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Sitapur News: यहां गुड़िया को पीटते नहीं, झूले पर झुलाते हैं....
Tue, 29 Jul 2025 11:34 PM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, सीतापुर
संवाद न्यूज एजेंसी, सीतापुर
Updated Tue, 29 Jul 2025 11:34 PM IST
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कमलापुर (सीतापुर)। नागपंचमी पर गुड़िया पीटने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। आज भी लोग यह रस्म निभाते हैं। बालिकाएं कपड़े की बनी गुड़िया जमीन पर डालती हैं जिसे लड़के डंडे से पीटते हैं। कमलापुर की छात्रा आरुषी तिवारी ने गुड़िया पीटने की परंपरा को कुरीति बताते हुए नई पहल शुरू की है। गुड़िया को पीटने के बजाय झूले पर झुलाकर बालिकाओं का सम्मान किए जाने का संदेश दिया।
आरुषी चार साल से यह मुहिम चला रही हैं। मंगलवार को नागपंचमी पर उन्होंने बच्चियों के साथ गुड़िया सजाकर झूले पर बैठाया और गीतों के साथ झुलाया। गुड़िया झुलाने की यह अनोखी पहल अब धीरे-धीरे आसपास के 15 से ज्यादा गांवों में नजर आने लगी है। जहां कभी गुड़िया पीटकर प्रतीकात्मक हिंसा होती थी, अब वहां गुड़िया झुलाकर करुणा और सम्मान के स्वर सुनाई देते हैं।
बुद्धिजीवियों और महिलाओं ने इस बदलाव को सराहा है। कई स्कूलों में यह रस्म अब सांस्कृतिक गतिविधि का हिस्सा बन चुकी है। बच्चों में संवेदना और बालिकाओं के प्रति सम्मान की भावना विकसित हो रही है। आरूषी कहती हैं, कि अनुचित संदेश देने वाली परंपरा को संवेदना से बदला जा सकता है। गुड़िया अब पिटाई से रोती नहीं बल्कि झूला झूलकर मुस्कराती है। पुलिस परामर्श केंद्र सीतापुर की कांउसलर मांडवी मिश्रा कहती हैं कि आरुषी की पहल बच्चों में हिंसा नहीं, स्नेह का बीज बो रही है। ये बदलाव आने वाली पीढ़ियों के लिए सकारात्मक प्रेरणा का स्रोत है।
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हर्षोल्लास से मनाई नागपंचमी
जिले में नागपंचमी का त्योहार मंगलवार को हर्षोल्लास के साथ परंपरागत ढंग से मनाया गया। इस अवसर पर लोगों ने नाग देवता की पूजा-अर्चना कर उन्हें दूध पिलाया। घरों में चने की घुघरी के अलावा पूड़ी-कचौड़ी, खीर आदि पकवान बनाए। ग्रामीण क्षेत्राें में पडे झूलों पर महिलाओं और युवतियों ने झूला पर पेंग बढ़ाई। परंपरा के अनुसार बहनों ने कपड़े और कतरन की प्रतीकात्मक गुड़िया बनाकर मंदिरों के सामने जमीन पर डाला, जिन्हें डंडे से भाइयों ने पीटा। शहर के श्यामनाथ, त्रिकोणनाथ, जंगलीनाथ आदि शिव मंदिरों में लोगों ने पूजन-अर्चन किया।
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आरुषी चार साल से यह मुहिम चला रही हैं। मंगलवार को नागपंचमी पर उन्होंने बच्चियों के साथ गुड़िया सजाकर झूले पर बैठाया और गीतों के साथ झुलाया। गुड़िया झुलाने की यह अनोखी पहल अब धीरे-धीरे आसपास के 15 से ज्यादा गांवों में नजर आने लगी है। जहां कभी गुड़िया पीटकर प्रतीकात्मक हिंसा होती थी, अब वहां गुड़िया झुलाकर करुणा और सम्मान के स्वर सुनाई देते हैं।
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बुद्धिजीवियों और महिलाओं ने इस बदलाव को सराहा है। कई स्कूलों में यह रस्म अब सांस्कृतिक गतिविधि का हिस्सा बन चुकी है। बच्चों में संवेदना और बालिकाओं के प्रति सम्मान की भावना विकसित हो रही है। आरूषी कहती हैं, कि अनुचित संदेश देने वाली परंपरा को संवेदना से बदला जा सकता है। गुड़िया अब पिटाई से रोती नहीं बल्कि झूला झूलकर मुस्कराती है। पुलिस परामर्श केंद्र सीतापुर की कांउसलर मांडवी मिश्रा कहती हैं कि आरुषी की पहल बच्चों में हिंसा नहीं, स्नेह का बीज बो रही है। ये बदलाव आने वाली पीढ़ियों के लिए सकारात्मक प्रेरणा का स्रोत है।
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हर्षोल्लास से मनाई नागपंचमी
जिले में नागपंचमी का त्योहार मंगलवार को हर्षोल्लास के साथ परंपरागत ढंग से मनाया गया। इस अवसर पर लोगों ने नाग देवता की पूजा-अर्चना कर उन्हें दूध पिलाया। घरों में चने की घुघरी के अलावा पूड़ी-कचौड़ी, खीर आदि पकवान बनाए। ग्रामीण क्षेत्राें में पडे झूलों पर महिलाओं और युवतियों ने झूला पर पेंग बढ़ाई। परंपरा के अनुसार बहनों ने कपड़े और कतरन की प्रतीकात्मक गुड़िया बनाकर मंदिरों के सामने जमीन पर डाला, जिन्हें डंडे से भाइयों ने पीटा। शहर के श्यामनाथ, त्रिकोणनाथ, जंगलीनाथ आदि शिव मंदिरों में लोगों ने पूजन-अर्चन किया।