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84 कोसी परिक्रमा को मिला प्रांतीय मेले का दर्जा
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सीतापुर। प्रसिद्ध 84 कोसी होली परिक्रमा मेला को शासन से प्रांतीय मेले का दर्जा मिल गया है। अब इसे प्रदेश की धरोहर के तौर पर विकसित कर आने वाली पीढ़ी के लिए सहेजा जाएगा। परिक्रमा के सभी पड़ावों पर बिजली, पानी व ठहरने की बेहतर सुविधा के साथ ही सुरक्षा व्यवस्था चाक चौबंद होगी।
लोगों को सुविधाएं मुहैया कराने के लिए शासन से फंड मिलेगा। नैमिषारण्य की पावन धरा से हर साल फाल्गुन माह में ऐतिहासिक 84 कोसी परिक्रमा शुरू होती है। इस परिक्रमा का अलग ही पौराणिक महत्व है। इसमें मोक्ष की कामना लेकर देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु आते हैं। वह करीब एक माह तक परिक्रमा करते हैं।
इस परिक्रमा में 11 पड़ाव हैं। इनमें सात पड़ाव सीतापुर और चार पड़ाव हरदोई जिले में आते हैं। परिक्रमा के दौरान श्रद्धालु पड़ाव स्थलों पर रुककर रात भर भजन-कीर्तन करते हुए राम नाम जपते हैं। अंतिम पड़ाव मिश्रिख में परिक्रमा पहुंचने पर यहां मेले का आयोजन किया जाता है।
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इस मेले को प्रांतीय मेले का दर्जा दिए जाने के लिए जनवरी में शासन द्वारा डीएम से मेले की भौगोलिक स्थिति व उस पर होने वाले खर्च का ब्यौरा मांगा गया था। अब शासन ने परिक्रमा को प्रांतीय मेले का दर्जा प्रदान कर दिया है। राज्यपाल ने 84 कोसी परिक्रमा मेला को प्रांतीयकृत घोषित कर दिया है। प्रमुख सचिव मनोज कुमार सिंह ने डीएम को पत्र भेजकर यह जानकारी दी है।
मूलभूत सुविधाएं मिलेंगी, बनेंगे रैन बसेरे
अब शासन से परिक्रमा मेला के लिए फंड मिलेगा। इससे परिक्रमा के प्रत्येक पड़ाव पर सुविधाएं बढ़ाई जाएंगी। यहां पर श्रद्धालुओं के ठहरने के लिए रैन बसेरे बनेंगे। पेयजल, प्रसाधन व अन्य सुविधाएं मुहैया होंगी। सुरक्षा व्यवस्था भी पुख्ता होगी। परिक्रमा मेले का कायाकल्प कराते हुए इसे पौराणिक व ऐतिहासिक धरोहर के रूप में सहेजा जा सकेगा।
परिक्रमा मेले का महत्व
सतयुग में एक बार इंद्रलोक पर वृत्तासुर नामक दैत्य ने अधिकार कर लिया था। सभी देवता अपनी व्यथा लेकर ब्रह्मा, विष्णु व महेश के पास गए, लेकिन उनकी समस्या का निदान नहीं हो सका। ब्रह्मा जी ने देवताओं को बताया कि पृथ्वी लोक में दधीचि नाम के एक महर्षि रहते हैं। अगर वे अपनी अस्थियों का दान कर दें और उससे एक वज्र बनाया जाए।
उस वज्र से वृत्तासुर को मारा जा सकता है। इंद्र सभी देवताओं सहित महर्षि दधीचि की शरण में पहुंचे और देहदान की विनती की। महर्षि दधीचि ने बिना किसी हिचकिचाहट के अस्थियों का दान देना स्वीकार कर लिया। उन्होंने देह त्यागने से पहले सभी तीर्थों के जल से स्नान, सभी देवी देवताओं के दर्शन की इच्छा जताई।
इस पर सारे देवी देवता नैमिष क्षेत्र में पहुंचे। महर्षि दधीचि ने 84 कोसी परिक्रमा की। इसके बाद देवताओं ने उन्हें विश्व भर के तीर्थों के मिश्रित जल से स्नान कराया। जिसके बाद महर्षि ने प्राण त्यागे। उनकी अस्थियों से वज्र का निर्माण किया गया और वृत्तासुर का संहार किया गया।
महार्षि दधीचि ने जिस स्थान पर स्नान किया था, उसे ही दधीचि कुंड कहते हैं। जलों के मिश्रण होने के कारण उस क्षेत्र का नाम मिश्रित पड़ा। जिसे बाद में मिश्रिख कहा जाने लगा। तब से हर साल फाल्गुन माह में 84 कोसी होली परिक्रमा मेला आयोजित किया जाता है।
यह है पड़ाव
84 कोसी परिक्रमा में 11 पड़ाव आते हैं। इनमें कोरौना, हरैय्या, नगवा कोथावां, गिरधरपुर उमरारी, साक्षी गोपालपुर, देवगवां, मड़रुवा, जरिगवां, नैमिषारण्य, कोलवा बरेठी व मिश्रिख शामिल हैं। प्रत्येक पड़ाव स्थल का अपना अलग पौराणिक महत्व है।
कई संप्रदायों का होता संगम
