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Siddharthnagar News: मशरूम की खेती स्वरोजगार का बेहतर विकल्प
Fri, 09 Oct 2026 11:21 PM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
Updated Fri, 09 Oct 2026 11:21 PM IST
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कृषि विज्ञान केंद्र सोहना में पांच दिवसीय प्रशिक्षण संपन्न
उत्पादन, देखभाल, प्रसंस्करण और विपणन की दी गई जानकारी
भनवापुर। मशरूम की खेती युवाओं और किसानों के लिए स्वरोजगार का बेहतर माध्यम बन सकती है। कम जगह और अपेक्षाकृत कम लागत में शुरू होने वाले इस व्यवसाय से किसान अपनी आय बढ़ा सकते हैं। इसके लिए उत्पादन की वैज्ञानिक तकनीक, फसल की उचित देखभाल और बाजार की मांग की जानकारी जरूरी है। यह बातें कृषि विज्ञान केंद्र सोहना के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष डॉ. प्रदीप कुमार ने पांच दिवसीय मशरूम उत्पादन प्रशिक्षण के समापन अवसर पर कहीं।
उन्होंने कहा कि मशरूम उत्पादन के लिए बड़े खेत की आवश्यकता नहीं होती। लगभग 10×10 फीट के कमरे में भी इसकी खेती शुरू की जा सकती है। प्रशिक्षण के दौरान प्रतिभागियों को मशरूम की विभिन्न प्रजातियों, कंपोस्ट तैयार करने, बीज की बोआई, फसल की देखभाल, प्रसंस्करण और विपणन की तकनीकी जानकारी दी गई। विशेषज्ञों ने बटन, ऑयस्टर (ढिंगरी) और मिल्की मशरूम की विशेषताओं के बारे में बताया। साथ ही स्थानीय जलवायु और उपलब्ध संसाधनों के अनुसार उपयुक्त प्रजाति का चयन करने की सलाह दी।
वैज्ञानिक तरीके से उत्पादन करने पर जोर
इंजी. अशोक कुमार पांडेय ने कहा कि व्यावसायिक स्तर पर मशरूम उत्पादन शुरू करने से पहले कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि विश्वविद्यालय से प्रशिक्षण लेना लाभकारी होता है। डॉ. शेष नारायण सिंह ने उत्पादन कक्ष की तैयारी की जानकारी देते हुए बताया कि मशरूम उत्पादन के लिए ऐसा हवादार कमरा या शेड चुनना चाहिए, जहां सीधी धूप न आती हो। कमरे की सफाई और स्वच्छता का ध्यान रखना भी जरूरी है, ताकि फसल को रोगों और कीटों से बचाया जा सके।
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डॉ. प्रवीण कुमार मिश्रा ने प्रमाणित स्रोतों से मशरूम का बीज (स्पॉन) खरीदने की सलाह दी। मृदा वैज्ञानिक डॉ. प्रवेश कुमार ने लेयर विधि की जानकारी दी। पशुपालन वैज्ञानिक सुनील सिंह ने फसल की देखभाल, नमी बनाए रखने और कटाई की प्रक्रिया समझाई।
भूसे से तैयार होते हैं उत्पादन के बैग
बीज वैज्ञानिक प्रकाश सिंह ने ऑयस्टर मशरूम उत्पादन की तकनीक बताते हुए कहा कि गेहूं या धान के भूसे को उचित विधि से उपचारित करने के बाद अतिरिक्त पानी निकाल दिया जाता है। इसके बाद उसमें मशरूम का बीज मिलाकर पॉलिथीन बैग में भरा जाता है। बैग में हवा के आवागमन और अनुकूल नमी की व्यवस्था जरूरी है। कुछ सप्ताह में भूसे पर सफेद कवक जाल फैलने लगता है। अनुकूल परिस्थितियों में मशरूम विकसित होते हैं और अलग-अलग चरणों में उनकी कटाई की जाती है।
प्रशिक्षण के दौरान किसानों और किसान महिलाओं को मशरूम उत्पादन को आजीविका से जोड़ने, गुणवत्तापूर्ण उत्पाद तैयार करने और बाजार में बिक्री की संभावनाओं के बारे में भी जानकारी दी गई। इस अवसर पर शिवशंकर चौधरी, सुनीता, कमला देवी, मंजू, मुरारीलाल, सावित्री सहित कई किसान और किसान महिलाएं मौजूद रहीं।
