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हालात से नहीं मानी हार बिना मां-बाप संभाला परिवार
Sitapur
Updated Thu, 16 Jan 2014 05:47 AM IST
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सीतापुर। जिले की बेटियां अब अबला नहीं रहीं। ये बुलंदियां छूने को उड़ान भर रही हैं। मां-बाप के गुजर जाने के बाद वह स्वयं को ही नहीं पूरी गृहस्थी संभाल रही हैं। यही नहीं पिता का अंतिम संस्कार कर एक मिसाल भी कायम की है।
आवास विकास कॉलोनी में एक किराये के घरौंदे में रहने वाली सुनीता देवी मूलत: रायबरेली के कासोखास की हैं। उसका व उसके परिवार का जीवन बड़ा ही संघर्ष पूर्ण रहा। उसके पिता दिवंगत बुद्धराम शारदा सहायक नहर प्रणाली में सर्विस करते थे। पहले वह बाराबंकी के हैदरगढ़ में पोस्ट थे। खुद एक-डेढ़ साल तथा उसकी बहन छह माह की थी। तभी पिता का वर्ष 1989 में निधन हो गया। देहांत के बाद उसकी मां सुंदरा को स्थानीय नगर निकाय व पंचायत में बतौर आश्रित चतुर्थ श्रेणी पद पर नौकरी मिली। मां सुंदरा ने बड़े ही संघर्ष से उसे व उसकी बहन शिवकुमारी को पाला-पोसा और उस वक्त इतना कम वेतन था कि गृहस्थी चलना मुश्किल था। बावजूद इसके मां आर्थिक तंगी के दौर में दोनों से बेहतर शिक्षा दिलाई। बीएससी कंप्लीट हुई थी कि मां भी चल बसीं। उनके निधन से दोनों बहनों पर पहाड़ टूटा पड़ा था। खुद के साथ ही उसके ऊपर बहन शिव कुमारी को संभालने की जिम्मेदारी आ गई थी। मां-बाप से गुजरने के बाद उसका एक साल तो बड़ा ही कष्टमय बीता। मृतक आश्रित में नौकरी व मां के फंड इत्यादि पाने के लिए उसने सरकारी दफ्तरों के खूब चक्कर लगाए। तब कहीं जाकर उसे वर्ष 2011 में नौकरी मिल पाई। आज खुद को संभालने के साथ ही वह अपनी छोटी बहन शिव कुमारी को पढ़ा-लिखा कर उसकी जिंदगी संवारने में लगी है। उसका सपना है कि उसकी बहन को सरकारी नौकरी मिल जाए। हालांकि उसका नाम बीएड में आ गया था। उसे आगरा के एक कॉलेज में सीट मिली थी। मगर अधिक दूरी की वजह से वहां दाखिला नहीं दिलाया नहीं जा सका। हालांकि उसे कंप्टीशन की तैयारी करा रही हैं। ताकि उसे भी कहीं सरकारी नौकरी मिल सके। जिससे कि उसका भविष्य संवर सके।
वहीं घर परिवार की जिम्मेदारी संभाल कर बहनों के हाथ पीले करने तथा पिता का अंतिम संस्कार करने की जिम्मेदारी बेटो को निभाते देखा गया है। लेकिन अल्पना ने अपनी पढ़ाई पूरी कर छोटी बहन अर्चना को इंटर तक शिक्षा दिलाई। पिता का अंतिम संस्कार कर एक मिसाल कायम की। बाद में उसके हाथ पीले किए। अब घर में बेटे की भांति जिम्मेदारी निभाते हुए अल्पना अपनी मां व बहन के दो बेटों के साथ पैतृक घर में रह रही है। नगर पालिका क्षेत्र के अमीरगंज वार्ड के 67 वर्षीय कृष्ण बिहारी त्रिपाठी का निधन 2008 में हो गया था। कृष्ण बिहारी की दो बेटियां अल्पना व अर्चना हैं। उनकी बीमारी के चलते परिवार की आर्थिक स्थिति पतली हो गई थी। इस पर अल्पना ने बीड़ा उठाया और प्राइवेट स्कूल में पढ़ाना शुरू किया। रिश्तेदारों की मदद से अर्चना की शादी अपनी कमाई से की। अल्पना ने डबल एमए करने के साथ बीएड तक शिक्षा ग्रहण कर प्राइवेट स्कूल में शिक्षण कार्य करके परिवार का संचालन कर रही है। 72 वर्षीया मां प्रेमा जहां अपनी बेटी अल्पना पर गर्व करती है, वही पड़ोसी उसकी सराहना करते है।
