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वायरल वीडियो का सच : बोले डिप्टी सीएमओ लिए थे रुपये
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- सीएमओ के दबाव में आकर करना पड़ा काम
- वायरल वीडियो प्रकरण में सीएमओ, अस्पताल संचालक और मेरे अलावा कोई अन्य दोषी नहीं
- कागजों में फंसाने की धमकी देकर बनाते रहे मानकविहीन कार्यों को करने का दबाव
- सीएमओ के शिकायती पत्र देने के बाद दोनों डिप्टी सीएमओ ने तोड़ी चुप्पी, लगाई आरोपों की झड़ी
संवाद न्यूज एजेंसी
सिद्धार्थनगर। निजी अस्पताल को चालू करने के लिए रुपये के लेनदेन का वीडियो वायरल होने के बाद सवालों के घेरे में आए सीएमओ डॉ. बीके अग्रवाल ने जिन दोनों डिप्टी सीएमओ पर आरोप लगाया था, उन दोनों ने चुप्पी तोड़ दी है। रुपये के लेनदेन की संबंध में हुई वार्ता को सच बताया है। साथ ही यह भी आरोप लगाया कि सीएमओ के दबाव में मानकविहीन अस्पताल के संचालन के लिए डेढ़ लाख रुपये लिए और पूरा पैसा उन्हें पहुंचा दिया। यह बातें डिप्टी सीएमओ डॉ. बीएन चतुर्वेदी ने सोमवार को प्रेस कांफ्रेंस में कहीं।
उन्होंने कहा कि इस मामले में सीएमओ, निजी अस्पताल संचालक और मेरे स्वयं के अलावा कोई और नहीं है। रुपये भी उन्हीं के कहने पर लिए और उन्हें दे दिया, लेकिन जब उन्होंने काम नहीं किए तो रुपये मांगे गए, जो वीडियो में सामने आया है। सारा काम उनके दबाव में आकर किया है। हमारा इसमें कोई दोष नहीं है। वहीं, वीडियो में दिखते डिप्टी सीएमओ और अस्पताल के जांच से जुड़े नोडल डॉ. एमएम त्रिपाठी ने भी सीएमओ पर गंभीर आरोप लगाते हुए सवाल किया।
तीन दिन पहले सीएमओ कार्यालय का एक के बाद एक करके कई वीडियो और ऑडियो वायरल हुआ। एक वीडियो में सीएमओ डॉ. बीके अग्रवाल का अपने कार्यालय में बैठकर रुपये के लेनदेन की बात हो रही है। इसमें डिप्टी सीएमओ डॉ. बीएन चतुर्वेदी भी नजर आए हैं, जो रुपये के संबंध में वार्ता करते हुए दिख रहे हैं। वहीं, एक अन्य वीडियो में अस्पतालों के जांच के नोडल व डिप्टी सीएमओ डॉ. एमएम त्रिपाठी और बीएन चतुर्वेदी नजर आए हैं, लेकिन वार्ता के दौरान डॉ. एमएम त्रिपाठी की कोई प्रतिक्रिया नजर नहीं आ रही है। वीडियो के वायरल होने के बाद सीएमओ ने दोनों नोडल अधिकारियों केे खिलाफ एसपी को शिकायती पत्र दिया। जिसकी जांच एएसपी कर रहे हैं। इधर जब दोनों डिप्टी सीएमओ खिलाफ शिकायत हुई तो सोमवार को दोनों लोगों ने चुप्पी तोड़ दी। प्रेस काफ्रेंस करके दोनों सीएमओ पर लगातार दबाव बनाकर गलत कार्य करवाने और रुपये लेकर आने के लिए परेशान करने सहित कई गंभीर आरोप लगाया है। दोनों ने प्रेस कांफ्रेंस के जरिए सीएमओ से सवाल किया है। इसके बोलने के बाद कार्यालय में हड़कंप मचा हुआ है।
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नियम विरुद्ध एक माह का जारी किया लाइसेंस
