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बसों में ईंट के सहारे लग रहा ब्रेक
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सीतापुर। अगर आप परिवहन निगम की बसों में सफर करते हैं तो सावधान हो जाइए। इसमें सफर करना खतरों से खाली नहीं है। बसें जर्जर हालत में चल रही हैं, इससे किसी भी समय हादसा होने से इनकार नहीं किया जा सकता है। अधिकांश बसों में न तो अग्निशमन यंत्र हैं और न ही मेडिकल किट। चालक ब्रेक लगाने के लिए ईंट का सहारा लेते हैं। मेडिकल किट के बॉक्स में कूड़ा करकट भरा है। घिसे पिटे टायरों के सहारे बसों को दौड़ाया जा रहा है।
शनिवार को अमर उजाला की टीम ने रोडवेज बसों की पड़ताल की तो सारी हकीकत सामने आ गई। अधिकांश बसों की हालात काफी खराब थी। किसी बस में शीशे काफी पुराने हो चुके थे तो किसी में सामने के शीशे में दरार पड़ी थी। बस के आगे का बोनट खुला हुआ था। बस की फर्श इतनी घिस चुकी थी कि नीचे से सड़क दिख रही थी। कुर्सियों पर लगे कवर आधे से ज्यादा फटे थे। कुछ बसें तो इतनी कंडम थी कि उनको देखकर यह नहीं लग रहा था कि क्या इनसे सुरक्षित सफर किया जा सकता है।
रोजाना इसी हालत में यह बसें सवारियों को लेकर आती-जाती हैं। अधिकतर बसों में न तो मेडिकल किट की व्यवस्था थी और न ही आग बुझाने के प्रबंध दिखे। अधिकतर बसों में अग्निशमन सिलेंडर लगे थे जो काफी पुराने हो चुके थे। अनुबंधित बस चालकों का कहना था कि उनकी बसों में मेडिकल किट और अग्निशमन यंत्र लगवाने की जिम्मेदारी वाहन मालिक की है। यह समस्या निगम की बसों में भी थी, जिसकी जिम्मेदारी परिवहन निगम की है।
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ईंट के सहारे लगा रहे ब्रेक
महमूदाबाद जाने के लिए खड़ी बस संख्या यूपी 14 बीटी 0290 और महोली जाने के लिए खड़ी बस में सबसे बड़ी चूक देखने को मिली। इन बसों में ब्रेक लगाने के लिए चालक की सीट के पास ईंट रखी हुई थी। ईंट के सहारे ब्रेक लगाया जाता है। अगर जरा सी चूक हो जाए, ईंट से चालक का पैर फिसल जाए और ब्रेक न लगे तो कितना बड़ा हादसा हो सकता है, इसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है।
सीट के अंदर पड़ा अग्निशमन यंत्र
बस संख्या यूपी 34 टी 9463 में आग बुझाने वाला यंत्र सीट के अंदर रखा हुआ था। चालक ने बताया कि काफी समय से यह सिलेंडर खराब है। इसलिए उसको सीट के अंदर डाल दिया है। इस बस में मेडिकल किट में दवाइयां भी मौजूद नहीं थी। अन्य बसों का भी यही हाल था। किसी बस में अग्निशमन यंत्र नहीं था और किसी में काफी पुराना हो गया था। पड़ताल में जितनी भी बसें टीम ने देखी, किसी भी बस में मेडिकल किट में दवा के नाम पर एक टेबलेट तक नहीं थी।
टायर फटे फिर सड़कों पर दौड़ रहे
कई बसें ऐसी मिलीं जिनके टायरों की हालत काफी खराब थी। कई बसों के टायर घिस चुके थे। इसके अलावा कुछ वाहन ऐसे भी थे, जिनके टायर क्षतिग्रस्त थे। चालकों का कहना था कि कई बार वर्कशॉप में बसों को भेजा जा चुका है लेकिन इस तरफ जिम्मेदार ध्यान नहीं देते हैं। टायरों की हालत ऐसी थी कि कभी भी ट्यूब फट सकता है।
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शनिवार को अमर उजाला की टीम ने रोडवेज बसों की पड़ताल की तो सारी हकीकत सामने आ गई। अधिकांश बसों की हालात काफी खराब थी। किसी बस में शीशे काफी पुराने हो चुके थे तो किसी में सामने के शीशे में दरार पड़ी थी। बस के आगे का बोनट खुला हुआ था। बस की फर्श इतनी घिस चुकी थी कि नीचे से सड़क दिख रही थी। कुर्सियों पर लगे कवर आधे से ज्यादा फटे थे। कुछ बसें तो इतनी कंडम थी कि उनको देखकर यह नहीं लग रहा था कि क्या इनसे सुरक्षित सफर किया जा सकता है।
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रोजाना इसी हालत में यह बसें सवारियों को लेकर आती-जाती हैं। अधिकतर बसों में न तो मेडिकल किट की व्यवस्था थी और न ही आग बुझाने के प्रबंध दिखे। अधिकतर बसों में अग्निशमन सिलेंडर लगे थे जो काफी पुराने हो चुके थे। अनुबंधित बस चालकों का कहना था कि उनकी बसों में मेडिकल किट और अग्निशमन यंत्र लगवाने की जिम्मेदारी वाहन मालिक की है। यह समस्या निगम की बसों में भी थी, जिसकी जिम्मेदारी परिवहन निगम की है।
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ईंट के सहारे लगा रहे ब्रेक
महमूदाबाद जाने के लिए खड़ी बस संख्या यूपी 14 बीटी 0290 और महोली जाने के लिए खड़ी बस में सबसे बड़ी चूक देखने को मिली। इन बसों में ब्रेक लगाने के लिए चालक की सीट के पास ईंट रखी हुई थी। ईंट के सहारे ब्रेक लगाया जाता है। अगर जरा सी चूक हो जाए, ईंट से चालक का पैर फिसल जाए और ब्रेक न लगे तो कितना बड़ा हादसा हो सकता है, इसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है।
सीट के अंदर पड़ा अग्निशमन यंत्र
बस संख्या यूपी 34 टी 9463 में आग बुझाने वाला यंत्र सीट के अंदर रखा हुआ था। चालक ने बताया कि काफी समय से यह सिलेंडर खराब है। इसलिए उसको सीट के अंदर डाल दिया है। इस बस में मेडिकल किट में दवाइयां भी मौजूद नहीं थी। अन्य बसों का भी यही हाल था। किसी बस में अग्निशमन यंत्र नहीं था और किसी में काफी पुराना हो गया था। पड़ताल में जितनी भी बसें टीम ने देखी, किसी भी बस में मेडिकल किट में दवा के नाम पर एक टेबलेट तक नहीं थी।
टायर फटे फिर सड़कों पर दौड़ रहे
कई बसें ऐसी मिलीं जिनके टायरों की हालत काफी खराब थी। कई बसों के टायर घिस चुके थे। इसके अलावा कुछ वाहन ऐसे भी थे, जिनके टायर क्षतिग्रस्त थे। चालकों का कहना था कि कई बार वर्कशॉप में बसों को भेजा जा चुका है लेकिन इस तरफ जिम्मेदार ध्यान नहीं देते हैं। टायरों की हालत ऐसी थी कि कभी भी ट्यूब फट सकता है।