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निबंध किसी पाश्चात्य परम्परा की उपज मानना हमारी भूल है
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सिद्घार्थ विश्वविद्यालय पर संगोष्ठी को संबोधित करते कुलपति
- फोटो : SIDDHARTHNAGAR
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‘निबंध पाश्चात्य परंपरा की उपज मानना हमारी भूल’
छोटी घटना से विचार का निष्पादन हिंदी निबंध साहित्य की उपलब्धि : प्रो. विश्वनाथ
सिद्धार्थ विश्वविद्यालय में दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन
संगोष्ठी में 60 शोधपत्र प्रस्तुत हुए
अमर उजाला ब्यूरो
कपिलवस्तु। सिद्धार्थ विश्वविद्यालय में उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान लखनऊ व अखिल भारतीय साहित्य परिषद गोरक्षप्रांत के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित हिंदी निबंध साहित्य सांस्कृतिक संदर्भ विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी रविवार को संपन्न हो गई। इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि श्रीराम परिहार ने कहा कि साहित्य की आधारशिला निबंध है। गद्य कवियों की कसौटी है, निबंध गद्य की कसौटी है और निबंध की कसौटी ललित निबंध है। निबंध किसी पाश्चात्य परंपरा की उपज मानना हमारी भूल है।
मुख्य अतिथि साहित्य अकादमी नई दिल्ली के पूर्व अध्यक्ष प्रो. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने कहा कि छोटी-छोटी घटना से गंभीर विचार का निष्पादन हिंदी निबंध साहित्य की उपलब्धि है। कहा कि यदि निबंध को वैचारिकता से जोड़ दिया जाए तो हम निबंध साहित्य को सूखने से बचा सकते हैं। उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष प्रो. सदानंद प्रसाद गुप्त ने कहा कि संस्कृति समन्वय की बात करती है और यह सांस्कृतिक समन्वय भारतीय हिंदी साहित्य और खासतौर पर निबंध साहित्य में देखा जा सकता है। मुख्य वक्ता प्रो. चितरंजन मिश्रा ने कहा कि साहित्य का सृजन समय के दबाव में होता है। समय के दबाव के बिना कुछ भी संभव नहीं हो सकता। अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. कन्हैया सिंह ने कहा कि साहित्य की प्रत्येक विधा लालित्यपूर्ण होती है। डॉ. सत्यपाल शर्मा ने कहा कि साहित्य के सभी जीवन मूल्य संस्कृति के ही जीवन मूल्य है। डॉ. मुन्ना तिवारी ने कहा कि संस्कृति जीवन की खेती होती है और साहित्य संस्कृति की उपज है।
प्रो. सुधीर प्रताप सिंह ने कहा कि साहित्य का केंद्र संस्कृति है। कार्यक्रम को प्रो. विमलेश मिश्र, प्रो. कुमुद शर्मा ने भी संबोधित किया। कुलपति प्रो. सुरेंद्र दुबे ने कहा कि निबंध की शुरूआत ही सांस्कृतिक शब्दों से मिलकर होती है जिसमें हम रहते हैं, वह सभ्यता है, जो हम में रहती है वह संस्कृति है। संगोष्ठी में कुल 60 शोध पत्र प्रस्तुत किए गए। इस संगोष्ठी में गोरखपुर, वाराणसी, लखनऊ, खंडवा, छपरा, प्रयागराज, आजमगढ़ व झांसी आदि स्थानों से प्रोफेसर शामिल हुए।
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संचालन डॉ. सूर्यनाथ पांडेय ने किया एवं कुलसचिव राकेश कुमार ने आभार व्यक्त किया। संगोष्ठी में मुख्य रूप से वित्त अधिकारी विनोद कुमार, डॉ. अल्का पांडेय, डॉ. जय सिंह यादव, डॉ. पूर्णेश नारायण सिंह, डॉ. प्रत्यूष दुबे, प्रो. विमलेश मिश्र, डॉ. केएन गुप्ता, डॉ. अमिता दुबे, डॉ. विजयानंद मिश्र, डॉ. राम नारायण त्रिपाठी, डॉ. दमयंती तिवारी, डॉ. अचला पांडेय, डॉ. अमित भारती, डॉ. पवन अग्रवाल, प्रो. दीपक प्रकाश त्यागी, डॉ. हेमांशु सेन, डॉ. सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी, डॉ. नरेंद्र कुमार पटेल आदि मौजूूद रहे।
