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आगे आया होता परिवार तो बच जाती बिटिया की जान

Tue, 12 Jul 2022 11:00 PM IST
Gorakhpur Bureau गोरखपुर ब्यूरो
Updated Tue, 12 Jul 2022 11:00 PM IST
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आगे आया होता परिवार तो बच जाती बिटिया की जान
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- बेटी की शिकायत के बाद परिवार के लोगों ने नहीं लिया कानून का सहारा
- बेटी की मौत के बाद बोले पिता, करनी चाहिए थी पुलिस से शिकायत
श्याम सुंदर तिवारी
संवाद न्यूज एजेंसी
सिद्धार्थनगर। बिटिया बार-बार आवाज उठाती रही, लेकिन हर बार परिवार उसे नजरअंदाज करता था। जब बेटी ने शिकायत की तो परिवार के लोगों ने पुलिस के पास जाने के बजाय आरोपियों के घर पर उलाहना देना मुनासिब समझा। मनचलों का मन इतना बढ़ गया कि आरोपियों ने दुष्कर्म की कोशिश की और अंत में लोकलाज के भय और आए दिन होने वाली छेड़खानी से आजिज आकर उसने जीवन लीला ही समाप्त कर ली। इस बात को मृतका के पिता ने भी स्वीकार किया, लेकिन बेटी के दुनिया छोड़ देने के बाद। उनका कहना था कि अगर पुलिस के पास जाते तो शायद आज बिटिया जीवित होती।
जोगिया कोतवाली क्षेत्र की रहने वाली कक्षा आठ में पढ़ने वाली 14 वर्षीय बिटिया पढ़ने में होशियार थी। सातवीं पास करने के बाद इसी वर्ष गांव के पास के ही विद्यालय में आठवीं की कक्षा में उसने दाखिला लिया था। पिता का कहना था कि बेटी अंग्रेजी और गणित विषय में माहिर थी। पढ़कर लिखकर कुछ अच्छा करने की उसने ठानी थी। स्कूल से छूटने के बाद वह घर आकर नियमित पढ़ाई करती थी। घूमने के लिए भी नहीं निकली थी। लगभग तीन माह पूर्व जब उससे आरोपियों ने अभद्रता की तो उसने सीधे घर आकर पूरी बात बतायी, लेकिन गांव का मामला और लोकलाज वश घरवाले आगे नहीं गए। इसी बीच उसके साथ कई बार दुर्व्यवहार किया गया। कुछ दिन पूर्व उलाहना देकर घर लौटे तो आरोपियों ने धमकी भी दी, लेकिन उसे नजरअंदाज कर दिया।
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अगर पुलिस के पास गए होते तो शायद यह घटना न होती। अगर परिवार के लोगों ने पहली बार ही कानून का सहारा लिया होता तो शायद आरोपी सलाखों के पीछे होते और बिटिया परिवार के बीच में होती। बेटी की मौत के बाद हर तरफ उसकी सोच और प्रतिक्रिया देने की बहादुरी की लोग चर्चा कर रहे हैं।
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संस्कार की कमी और नैतिकता का पतन बन रहा कारण
महिला पीजी कॉलेज बस्ती के समाज शास्त्री डॉ. रघुवर प्रसाद पांडये ने कहा कि समाज का नजरिया बदल गया है। कहीं कुछ गलत हो रहा हो तो पुलिस से शिकाय करनी चाहिए। शिकायत करने में बेटी की बदनामी नहीं होती, बल्कि आरोपियों को सबक मिल जाती। क्योंकि लोग जानते हैं कि शिकायत करना सही तरीका है। बदलते दौर में चाहिए कि बच्चों की बात को गंभीरता से लें। मौजूदा समय में परिवार पर अपनों का नियंत्रण खत्म हो रहा है। परिवार का नियंत्रण कमजोर होना, नैतिकता का पतन होना और संस्कार की कमी होना। यह सब हमें गलत कार्य की ओर से ले जा रहे हैं। ऐसे में जरूरी है कि बच्चों को संस्कार दें। डिजिटल के युग में लोग मोबाइल के करीब और अपनों से दूर जा रहे हैं। न तो वे रिश्ते को समझ रहे हैं और न ही लोकलाज का उनमें भय है। इसलिए वे दुष्कर्म, हत्या सहित कई घिनौने कार्य कर रहे हैं। ऐसे में संस्कार देने के साथ ही जरूरत भर के मोबाइल का उपयोग करने के लिए बच्चों को दें। उन्हें छोटे, बड़े और रिश्तों के बारे में जानकारी दें। उन पर हमेशा नजर बनाएं रखें और अगर गलत रास्ते पर जा रहे हैं तो उन्हें समझाएं। अपराध की शुरुआत में बिना भय के कानून का सहारा लें, क्योंकि उसमें सोच विचार का नतीजा है कि एक बेटी ने आत्महत्या कर ली। साथ ही अगर परिवार का कोई सदस्य परेशान है, चाहे वह महिला हो या लड़की व पुरुष हो। उसकी समस्या को सुनें। उसे समझाने का प्रयास करें। जिससे वह आत्महत्या जैसे घातक कदम न उठाए।
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