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महमूदाबाद में खिलेगा कमल या फिर दौड़ेगी साइकिल

Wed, 02 Feb 2022 12:15 AM IST
Lucknow Bureau लखनऊ ब्यूरो
Updated Wed, 02 Feb 2022 12:15 AM IST
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Lotus will bloom in Mahmudabad or cycle will run
सीतापुर। जिले की महमूदाबाद विधानसभा सीट भाजपा और सपा के निशाने पर है। दोनों सियासी दल हर सूरत में इस सीट पर कब्जा जमाने की जुगत में है, लेकिन अब देखना दिलचस्प होगा कि इस सीट पर फिर से साइकिल दौड़गी या कमल खिलेगा। हालांकि, अभी यह कहना जल्दबाजी है, लेकिन इस सीट को कब्जाने के लिए उतारे गए दोनों दलों के सियासी पहलवानों के बीच इस बार भी कांटे की टक्कर के आसार हैं।
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वैसे तो सभी दलों के लिए हर सीट अहम होती है। इसी मंशा से ही पार्टियां अपने सियासी पहलवानों को चुनावी रण में उतारती हैं कि जीतकर आएंगे, लेकिन भाजपा के लिए महमूदाबाद सीट भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इसकी वजह भी है। 2017 के विधानसभा चुनाव में मोदी लहर में सदर, महोली, हरगांव, बिसवां, लहरपुर, मिश्रिख, सेवता में भगवा का परचम लहराया था, लेकिन लहर के बावजूद महमूदाबाद सीट पर कमल नहीं खिल सका था।
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यहां पर सपा प्रत्याशी नरेंद्र सिंह वर्मा साइकिल को दौड़ाने में कामयाब रहे थे या यूं कहें कि भाजपा की प्रचंड लहर में उन्होंने अपनी सीट बचाकर पार्टी की जिले में साख बचाने का काम किया था। अब पांच साल बाद फिर से विधानसभा चुनाव का रण तैयार हो चुका है। इस बार यूपी से लेकर जिले में भाजपा और सपा के बीच ही मुकाबला माना जा रहा है।
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यही हाल महमूदाबाद सीट पर भी है। भाजपा ने पूर्व प्रत्याशी आशा मौर्या तो सपा ने विधायक नरेंद्र वर्मा को सियासी अखाड़े में उतार दिया है। दोनों ही पार्टियों ने पुराने चेहरों के सहारे चुनावी वैतरणी पार करने के लिए नया दांव चला है। अब इस दांव से किसका नुकसान और किसका फायदा होगा, साइकिल फिर से दौड़ेगी या कमल खिलेगा, चुनावी नतीजों के बाद यह देखना दिलचस्प होगा।
इसलिए है कांटे की टक्कर
सपा प्रत्याशी नरेंद्र वर्मा छह बार के विधायक हैं। तीन बार सपा से लगातार जीतते चले आ रहे हैं। उनकी क्षेत्र में मजबूत पकड़ भी मानी जाती है। अपनी बिरादरी के मतदाताओं पर भी उनका रुतबा है। अब सवाल यह है कि नरेंद्र वर्मा का सियासी तिलिस्म भाजपा की आशा मौर्या इस बार तोड़ पाती हैं या नहीं। यही वजह है भाजपा के लिए चुनावी राह चुनौतीपूर्ण जरूर है।
भाजपा की प्रत्याशी आशा मौर्या लखनऊ की रहने वाली है। 2017 के चुनाव में उन्हें सपा प्रत्याशी नरेंद्र वर्मा से हार का सामना करना पड़ा था। हार के बावजूद पार्टी ने इस बार फिर से आशा मौर्या पर भरोसा जताते हुए टिकट दिया है। इसलिए पार्टी को आशा से ढेरों आशा है। अब वह आशा पर कितना खरा उतर पाती हैं यह तो आने वाला समय बताएगा।
आशा को साख बचाने की चुनौती
टिकट की घोषणा के साथ ही सियासी मैदान में उतर चुके सपा प्रत्याशी नरेंद्र वर्मा और भाजपा प्रत्याशी आशा मौर्या दोनों के लिए राह इस बार आसान नहीं लग रही है। वजह, 2017 के चुनाव में तीसरी बार जीते नरेंद्र वर्मा को 81469 मत मिले थे, जबकि हारी प्रत्याशी आशा मौर्या को 79563 मत मिले थे। इस तरह महज 1906 वोटों से भाजपा की प्रत्याशी चुनावी दंगल में मात खा गई थीं। सियासी जानकारों की माने तो यही वजह है कि इस बार नरेंद्र वर्मा के सामने अपना गढ़ तो आशा के सामने पार्टी की साख बचाने की चुनौती है।
ऐसे हैं जातीय समीकरण
जातीय समीकरणों पर नजर डालें तो महमूदाबाद विधानसभा क्षेत्र में सबसे ज्यादा कुर्मी जाति के मतदाता हैं। फिर मुस्लिम और तीसरे नंबर पर दलित वोटर हैं, जो चुनाव में निर्णायक भूमिका में निभाते हैं।

20 साल से नहीं खिला कमल
महमूदाबाद सीट पर कब्जा जमाना इसलिए भी भाजपा के लिए चुनौती है क्योंकि पिछले 20 सालों से यहां पर कमल नहीं खिला है। जानकार बताते हैं कि जब नरेंद्र वर्मा 2002 में भाजपा में थे, तब यह सीट भाजपा ने जीती थी, लेकिन इसके बाद पिछले तीन चुनावों से यहां पर खाता नहीं खुल सका है।
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