डिप्टी सीएमओ डॉ. बीएन चतुर्वेदी ने वायरल वीडियाे के पीछे के हकीकत को बताते हुए कहा कि मार्च माह के करीब सीएमओ की ओर से आदेश किया जाता बांसी में संचालित होने वाले अवध अस्पताल को जाकर देख लो और जांच करने साथ ही उसे बोल दो कि अवध के बजाए नाम एएच करने के लिए कह देना। वह खुद साथ जाने वाले होते हैं, लेकिन कहते हैं कि हम डुमरियागंज जा रहे हैं। अस्पताल पर गए जांच किए और रिपोर्ट लाकर दे दिए। जांच में पाया गया कि केवल जनवरी माह के लिए ही अस्पताल को लाइसेंस मिला है। जबकि यह किसी नियम में है ही नहीं। इसके बाद उसे दौड़ाने और रुपये की मांग शुरू होती है। अस्पताल संचालक और सीएमओ से वार्ता होती है। फिर उनके कहने पर हमें और एक बार एक लाख रुपये और एक बार 50 हजार रुपये लाकर मिलने के एक घंटे के भीतर ही दे दिए। इस दौरान कई बार वह दौड़कर आए। लेकिन बोले अस्पताल नहीं चलने देंगे। पांच से छह लाख रुपये की बात की गई। जब काम नहीं हुआ तो संचालक ने बोला साहब रुपये दिलावा दीजिए। हम कहे, लेकिन रुपये नहीं दे रहे थे। उस रुपये से हमारा कोई लेना देना नहीं हैं। कहने पर दबाव में आकर उन्होंने मांगकर उन्हें दिया था। इसमें तीन के अलावा चौथा कोई नहीं है। जिस नोडल की बात कही जा रही है, उस वक्त नोडल वे थे।
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सीएमओ से पूछे सवाल
डिप्टी डॉ. बीएन चतुर्वेदी ने सीएमओ से सवाल पूछा कि क्या किसी अस्पताल को एक माह के लिए लाइसेंस दिया जाता है? अगर दिया गया तो किसके दबाव में और कैसे लालच में दिया गया। अगर जनवरी माह का लाइसेंस दिया गया तो उसके बाद वह कैसे अस्पताल संचालित कर रहा था और क्या नाम बदल देने से मानक पूरा हो जाता है। अगर इस प्रकार हमारी गलती थी तो क्यों स्पष्टीकरण नहीं मांगा गया? अगर कार्यालय में रुपये के लेनदेन करने की बात लगत है तो क्यों इसके बारे में बात नहीं कर रहे हैं। अगर वीडियो से पहले उनको जानकारी थी, तो क्यों हमारे ऊपर कार्रवाई नहीं किए। इन सवालों का जवाब उन्हें देना चाहिए।
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वीडियो से नहीं है मेरा वास्ता, हमेशा गलत कार्य के लिए बनाते रहे दबाव
डिप्टी सीएमओ व नोडल डॉ. एमएम त्रिपाठी ने कहा कि सीएमओ कार्यालय में रुपये के लेनदेन के वीडियो से उनका कोई वास्ता नहीं है। वह कार्यालय में जरूर थे, लेकिन उससे बात के दौरान उन्होंने किसी से कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। सीएमओ की गाड़ी में तेल की बात चालक से हुई है। एक मद के जरिए तेल मिलता है, जिसकी वे कार्यालय में बैठकर रसीद देते हुए नजर आए हैं। उन्हें फंसाया जा रहा है। उन्होंने लगातार अस्पतालों की जांच की और रिपोर्ट दी।
उन्होंने कहा कि छापे के बाद निजी अस्पतालों व जांच सेंटरों के खिलाफ केस दर्ज कराना था, लेकिन कई मामले में केस दर्ज नहीं कराया गया। उल्टे डुमरियागंज और अन्य स्थानों से जानकारी मिलती रही कि बंद किए हुए अस्पताल को संचालक चला रहे हैं। जब एसडीएम और पुलिस की मौजूदगी में अस्पताल सील किए गए और उसे खुलवाने का अधिकार सीएमओ को है तो वह अस्पताल कैसे संचालित होते हैं? इसका मतलब इसमें कहीं न कहीं गड़बड़ी की गई है? वहीं, अल्ट्रासाउंड की जांच के लिए टीम गठित होती है, जांच रिपोर्ट जाती है। इसके बाद संचालन होगा या नहीं, यह तय होता रिपोर्ट से , लेकिन यह यह कार्य में उनसे हस्ताक्षर करवाया जा रहा था, जिसे लेकर उनसे और सीएमओ बहस भी हो चुकी है। डिप्टी सीएमओ ने नोडल का चार्ज लेते समय मना किया तो क्यों चार्ज दिया गया? अगर वे गलत थे तो कार्रवाई और नोटिस देने का कार्य क्यों नहीं किया गया ?
