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तीन युवा इंजीनियर दोस्त की कामयाबी

Mon, 05 Jul 2021 10:03 PM IST
Gorakhpur Bureau गोरखपुर ब्यूरो
Updated Mon, 05 Jul 2021 10:03 PM IST
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Was unemployed himself, now giving employment
खुद थे बेरोजगार, अब दे रहे हैं रोजगार
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तीन युवा इंजीनियर दोस्तों ने शुरू किया ठेके पर काम
कोरोना काल में चली गई थी नौकरी, फिर शुरू की कोशिश
संवाद न्यूज एजेंसी
सिद्धार्थनगर। जिले के तीन युवा इंजीनियर दोस्तों कोरोना काल में बेरोजगार हो गए थे लेकिन अब वे रोजगार बांटने के काबिल हो गए हैं। उन्होंने आपदा में अवसर तलाशते हुए ठेके पर निर्माण का कार्य शुरू किया। काम की लगन और गुणवत्ता से उनकी कामयाबी का सफर शुरू हो गया। उनके साथ 34 अन्य लोगों को भी रोजगार मिल गया है, जबकि उन्हें भी पहले की नौकरी की अपने अपेक्षा अपने हुनर से मिला काम ज्यादा भा रहा है।
एक साथ सिविल इंजीनियरिंग से बीटेक करने वाले अभिषेक यादव, गोविंद यादव और आशीष ने बताया कि कोरोना संक्रमण के दौर में करीब एक साल पहले अन्य लोगों की तरह उनकी भी नौकरी चली गई थी। उसके बाद तीनों ने मिलकर एक कंसट्रक्शन कंपनी बनाई। उसे सोशल मीडिया में पोस्ट कर काम की मांग की। गोंडा में किसी जरूरतमंद ने उनकी पोस्ट देखी और संपर्क किया। कंपनी को काम नहीं मिला लेकिन उन्होंने ठेके पर कार्य शुरू किया। मकान बनाने का काम उन्होंने लिया। जायज दर और बेहतर काम की बदौलत उन्हें तीन माह से लगातार काम मिल रहा है। वहीं उन्होंने जिले के 11 राजगीर सहित 34 लोगों को गोंडा में काम दिया है। इन राजगीरों और श्रमिकों को उस दौर में काम मिल गया, जब वे सिद्धार्थ चौराहे पर सुबह एक दिन का काम पाने के लिए काफी इंतजार करते थे।
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अहमदाबाद और गुड़गांव से आए थे लौटकर
बढ़नी के डढ़उर गांव के निवासी अभिषेक ने बताया कि तीनों साथियों ने कानपुर देहात स्थित एक इंस्टीट्यूट से बीटेक किया था। 2017 में डिग्री मिली, उसके बाद एक साल पीडब्ल्यूडी में ट्रेनिंग की। अहमदाबाद और गुड़गांव में नौकरी किया और जून 2020 में घर आना पड़ा। उन्होंने बताया कि उनके मामा अहिरौली निवासी विजय यादव ने काफी संघर्ष करके उनकी इंजीनियरिंग की पढ़ाई कराई थी, बेरोजगार हुए तो काफी अखर रहा था।
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पिता के निधन के बाद गई थी नौकरी
नौगढ़ ब्लॉक के बसौनी निवासी गोविंद ने बताया कि वर्ष 2019 में उनके पिता मोतीलाल यादव का निधन हो गया। कुछ माह बाद ही कोरोना के कारण मप्र में वेतन आधा कर दिया गया तो घर आ गए थे। तीनों दोस्तों ने मिलकर अपना कार्य शुरू करने की कोशिश की। जिले के राजगीर और श्रमिकों को साथ ले गए ताकि उनकी आय हो और एक-दूसरे पर भरोसा कायम रहे।

खेती में बंटा रहे थे हाथ
बछड़ा बछड़ा निवासी आशीष कुमार ने बताया कि कोरोना संक्रमण के दौर से पहले वे गोरखपुर के कंस्ट्रक्शन कंपनी में नौकरी कर रहे थे। कोरोना की लहर में काम बंद हुआ तो घर आ गए। उसके बाद परिवार के लोगों के साथ खेती में हाथ बंटाने लगे थे। खेती से तरक्की की कोशिश के दौरान ही दोस्तों ने अपना काम शुरू करने का निर्णय किया। मार्च में बात हुई और अप्रैल में काम शुरू हो गया। अब हमारी इंजीनियरिंग सार्थक होती नजर आ रही है।
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