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छोटी घटना से विचार का निष्पादन हिंदी निबंध साहित्य की उपलब्धि : प्रो. विश्वनाथ
सिद्धार्थ विश्वविद्यालय में दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन
संगोष्ठी में 60 शोधपत्र प्रस्तुत हुए
अमर उजाला ब्यूरो
कपिलवस्तु। सिद्धार्थ विश्वविद्यालय में उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान लखनऊ व अखिल भारतीय साहित्य परिषद गोरक्षप्रांत के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित हिंदी निबंध साहित्य सांस्कृतिक संदर्भ विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी रविवार को संपन्न हो गई। इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि श्रीराम परिहार ने कहा कि साहित्य की आधारशिला निबंध है। गद्य कवियों की कसौटी है, निबंध गद्य की कसौटी है और निबंध की कसौटी ललित निबंध है। निबंध किसी पाश्चात्य परंपरा की उपज मानना हमारी भूल है।
मुख्य अतिथि साहित्य अकादमी नई दिल्ली के पूर्व अध्यक्ष प्रो. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने कहा कि छोटी-छोटी घटना से गंभीर विचार का निष्पादन हिंदी निबंध साहित्य की उपलब्धि है। कहा कि यदि निबंध को वैचारिकता से जोड़ दिया जाए तो हम निबंध साहित्य को सूखने से बचा सकते हैं। उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष प्रो. सदानंद प्रसाद गुप्त ने कहा कि संस्कृति समन्वय की बात करती है और यह सांस्कृतिक समन्वय भारतीय हिंदी साहित्य और खासतौर पर निबंध साहित्य में देखा जा सकता है। मुख्य वक्ता प्रो. चितरंजन मिश्रा ने कहा कि साहित्य का सृजन समय के दबाव में होता है। समय के दबाव के बिना कुछ भी संभव नहीं हो सकता। अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. कन्हैया सिंह ने कहा कि साहित्य की प्रत्येक विधा लालित्यपूर्ण होती है। डॉ. सत्यपाल शर्मा ने कहा कि साहित्य के सभी जीवन मूल्य संस्कृति के ही जीवन मूल्य है। डॉ. मुन्ना तिवारी ने कहा कि संस्कृति जीवन की खेती होती है और साहित्य संस्कृति की उपज है।
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प्रो. सुधीर प्रताप सिंह ने कहा कि साहित्य का केंद्र संस्कृति है। कार्यक्रम को प्रो. विमलेश मिश्र, प्रो. कुमुद शर्मा ने भी संबोधित किया। कुलपति प्रो. सुरेंद्र दुबे ने कहा कि निबंध की शुरूआत ही सांस्कृतिक शब्दों से मिलकर होती है जिसमें हम रहते हैं, वह सभ्यता है, जो हम में रहती है वह संस्कृति है। संगोष्ठी में कुल 60 शोध पत्र प्रस्तुत किए गए। इस संगोष्ठी में गोरखपुर, वाराणसी, लखनऊ, खंडवा, छपरा, प्रयागराज, आजमगढ़ व झांसी आदि स्थानों से प्रोफेसर शामिल हुए।
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संचालन डॉ. सूर्यनाथ पांडेय ने किया एवं कुलसचिव राकेश कुमार ने आभार व्यक्त किया। संगोष्ठी में मुख्य रूप से वित्त अधिकारी विनोद कुमार, डॉ. अल्का पांडेय, डॉ. जय सिंह यादव, डॉ. पूर्णेश नारायण सिंह, डॉ. प्रत्यूष दुबे, प्रो. विमलेश मिश्र, डॉ. केएन गुप्ता, डॉ. अमिता दुबे, डॉ. विजयानंद मिश्र, डॉ. राम नारायण त्रिपाठी, डॉ. दमयंती तिवारी, डॉ. अचला पांडेय, डॉ. अमित भारती, डॉ. पवन अग्रवाल, प्रो. दीपक प्रकाश त्यागी, डॉ. हेमांशु सेन, डॉ. सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी, डॉ. नरेंद्र कुमार पटेल आदि मौजूूद रहे।