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रिपोर्ट के बाद भी नहीं की कार्रवाई, डिप्टी सीएम के ट्वीट के बाद जागे
बर्डपुर क्षेत्र में संचालित होने वाले विद्या अस्पताल की जांच की गई। शिकायत सही पाए जाने पर रिपोर्ट तैयार करके दी गई, लेकिन उस पर केस दर्ज कराने के बजाए संचालन हो रहा था। इस मामले में जब डिप्टी सीएम का ट्वीट हुआ तो कार्रवाई की गई और उन्हें दोषी बना दिया गया, जबकि वे पहले ही रिपोर्ट दे चुके है। इसी प्रकार उसका बाजार के अस्पताल, डुमरियागंज का अस्पताल जांच फिजियोथेरिपी वाला मरीज भर्ती कर रहा था। इटवा में संचालित होने वाले अस्पताल सहित कई अस्पताल हैं। चार्ज लेने के बाद 39 छापा मारे। इसमें केवल 13 पर ही कार्रवाई हुई। बाकी में रिपोर्ट देने के बाद क्या किया गया? इसका जवाब सीएमओ को देना चाहिए। वे गलत नहीं है।
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जिस अस्पताल का मामला, गायब कर दी फाइल
जिस अस्पताल को लेकर वीडियो वायरल हुआ है। उसकी फाइल ही गायब कर दी गई है। इसी प्रकार डॉ. बीएन चतुर्वेदी के द्वारा जांच की गई फाइलें गुम हैं। यह गुम नहीं हुआ है, बल्कि गुम किया गया है। यह दोनों डिप्टी सीएमओ ने आरोप लगाया है। उनका कहना है कि फाइलें होती तो और सच्चाई सामने आती।
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जान से मारने की मिली धमकी, मांगा सहारा तो जवाब भी नहीं मिला
नोडल अधिकारी डॉ. एमएम त्रिपाठी ने कहा कि नगर के अस्पताल को जांच करने के लिए हमें भेजा गया। जांच में अनियमितता मिलने पर अस्पताल को सील करवा दिया गया। इसके बाद हमें लगातार जान से मारने की धमकी मिल रही है। पहली बार धमकी मिलने के बाद सीएमओ के व्हाट्सएप पर मैसेज किया। लेकिन इस पर कोई जवाब नहीं मिला। अगर उल्टा मानसिक रूप से परेशान किया जा रहा है।
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- वायरल वीडियो प्रकरण में सीएमओ, अस्पताल संचालक और मेरे अलावा कोई अन्य दोषी नहीं
- कागजों में फंसाने की धमकी देकर बनाते रहे मानकविहीन कार्यों को करने का दबाव
- सीएमओ के शिकायती पत्र देने के बाद दोनों डिप्टी सीएमओ ने तोड़ी चुप्पी, लगाई आरोपों की झड़ी
संवाद न्यूज एजेंसी
सिद्धार्थनगर। निजी अस्पताल को चालू करने के लिए रुपये के लेनदेन का वीडियो वायरल होने के बाद सवालों के घेरे में आए सीएमओ डॉ. बीके अग्रवाल ने जिन दोनों डिप्टी सीएमओ पर आरोप लगाया था, उन दोनों ने चुप्पी तोड़ दी है। रुपये के लेनदेन की संबंध में हुई वार्ता को सच बताया है। साथ ही यह भी आरोप लगाया कि सीएमओ के दबाव में मानकविहीन अस्पताल के संचालन के लिए डेढ़ लाख रुपये लिए और पूरा पैसा उन्हें पहुंचा दिया। यह बातें डिप्टी सीएमओ डॉ. बीएन चतुर्वेदी ने सोमवार को प्रेस कांफ्रेंस में कहीं।
उन्होंने कहा कि इस मामले में सीएमओ, निजी अस्पताल संचालक और मेरे स्वयं के अलावा कोई और नहीं है। रुपये भी उन्हीं के कहने पर लिए और उन्हें दे दिया, लेकिन जब उन्होंने काम नहीं किए तो रुपये मांगे गए, जो वीडियो में सामने आया है। सारा काम उनके दबाव में आकर किया है। हमारा इसमें कोई दोष नहीं है। वहीं, वीडियो में दिखते डिप्टी सीएमओ और अस्पताल के जांच से जुड़े नोडल डॉ. एमएम त्रिपाठी ने भी सीएमओ पर गंभीर आरोप लगाते हुए सवाल किया।