इस मेले में हिन्दू धर्म के प्रमुख पंथ शामिल होकर परिक्रमा व पूजा-अर्चना करते हैं। इसके अलावा वैष्णो धर्म के गृहस्थ, नागा सम्प्रदाय, कबीर सम्प्रदाय, बौद्ध भिक्षु, ब्रम्हकु मारीज भी शामिल होते हैं। इसमें राष्ट्रीय स्तर के कलाकारों द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम भी किए जाते हैं।
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लोगों को सुविधाएं मुहैया कराने के लिए शासन से फंड मिलेगा। नैमिषारण्य की पावन धरा से हर साल फाल्गुन माह में ऐतिहासिक 84 कोसी परिक्रमा शुरू होती है। इस परिक्रमा का अलग ही पौराणिक महत्व है। इसमें मोक्ष की कामना लेकर देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु आते हैं। वह करीब एक माह तक परिक्रमा करते हैं।
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इस परिक्रमा में 11 पड़ाव हैं। इनमें सात पड़ाव सीतापुर और चार पड़ाव हरदोई जिले में आते हैं। परिक्रमा के दौरान श्रद्धालु पड़ाव स्थलों पर रुककर रात भर भजन-कीर्तन करते हुए राम नाम जपते हैं। अंतिम पड़ाव मिश्रिख में परिक्रमा पहुंचने पर यहां मेले का आयोजन किया जाता है।
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इस मेले को प्रांतीय मेले का दर्जा दिए जाने के लिए जनवरी में शासन द्वारा डीएम से मेले की भौगोलिक स्थिति व उस पर होने वाले खर्च का ब्यौरा मांगा गया था। अब शासन ने परिक्रमा को प्रांतीय मेले का दर्जा प्रदान कर दिया है। राज्यपाल ने 84 कोसी परिक्रमा मेला को प्रांतीयकृत घोषित कर दिया है। प्रमुख सचिव मनोज कुमार सिंह ने डीएम को पत्र भेजकर यह जानकारी दी है।
मूलभूत सुविधाएं मिलेंगी, बनेंगे रैन बसेरे
अब शासन से परिक्रमा मेला के लिए फंड मिलेगा। इससे परिक्रमा के प्रत्येक पड़ाव पर सुविधाएं बढ़ाई जाएंगी। यहां पर श्रद्धालुओं के ठहरने के लिए रैन बसेरे बनेंगे। पेयजल, प्रसाधन व अन्य सुविधाएं मुहैया होंगी। सुरक्षा व्यवस्था भी पुख्ता होगी। परिक्रमा मेले का कायाकल्प कराते हुए इसे पौराणिक व ऐतिहासिक धरोहर के रूप में सहेजा जा सकेगा।
परिक्रमा मेले का महत्व
सतयुग में एक बार इंद्रलोक पर वृत्तासुर नामक दैत्य ने अधिकार कर लिया था। सभी देवता अपनी व्यथा लेकर ब्रह्मा, विष्णु व महेश के पास गए, लेकिन उनकी समस्या का निदान नहीं हो सका। ब्रह्मा जी ने देवताओं को बताया कि पृथ्वी लोक में दधीचि नाम के एक महर्षि रहते हैं। अगर वे अपनी अस्थियों का दान कर दें और उससे एक वज्र बनाया जाए।
उस वज्र से वृत्तासुर को मारा जा सकता है। इंद्र सभी देवताओं सहित महर्षि दधीचि की शरण में पहुंचे और देहदान की विनती की। महर्षि दधीचि ने बिना किसी हिचकिचाहट के अस्थियों का दान देना स्वीकार कर लिया। उन्होंने देह त्यागने से पहले सभी तीर्थों के जल से स्नान, सभी देवी देवताओं के दर्शन की इच्छा जताई।
इस पर सारे देवी देवता नैमिष क्षेत्र में पहुंचे। महर्षि दधीचि ने 84 कोसी परिक्रमा की। इसके बाद देवताओं ने उन्हें विश्व भर के तीर्थों के मिश्रित जल से स्नान कराया। जिसके बाद महर्षि ने प्राण त्यागे। उनकी अस्थियों से वज्र का निर्माण किया गया और वृत्तासुर का संहार किया गया।
महार्षि दधीचि ने जिस स्थान पर स्नान किया था, उसे ही दधीचि कुंड कहते हैं। जलों के मिश्रण होने के कारण उस क्षेत्र का नाम मिश्रित पड़ा। जिसे बाद में मिश्रिख कहा जाने लगा। तब से हर साल फाल्गुन माह में 84 कोसी होली परिक्रमा मेला आयोजित किया जाता है।
यह है पड़ाव
84 कोसी परिक्रमा में 11 पड़ाव आते हैं। इनमें कोरौना, हरैय्या, नगवा कोथावां, गिरधरपुर उमरारी, साक्षी गोपालपुर, देवगवां, मड़रुवा, जरिगवां, नैमिषारण्य, कोलवा बरेठी व मिश्रिख शामिल हैं। प्रत्येक पड़ाव स्थल का अपना अलग पौराणिक महत्व है।
कई संप्रदायों का होता संगम
इस मेले में हिन्दू धर्म के प्रमुख पंथ शामिल होकर परिक्रमा व पूजा-अर्चना करते हैं। इसके अलावा वैष्णो धर्म के गृहस्थ, नागा सम्प्रदाय, कबीर सम्प्रदाय, बौद्ध भिक्षु, ब्रम्हकु मारीज भी शामिल होते हैं। इसमें राष्ट्रीय स्तर के कलाकारों द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम भी किए जाते हैं।