दिखी कांटे की टक्कर
चुनावी बिगुल बजने के बाद से ही इस बार यूपी समेत सीतापुर में भी भाजपा और सपा के बीच कांटे की टक्कर मानी जा रही थी। दोनों ही दलों के नेताओं की चुनावी रैलियों में उमड़ रही भारी भीड़ से इस बात का अंदाजा लगा पाना मुश्किल हो रहा था कि इस बार कौन किस पर भारी पड़ेगा। यही वजह है कि हर कोई कांटे की टक्कर मान रहा था। जमीनी हालात भी इसी ओर इशारा कर रहे थे, लेकिन गुरुवार को चुनावी नतीजे सामने आए तो हर कोई चौंक गया, जो तस्वीर चुनाव में नजर आ रही थी, वह नतीजों के बाद नहीं दिखी। हर सीट पर कांटे की टक्कर नहीं नजर आई। सदर, महमूदाबाद विधानसभा सीट पर कांटे की टक्कर जरूर रही।
सभी सीटों पर बिछी थी जातियों को साधने की बिसात
2022 विधानसभा चुनाव का बिगुल बजने के साथ ही चुनावी रण में उतरने वाले नेताओं ने जातिगत वोटों को मजबूत आधार मानकर अपनी-अपनी विजय पताका फहराने का दंभ भरना शुरू कर दिया था। सदर विधानसभा सीट की बात करें तो भाजपा ब्राह्मण और अपने कैडर वोट के सहारे जीत के लिए आश्वासत थी।
सपा मुस्लिम वोटों के सहारे चुनावी जंग जीतने का दंभ भर रही थी। यही हाल बसपा और कांग्रेस की पार्टी का भी रहा। दोनों ही दलों ने मुस्लिम चेहरों पर दांव लगाया था। यह तो सदर विधानसभा क्षेत्र की बिछाई गई चुनावी बिसात थी। सियासत के चश्मे से देखें तो कमोबेश हर विधानसभा सीट पर चुनावी बिसात इसी तर्ज पर बिछाई गई थी।
विपक्षी दलों के दावे हुए बेदम
चुनावी घमासान के दरम्यान भले ही सीधी लड़ाई दोनों पार्टियों के बीच रही हो, लेकिन मतदान के दिन हुई साइलेंट वोटिंग ने ही राजनीतिक दलों के तापमान को बढ़ाने का काम किया था। मतदान के बाद से ही काफी हद तक चुनावी तस्वीर साफ हो गई थी, लेकिन नतीजों का इंतजार किए बिना कुछ भी कह पाना मुमकिन नहीं दिख रहा था।
राजनीतिक पंडितों की माने तो इस बार भी मतदाताओं की खामोशी बहुत कुछ इशारा कर रही थी। गुरुवार को नतीजे सामने आने के बाद साफ हो गया इस बार बीजे (भाजपा जिताओ) फैक्टर हावी दिखा। भाजपा की जीत की यही सबसे बड़ी वजह मानी जा रही है। इस फैैक्टर के आगे विपक्षी दलों के दावे भी बेदम हो गए हैं।
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चुनावी शंखनाद से पहले और बाद तक राजनीतिक दलों के पास विधानसभा क्षेत्रवार जातियों का गुणा-भाग था। कहीं न कहीं पार्टियों के अपनों की नाराजगी भी थी, इन सबके बीच कसौटी पर भाजपा के मौजूदा विधायकों का कामकाज और कुछ स्थानीय मुद्दे भी थे। इन सबको दरकिनार कर भाजपा हो, सपा हो, बसपा या फिर कांग्रेस, सभी ने कहीं न कहीं चुनावी समर में जातिगत आधार को फैैक्टर मानते हुए अपने सियासी पहलवानों को उतारा था। सभी दलों को अपने पहलवानों से जीत की उम्मीद भी थी। उसी हिसाब से चुनावी बिसात पूरी तरह से बिछाई थी।