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तीन दिन पहले सीएमओ कार्यालय का एक के बाद एक करके कई वीडियो और ऑडियो वायरल हुआ। एक वीडियो में सीएमओ डॉ. बीके अग्रवाल का अपने कार्यालय में बैठकर रुपये के लेनदेन की बात हो रही है। इसमें डिप्टी सीएमओ डॉ. बीएन चतुर्वेदी भी नजर आए हैं, जो रुपये के संबंध में वार्ता करते हुए दिख रहे हैं। वहीं, एक अन्य वीडियो में अस्पतालों के जांच के नोडल व डिप्टी सीएमओ डॉ. एमएम त्रिपाठी और बीएन चतुर्वेदी नजर आए हैं, लेकिन वार्ता के दौरान डॉ. एमएम त्रिपाठी की कोई प्रतिक्रिया नजर नहीं आ रही है। वीडियो के वायरल होने के बाद सीएमओ ने दोनों नोडल अधिकारियों केे खिलाफ एसपी को शिकायती पत्र दिया। जिसकी जांच एएसपी कर रहे हैं। इधर जब दोनों डिप्टी सीएमओ खिलाफ शिकायत हुई तो सोमवार को दोनों लोगों ने चुप्पी तोड़ दी। प्रेस काफ्रेंस करके दोनों सीएमओ पर लगातार दबाव बनाकर गलत कार्य करवाने और रुपये लेकर आने के लिए परेशान करने सहित कई गंभीर आरोप लगाया है। दोनों ने प्रेस कांफ्रेंस के जरिए सीएमओ से सवाल किया है। इसके बोलने के बाद कार्यालय में हड़कंप मचा हुआ है।
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डिप्टी सीएमओ डॉ. बीएन चतुर्वेदी ने वायरल वीडियाे के पीछे के हकीकत को बताते हुए कहा कि मार्च माह के करीब सीएमओ की ओर से आदेश किया जाता बांसी में संचालित होने वाले अवध अस्पताल को जाकर देख लो और जांच करने साथ ही उसे बोल दो कि अवध के बजाए नाम एएच करने के लिए कह देना। वह खुद साथ जाने वाले होते हैं, लेकिन कहते हैं कि हम डुमरियागंज जा रहे हैं। अस्पताल पर गए जांच किए और रिपोर्ट लाकर दे दिए। जांच में पाया गया कि केवल जनवरी माह के लिए ही अस्पताल को लाइसेंस मिला है। जबकि यह किसी नियम में है ही नहीं। इसके बाद उसे दौड़ाने और रुपये की मांग शुरू होती है। अस्पताल संचालक और सीएमओ से वार्ता होती है। फिर उनके कहने पर हमें और एक बार एक लाख रुपये और एक बार 50 हजार रुपये लाकर मिलने के एक घंटे के भीतर ही दे दिए। इस दौरान कई बार वह दौड़कर आए। लेकिन बोले अस्पताल नहीं चलने देंगे। पांच से छह लाख रुपये की बात की गई। जब काम नहीं हुआ तो संचालक ने बोला साहब रुपये दिलावा दीजिए। हम कहे, लेकिन रुपये नहीं दे रहे थे। उस रुपये से हमारा कोई लेना देना नहीं हैं। कहने पर दबाव में आकर उन्होंने मांगकर उन्हें दिया था। इसमें तीन के अलावा चौथा कोई नहीं है। जिस नोडल की बात कही जा रही है, उस वक्त नोडल वे थे।
सीएमओ से पूछे सवाल
डिप्टी डॉ. बीएन चतुर्वेदी ने सीएमओ से सवाल पूछा कि क्या किसी अस्पताल को एक माह के लिए लाइसेंस दिया जाता है? अगर दिया गया तो किसके दबाव में और कैसे लालच में दिया गया। अगर जनवरी माह का लाइसेंस दिया गया तो उसके बाद वह कैसे अस्पताल संचालित कर रहा था और क्या नाम बदल देने से मानक पूरा हो जाता है। अगर इस प्रकार हमारी गलती थी तो क्यों स्पष्टीकरण नहीं मांगा गया? अगर कार्यालय में रुपये के लेनदेन करने की बात लगत है तो क्यों इसके बारे में बात नहीं कर रहे हैं। अगर वीडियो से पहले उनको जानकारी थी, तो क्यों हमारे ऊपर कार्रवाई नहीं किए। इन सवालों का जवाब उन्हें देना चाहिए।