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उत्पादन, देखभाल, प्रसंस्करण और विपणन की दी गई जानकारी
भनवापुर। मशरूम की खेती युवाओं और किसानों के लिए स्वरोजगार का बेहतर माध्यम बन सकती है। कम जगह और अपेक्षाकृत कम लागत में शुरू होने वाले इस व्यवसाय से किसान अपनी आय बढ़ा सकते हैं। इसके लिए उत्पादन की वैज्ञानिक तकनीक, फसल की उचित देखभाल और बाजार की मांग की जानकारी जरूरी है। यह बातें कृषि विज्ञान केंद्र सोहना के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष डॉ. प्रदीप कुमार ने पांच दिवसीय मशरूम उत्पादन प्रशिक्षण के समापन अवसर पर कहीं।
उन्होंने कहा कि मशरूम उत्पादन के लिए बड़े खेत की आवश्यकता नहीं होती। लगभग 10×10 फीट के कमरे में भी इसकी खेती शुरू की जा सकती है। प्रशिक्षण के दौरान प्रतिभागियों को मशरूम की विभिन्न प्रजातियों, कंपोस्ट तैयार करने, बीज की बोआई, फसल की देखभाल, प्रसंस्करण और विपणन की तकनीकी जानकारी दी गई। विशेषज्ञों ने बटन, ऑयस्टर (ढिंगरी) और मिल्की मशरूम की विशेषताओं के बारे में बताया। साथ ही स्थानीय जलवायु और उपलब्ध संसाधनों के अनुसार उपयुक्त प्रजाति का चयन करने की सलाह दी।
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वैज्ञानिक तरीके से उत्पादन करने पर जोर
इंजी. अशोक कुमार पांडेय ने कहा कि व्यावसायिक स्तर पर मशरूम उत्पादन शुरू करने से पहले कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि विश्वविद्यालय से प्रशिक्षण लेना लाभकारी होता है। डॉ. शेष नारायण सिंह ने उत्पादन कक्ष की तैयारी की जानकारी देते हुए बताया कि मशरूम उत्पादन के लिए ऐसा हवादार कमरा या शेड चुनना चाहिए, जहां सीधी धूप न आती हो। कमरे की सफाई और स्वच्छता का ध्यान रखना भी जरूरी है, ताकि फसल को रोगों और कीटों से बचाया जा सके।
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डॉ. प्रवीण कुमार मिश्रा ने प्रमाणित स्रोतों से मशरूम का बीज (स्पॉन) खरीदने की सलाह दी। मृदा वैज्ञानिक डॉ. प्रवेश कुमार ने लेयर विधि की जानकारी दी। पशुपालन वैज्ञानिक सुनील सिंह ने फसल की देखभाल, नमी बनाए रखने और कटाई की प्रक्रिया समझाई।
भूसे से तैयार होते हैं उत्पादन के बैग
बीज वैज्ञानिक प्रकाश सिंह ने ऑयस्टर मशरूम उत्पादन की तकनीक बताते हुए कहा कि गेहूं या धान के भूसे को उचित विधि से उपचारित करने के बाद अतिरिक्त पानी निकाल दिया जाता है। इसके बाद उसमें मशरूम का बीज मिलाकर पॉलिथीन बैग में भरा जाता है। बैग में हवा के आवागमन और अनुकूल नमी की व्यवस्था जरूरी है। कुछ सप्ताह में भूसे पर सफेद कवक जाल फैलने लगता है। अनुकूल परिस्थितियों में मशरूम विकसित होते हैं और अलग-अलग चरणों में उनकी कटाई की जाती है।
प्रशिक्षण के दौरान किसानों और किसान महिलाओं को मशरूम उत्पादन को आजीविका से जोड़ने, गुणवत्तापूर्ण उत्पाद तैयार करने और बाजार में बिक्री की संभावनाओं के बारे में भी जानकारी दी गई। इस अवसर पर शिवशंकर चौधरी, सुनीता, कमला देवी, मंजू, मुरारीलाल, सावित्री सहित कई किसान और किसान महिलाएं मौजूद रहीं।