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खत्म होने की कगार पर निर्मलपुरवा
Amarujala Bureau
Updated Tue, 26 Jul 2016 11:09 PM IST
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घाघरा में कटान तेज
- फोटो : अमर उजाला
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घाघरा में आई बाढ़ से अब निर्मल पुरवा का अस्तित्व मिटने की कगार पर है। गांव में बचे 50 घरों में से 20 मकान सैलाब में समा गए। अब बचे 30 घरों के लोग भी अपना आशियाना तोड़कर ईंट व अन्य सामग्री बचाने में जुटे हैं। ये लोग भी जल्द यहां से पलायन कर जाएंगे। घाघरा गांव से महज 10 मीटर की दूरी पर बह रही है।
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1982 में बसे निर्मलपुरवा में पहले करीब 300 लोग रहते थे। घाघरा गांजर इलाके के 10 गांवों में कटान कर रही है। इनमें रेउसा क्षेत्र के सात व रामपुर मथुरा क्षेत्र के तीन गांवों में कटान हो रही है। पूरा इलाका बाढ़ की चपेट में होने से पीड़ितों को सुरक्षित स्थानों पर जाने में दिक्कत आ रही है। उधर, घाघरा व शारदा बैराजों से बुधवार को ढाई लाख क्यूसेेक पानी छोड़ा गया।
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रेउसा के करीब 50 गांव बाढ़ की चपेट में हैं। इन्हीं गांवों में शामिल निर्मलपुरवा में घाघरा तेजी से कटान कर रही है। 15 घर कटकर नदी में बह चुके हैं। गांव के संतोष यादव का कहना है कि महज दस मीटर की दूरी पर घाघरा आ गई है। इससे घर पर कटान का खतरा मंडराने लगा। इसी तरह से करीब 20 अन्य परिवार अपने घरों को तोड़कर जरूरी सामान समेट रहे हैं।
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इसी तरह से लोधनपुरवा, गोडिय़न पुरवा, परमेश्वरदीन पुरवा, रामलाल पुरवा, प्रधान पुरवा कोनी में भी नदी कटान कर रही है। टापू पर बसे पचीसा गांव में भी नदी तेजी से कटान कर रही है। कटान को देखते हुए गांव के केशवराम, गोलेराम, मिश्रीलाल, रामधार, प्यारेलाल, बुधई, खेलावन, हरेश, पुत्ती लाल, दैराती उर्फ मंगू, लाल बिहारी आदि ग्रामीणों ने घरेलू सामान को समेट लिया है।
दोनों तरफ बाढ़ होने के कारण टापू पर बसे लोग अपने परिवारों को पार ले जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं। इन परिवारों में अधिकांश परिवार ऐसे हैं, जिनके घरों का राशन खत्म हो गया है। वे अब घाघरा का जलस्तर कम होने की राह ताक रहे हैं।
रामपुर मथुरा क्षेत्र में घाघरा नदी अंगरौरा, शुक्लन पुरवा व दुबे पुरवा के निकट कटान कर रही है। घाघरा के जलस्तर में किसी भी तरह की कमी नहीं देखी जा रही है। उधर, घाघरा व शारदा बैराजों से मंगलवार को 255202 क्यूसेक पानी छोड़ा गया है।
तीन दशक पहले बसाया गया था गांव
रेउसा में घाघरा किनारे बसे निर्मल पुरवा की नींव रखने वाले निर्मलदास इस गांव के कटान को लेकर बेहद चिंतित नजर आ रहे हैं। 85 वर्ष की उम्र पार कर चुके निर्मलदास बताते हैं कि 1980 में रणही पुरवा गांव में रहते थे। प्रधानी का चुनाव जीता था। 1982 में रणही पुरवा गांव घाघरा की कटान में बह गया।
प्रधान होने के नाते गांव के लोगों को सुरक्षित स्थान पर ले जाने की जिम्मेदारी मुझ पर आ गई। निर्मलदास बताते हैं तब कटान से करीब एक किलोमीटर दूरी पर ग्रामीणों के सहयोग से मिट्टी का पटान कराया गया। अपने नाम से गांव का नाम निर्मलपुरवा रख आबादी बसाई। रणही पुरवा के करीब 300 परिवारों ने इस गांव में डेरा डाला।
वह बताते हैं कि प्रतिवर्ष 10 से 20 घर कटते आ रहे हैं। अब इस गांव में 50 घर ही बचे थे। हाल ही में हुए कटान में 20 घर कटान की भेंट चढ़ गए। बचे 30 घरों के लोग अपने आशियानों को तोड़कर मलबा बचाने में लगे हैं।
हालांकि कुछ परिवार अभी गांव के ऊंचे इलाकों में बसकर नदी के पानी के बढ़ने का इंतजार कर रहे हैं। खुद के बसाए गांव को आंखों के सामने मिटते देख निर्मलदास के आंसू छलक आए। अपने घर को टूटते हुए भी देखकर वह रो पड़े।
अब तक मिट चुके हैं ये गांव
घाघरा के कटान से श्रीराम पुरवा, चंद्रभाल पुरवा व सिसैया बाजार का अस्तित्व समाप्त हो चुका है। उन तीन गांवों को निगलने के बाद अब नदी निर्मल पुरवा को निगलने के लिए बेताब नजर आ रही है।