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आवास विकास कॉलोनी में एक किराये के घरौंदे में रहने वाली सुनीता देवी मूलत: रायबरेली के कासोखास की हैं। उसका व उसके परिवार का जीवन बड़ा ही संघर्ष पूर्ण रहा। उसके पिता दिवंगत बुद्धराम शारदा सहायक नहर प्रणाली में सर्विस करते थे। पहले वह बाराबंकी के हैदरगढ़ में पोस्ट थे। खुद एक-डेढ़ साल तथा उसकी बहन छह माह की थी। तभी पिता का वर्ष 1989 में निधन हो गया। देहांत के बाद उसकी मां सुंदरा को स्थानीय नगर निकाय व पंचायत में बतौर आश्रित चतुर्थ श्रेणी पद पर नौकरी मिली। मां सुंदरा ने बड़े ही संघर्ष से उसे व उसकी बहन शिवकुमारी को पाला-पोसा और उस वक्त इतना कम वेतन था कि गृहस्थी चलना मुश्किल था। बावजूद इसके मां आर्थिक तंगी के दौर में दोनों से बेहतर शिक्षा दिलाई। बीएससी कंप्लीट हुई थी कि मां भी चल बसीं। उनके निधन से दोनों बहनों पर पहाड़ टूटा पड़ा था। खुद के साथ ही उसके ऊपर बहन शिव कुमारी को संभालने की जिम्मेदारी आ गई थी। मां-बाप से गुजरने के बाद उसका एक साल तो बड़ा ही कष्टमय बीता। मृतक आश्रित में नौकरी व मां के फंड इत्यादि पाने के लिए उसने सरकारी दफ्तरों के खूब चक्कर लगाए। तब कहीं जाकर उसे वर्ष 2011 में नौकरी मिल पाई। आज खुद को संभालने के साथ ही वह अपनी छोटी बहन शिव कुमारी को पढ़ा-लिखा कर उसकी जिंदगी संवारने में लगी है। उसका सपना है कि उसकी बहन को सरकारी नौकरी मिल जाए। हालांकि उसका नाम बीएड में आ गया था। उसे आगरा के एक कॉलेज में सीट मिली थी। मगर अधिक दूरी की वजह से वहां दाखिला नहीं दिलाया नहीं जा सका। हालांकि उसे कंप्टीशन की तैयारी करा रही हैं। ताकि उसे भी कहीं सरकारी नौकरी मिल सके। जिससे कि उसका भविष्य संवर सके।
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वहीं घर परिवार की जिम्मेदारी संभाल कर बहनों के हाथ पीले करने तथा पिता का अंतिम संस्कार करने की जिम्मेदारी बेटो को निभाते देखा गया है। लेकिन अल्पना ने अपनी पढ़ाई पूरी कर छोटी बहन अर्चना को इंटर तक शिक्षा दिलाई। पिता का अंतिम संस्कार कर एक मिसाल कायम की। बाद में उसके हाथ पीले किए। अब घर में बेटे की भांति जिम्मेदारी निभाते हुए अल्पना अपनी मां व बहन के दो बेटों के साथ पैतृक घर में रह रही है। नगर पालिका क्षेत्र के अमीरगंज वार्ड के 67 वर्षीय कृष्ण बिहारी त्रिपाठी का निधन 2008 में हो गया था। कृष्ण बिहारी की दो बेटियां अल्पना व अर्चना हैं। उनकी बीमारी के चलते परिवार की आर्थिक स्थिति पतली हो गई थी। इस पर अल्पना ने बीड़ा उठाया और प्राइवेट स्कूल में पढ़ाना शुरू किया। रिश्तेदारों की मदद से अर्चना की शादी अपनी कमाई से की। अल्पना ने डबल एमए करने के साथ बीएड तक शिक्षा ग्रहण कर प्राइवेट स्कूल में शिक्षण कार्य करके परिवार का संचालन कर रही है। 72 वर्षीया मां प्रेमा जहां अपनी बेटी अल्पना पर गर्व करती है, वही पड़ोसी उसकी सराहना करते है।
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