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Siddharthnagar News: रमजान का पाक महीना शुरू, रोजेदारों ने रखा पहला रोजा
Fri, 20 Feb 2026 02:51 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
Updated Fri, 20 Feb 2026 02:51 AM IST
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भवानीगंज। रमजान माह का आगाज बुधवार की शाम आसमान में चांद के दीदार के साथ हो गया। इसके बाद बृहस्पतिवार को मुस्लिम समुदाय के लोगों ने अपना पहला रोजा रखा। शाम को इफ्तार के बाद रोजेदारों ने तरावीह की नमाज अदा की और कलाम पाक की तिलावत शुरू कर दी। यह सिलसिला पूरे महीने यानी 30 रमजान तक जारी रहेगा।
मुस्लिम बहुल इलाकों के गांवों में रमजान को लेकर इबादतगाहों और मस्जिदों के बाहर साफ-सफाई का काम दो दिन पहले ही पूरा कर दिया गया था। रमजान की रौनक पहले से ही नजर आने लगी थी। लोग बृहस्पतिवार से ही अल्लाह की बंदगी यानी इबादत में मशगूल होने के लिए तैयार हो गए हैं।
डुमरियागंज जामा मस्जिद के मौलाना एहसानुल्लाह कासमी ने बताया कि इस्लाम धर्म में पांच बातें मुसलमानों पर फर्ज (अनिवार्य) हैं, जिनमें रोजा भी शामिल है। पूरे महीने चलने वाला रोजा हर मुसलमान पर रखना अनिवार्य है। किसी भी परिस्थिति में रोजा छोड़ना मना है। केवल गंभीर बीमारियों या विशेष परिस्थितियों में इसे छोड़ने की छूट है, लेकिन स्वास्थ्य लाभ होने के बाद रोजे की भरपाई करना अनिवार्य है। रमजान में रात के आखिरी पहर में सेहरी खाने के बाद पूरे दिन कुछ भी नहीं खाया-पिया जाता। सूर्यास्त होते ही यानी मगरिब की अजान और नमाज के बाद ही लोग इफ्तार करते हैं।
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मौलाना एहसानुल्लाह कासमी ने बताया कि रोजा सिर्फ भूखा-प्यासा रहने का नाम नहीं है, बल्कि अपनी इंद्रियों पर पूरी तरह काबू पाने का साधन है। रोजेदारों को अपना पूरा समय अल्लाह की इबादत, नमाज और कलाम पाक की तिलावत में व्यतीत करना चाहिए। उन्होंने कहा कि रमजान का पाक महीना सभी बुराइयों, गीबत, झूठ और चुगलखोरी से दूर रहकर नेक और अच्छे इंसान बनने का समय है। यह महीना रहमतों, बरकतों और मागफिरत का महीना है।
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रोजे में इनसे रहें दूर
- हल्लौर स्थित जामा मस्जिद के मौलाना शहकार हुसैन जैदी ने बताया कि रोजा रखने के दौरान मुसलमानों को आपसी मतभेद, एक-दूसरे की बुराई या अपशब्दों से बचना चाहिए। रोजेदारों को अमन-शांति और भाईचारे का माहौल बनाना चाहिए। अपने गिला-शिकवे चांद रात से पहले दूर कर देने चाहिए। रमजान का महीना इबादत का महीना है, इसलिए इस दौरान पूरी लगन और कसरत से इबादत और दुआएं करनी चाहिए।
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मुस्लिम बहुल इलाकों के गांवों में रमजान को लेकर इबादतगाहों और मस्जिदों के बाहर साफ-सफाई का काम दो दिन पहले ही पूरा कर दिया गया था। रमजान की रौनक पहले से ही नजर आने लगी थी। लोग बृहस्पतिवार से ही अल्लाह की बंदगी यानी इबादत में मशगूल होने के लिए तैयार हो गए हैं।
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डुमरियागंज जामा मस्जिद के मौलाना एहसानुल्लाह कासमी ने बताया कि इस्लाम धर्म में पांच बातें मुसलमानों पर फर्ज (अनिवार्य) हैं, जिनमें रोजा भी शामिल है। पूरे महीने चलने वाला रोजा हर मुसलमान पर रखना अनिवार्य है। किसी भी परिस्थिति में रोजा छोड़ना मना है। केवल गंभीर बीमारियों या विशेष परिस्थितियों में इसे छोड़ने की छूट है, लेकिन स्वास्थ्य लाभ होने के बाद रोजे की भरपाई करना अनिवार्य है। रमजान में रात के आखिरी पहर में सेहरी खाने के बाद पूरे दिन कुछ भी नहीं खाया-पिया जाता। सूर्यास्त होते ही यानी मगरिब की अजान और नमाज के बाद ही लोग इफ्तार करते हैं।
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मौलाना एहसानुल्लाह कासमी ने बताया कि रोजा सिर्फ भूखा-प्यासा रहने का नाम नहीं है, बल्कि अपनी इंद्रियों पर पूरी तरह काबू पाने का साधन है। रोजेदारों को अपना पूरा समय अल्लाह की इबादत, नमाज और कलाम पाक की तिलावत में व्यतीत करना चाहिए। उन्होंने कहा कि रमजान का पाक महीना सभी बुराइयों, गीबत, झूठ और चुगलखोरी से दूर रहकर नेक और अच्छे इंसान बनने का समय है। यह महीना रहमतों, बरकतों और मागफिरत का महीना है।
रोजे में इनसे रहें दूर
- हल्लौर स्थित जामा मस्जिद के मौलाना शहकार हुसैन जैदी ने बताया कि रोजा रखने के दौरान मुसलमानों को आपसी मतभेद, एक-दूसरे की बुराई या अपशब्दों से बचना चाहिए। रोजेदारों को अमन-शांति और भाईचारे का माहौल बनाना चाहिए। अपने गिला-शिकवे चांद रात से पहले दूर कर देने चाहिए। रमजान का महीना इबादत का महीना है, इसलिए इस दौरान पूरी लगन और कसरत से इबादत और दुआएं करनी चाहिए।