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Siddharthnagar News: गौरैया की चहचहाहट से गूंज रहा सूर्यकुडिया

Tue, 19 Mar 2024 11:50 PM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर Updated Tue, 19 Mar 2024 11:50 PM IST
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Surya Kudiya resonating with the chirping of sparrows
सिद्धार्थनगर। कभी हमारे घर के आंगन की रौनक रही गौरैया की चहक अब गायब हो गई है। भागदौड़ की जिंदगी में हम गौरैया को भूलते जा रहे हैं, जबकि पर्यावरण की दृष्टि से इनका रहना महत्वपूर्ण है। लेकिन जिले में एक बार फिर गौरैया की चहक सुनाई देने लगी है। मुख्यालय से करीब नौ किमी दूर सूर्यकुडिया गांव इसका उदाहरण है। यह गांव गौरैया का गढ़ बनता जा रहा है। बर्डपुर ब्लॉक क्षेत्र के बर्डपुर नंबर 10 के टोला सूर्यकुडिया निवासी कंचन वर्मा डेढ़ दशक से गौरैया का संरक्षण करते आ रहे हैं। इनकी इच्छा साकार करने में परिवार भी लगे हैं।
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कंचन वर्मा की पत्नी कुसुम वर्मा कहती हैं कि कोई जानवर न इस घोंसले तक पहुंचे और इन्हें धूप, बरसात, सर्दी से कहीं इनके बच्चों को कोई नुकसान न पहुंचे। इस पर हमेशा ध्यान दिया जाता है। रोज सुबह दाना, पानी डालना फिर दोपहर में पानी को साफ करके रखना। यह चिड़िया नहीं परिवार का एक हिस्सा हैं। सभी लोग परिवार जैसा इन्हें मानते हैं। सुबह इनकी चूं चूं से घर आनंदित हो जाता है।
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घर पर ऐसे आई गौरैया
कंचन वर्मा ने बताया कि घर में ही कृत्रिम घोंसले लगाए। छतों और चहारदीवारी पर दाना-पानी रखा। धीरे-धीरे कोशिश रंग लाई और रूठी गौरैया लौटने लगी। डेढ़ दशक पहले दो घोंसला बनाया था, धीरे-धीरे यह संख्या बढ़कर 250 के करीब पहुंच गई है। गौरैया के संरक्षण में पूरा परिवार जुटा है।
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गौरैया को बच्चों जैसा ध्यान रखते थे शिव प्रसाद
कंचन वर्मा के पिता शिव प्रसाद वर्मा गौरैया का बच्चों जैसा ध्यान रखते थे। उनकी सुबह गौरैया की चहचहाहट के साथ होती थी। उनकी मृत्यु के बाद पूरा परिवार देखभाल करता है। गांव वाले भी दाना-पानी डालते रहते हैं। सुबह देखने वालों की भीड़ लगी रहती है।
ऐसे बचाएं गौरैया
अगर गौरैया आपके घर में घोंसला बनाए तो उसे बनाने दें उसे हटाए न। रोजाना अपने आंगन, खिड़की, बाहरी दीवारों पर उनके लिए दाना-पानी रखें। गर्मियों में गौरैया के लिए पानी जरूर रखें।
ऐसे बनाएं घोंसला
गौरैया संरक्षण के लिए दफ्ती के डिब्बों, प्लास्टिक की बड़ी बोतलों और मटकियों में छेद करके इनका घर बनाएं। इस कृत्रिम घोंसला को उचित स्थान पर लगाएं। प्रजनन के समय उनके अंडों की सुरक्षा का ध्यान रखना चाहिए।

पहले दो घोंसले थे, जो अब बढ़कर 250 के करीब हो गए हैं। दोनों घरों पर घोंसला बनाया गया है। हर घोंसले में दो से तीन तो किसी में चार-पांच गौरैया रहती हैं। हर सुबह इनकी चहचहाहट से घर ही नहीं पूरा गांव गूंज उठता है।
-कंचन वर्मा, सूर्यकुडिया
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