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अभी तक के होते आए चुनावों में नेता और पार्टियों ने वोटों की ध्रुवीकरण कर जाति-पांत के सहारे चुनावी नैया पार करने की गोटियां खूब बिछाई थीं। किस विधानसभा क्षेत्र में किस जाति मतदाताओं की संख्या अधिक है, उसी के आधार पर दल प्रत्याशियों को उतारते आए हैं।राजनीति के अतीत को देखे तो अब तक सियासत की धुरी इसी के इर्द गिर्द केंद्रित भी रही है, लेकिन अब दौर बदल चुका है। राजनीति भी बदल चुकी है और लोगों का मूड भी बदल चुका है। गुरुवार को आए चुनावी नतीजे इस बात की गवाही दे रहे हैं।
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ध्रुवीकरण की राजनीति परिणामों में दूर-दूर तक नजर नहीं आई। लहरपुर विधानसभा क्षेत्र की सीट को लेकर छोड़कर नगर, महोली, मिश्रिख, हरगांव, सिधौली, महमूदाबाद, बिसवां, सेवता में भगवा परचम फहरा गया है।
हर सीट पर नहीं दिखी कांटे की टक्कर
चुनावी बिगुल बजने के बाद से ही इस बार यूपी समेत सीतापुर में भी भाजपा और सपा के बीच कांटे की टक्कर मानी जा रही थी। दोनों ही दलों के नेताओं की चुनावी रैलियों में उमड़ रही भारी भीड़ से इस बात का अंदाजा लगा पाना मुश्किल हो रहा था कि इस बार कौन किस पर भारी पड़ेगा। यही वजह है कि हर कोई कांटे की टक्कर मान रहा था। जमीनी हालात भी इसी ओर इशारा कर रहे थे, लेकिन गुरुवार को चुनावी नतीजे सामने आए तो हर कोई चौंक गया, जो तस्वीर चुनाव में नजर आ रही थी, वह नतीजों के बाद नहीं दिखी। हर सीट पर कांटे की टक्कर नहीं नजर आई। सदर, महमूदाबाद विधानसभा सीट पर कांटे की टक्कर जरूर रही।
सभी सीटों पर बिछी थी जातियों को साधने की बिसात
2022 विधानसभा चुनाव का बिगुल बजने के साथ ही चुनावी रण में उतरने वाले नेताओं ने जातिगत वोटों को मजबूत आधार मानकर अपनी-अपनी विजय पताका फहराने का दंभ भरना शुरू कर दिया था। सदर विधानसभा सीट की बात करें तो भाजपा ब्राह्मण और अपने कैडर वोट के सहारे जीत के लिए आश्वासत थी।
सपा मुस्लिम वोटों के सहारे चुनावी जंग जीतने का दंभ भर रही थी। यही हाल बसपा और कांग्रेस की पार्टी का भी रहा। दोनों ही दलों ने मुस्लिम चेहरों पर दांव लगाया था। यह तो सदर विधानसभा क्षेत्र की बिछाई गई चुनावी बिसात थी। सियासत के चश्मे से देखें तो कमोबेश हर विधानसभा सीट पर चुनावी बिसात इसी तर्ज पर बिछाई गई थी।
विपक्षी दलों के दावे हुए बेदम
चुनावी घमासान के दरम्यान भले ही सीधी लड़ाई दोनों पार्टियों के बीच रही हो, लेकिन मतदान के दिन हुई साइलेंट वोटिंग ने ही राजनीतिक दलों के तापमान को बढ़ाने का काम किया था। मतदान के बाद से ही काफी हद तक चुनावी तस्वीर साफ हो गई थी, लेकिन नतीजों का इंतजार किए बिना कुछ भी कह पाना मुमकिन नहीं दिख रहा था।
राजनीतिक पंडितों की माने तो इस बार भी मतदाताओं की खामोशी बहुत कुछ इशारा कर रही थी। गुरुवार को नतीजे सामने आने के बाद साफ हो गया इस बार बीजे (भाजपा जिताओ) फैक्टर हावी दिखा। भाजपा की जीत की यही सबसे बड़ी वजह मानी जा रही है। इस फैैक्टर के आगे विपक्षी दलों के दावे भी बेदम हो गए हैं।