वीडियो से नहीं है मेरा वास्ता, हमेशा गलत कार्य के लिए बनाते रहे दबाव
डिप्टी सीएमओ व नोडल डॉ. एमएम त्रिपाठी ने कहा कि सीएमओ कार्यालय में रुपये के लेनदेन के वीडियो से उनका कोई वास्ता नहीं है। वह कार्यालय में जरूर थे, लेकिन उससे बात के दौरान उन्होंने किसी से कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। सीएमओ की गाड़ी में तेल की बात चालक से हुई है। एक मद के जरिए तेल मिलता है, जिसकी वे कार्यालय में बैठकर रसीद देते हुए नजर आए हैं। उन्हें फंसाया जा रहा है। उन्होंने लगातार अस्पतालों की जांच की और रिपोर्ट दी।
उन्होंने कहा कि छापे के बाद निजी अस्पतालों व जांच सेंटरों के खिलाफ केस दर्ज कराना था, लेकिन कई मामले में केस दर्ज नहीं कराया गया। उल्टे डुमरियागंज और अन्य स्थानों से जानकारी मिलती रही कि बंद किए हुए अस्पताल को संचालक चला रहे हैं। जब एसडीएम और पुलिस की मौजूदगी में अस्पताल सील किए गए और उसे खुलवाने का अधिकार सीएमओ को है तो वह अस्पताल कैसे संचालित होते हैं? इसका मतलब इसमें कहीं न कहीं गड़बड़ी की गई है? वहीं, अल्ट्रासाउंड की जांच के लिए टीम गठित होती है, जांच रिपोर्ट जाती है। इसके बाद संचालन होगा या नहीं, यह तय होता रिपोर्ट से , लेकिन यह यह कार्य में उनसे हस्ताक्षर करवाया जा रहा था, जिसे लेकर उनसे और सीएमओ बहस भी हो चुकी है। डिप्टी सीएमओ ने नोडल का चार्ज लेते समय मना किया तो क्यों चार्ज दिया गया? अगर वे गलत थे तो कार्रवाई और नोटिस देने का कार्य क्यों नहीं किया गया ?
रिपोर्ट के बाद भी नहीं की कार्रवाई, डिप्टी सीएम के ट्वीट के बाद जागे
बर्डपुर क्षेत्र में संचालित होने वाले विद्या अस्पताल की जांच की गई। शिकायत सही पाए जाने पर रिपोर्ट तैयार करके दी गई, लेकिन उस पर केस दर्ज कराने के बजाए संचालन हो रहा था। इस मामले में जब डिप्टी सीएम का ट्वीट हुआ तो कार्रवाई की गई और उन्हें दोषी बना दिया गया, जबकि वे पहले ही रिपोर्ट दे चुके है। इसी प्रकार उसका बाजार के अस्पताल, डुमरियागंज का अस्पताल जांच फिजियोथेरिपी वाला मरीज भर्ती कर रहा था। इटवा में संचालित होने वाले अस्पताल सहित कई अस्पताल हैं। चार्ज लेने के बाद 39 छापा मारे। इसमें केवल 13 पर ही कार्रवाई हुई। बाकी में रिपोर्ट देने के बाद क्या किया गया? इसका जवाब सीएमओ को देना चाहिए। वे गलत नहीं है।
जिस अस्पताल का मामला, गायब कर दी फाइल
जिस अस्पताल को लेकर वीडियो वायरल हुआ है। उसकी फाइल ही गायब कर दी गई है। इसी प्रकार डॉ. बीएन चतुर्वेदी के द्वारा जांच की गई फाइलें गुम हैं। यह गुम नहीं हुआ है, बल्कि गुम किया गया है। यह दोनों डिप्टी सीएमओ ने आरोप लगाया है। उनका कहना है कि फाइलें होती तो और सच्चाई सामने आती।
जान से मारने की मिली धमकी, मांगा सहारा तो जवाब भी नहीं मिला
नोडल अधिकारी डॉ. एमएम त्रिपाठी ने कहा कि नगर के अस्पताल को जांच करने के लिए हमें भेजा गया। जांच में अनियमितता मिलने पर अस्पताल को सील करवा दिया गया। इसके बाद हमें लगातार जान से मारने की धमकी मिल रही है। पहली बार धमकी मिलने के बाद सीएमओ के व्हाट्सएप पर मैसेज किया। लेकिन इस पर कोई जवाब नहीं मिला। अगर उल्टा मानसिक रूप से परेशान किया जा रहा है।