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कालानमक : कभी ऐतिहासिक पहचान... अब बन चुका जिले का ब्रांड

Thu, 06 Nov 2025 11:12 PM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर Updated Thu, 06 Nov 2025 11:12 PM IST
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Siddharthnagar News : Kalanmak : Once a historical identity... now becomes the brand of Chuka district
बीएसए ग्राउड पर आयोजित काला नमक बुद्धा राइस द्वितीय क्रेता विक्रेता सम्मेलन कार्यक्रम के लिए लग
सिद्धार्थनगर। ऐतिहासिक पहचान समेटे एक जिला एक उत्पाद (ओडीओपी) में शामिल कालानमक चावल अब जिले का ब्रांड बन चुका है। अगर गैर जनपद या प्रांत के अपने परिचितों को कुछ अच्छा तोहफा देने की बात आती है तो सबसे पहले कालानमक चावल ही देते हैं।
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वर्तमान में इसके उत्पादन और निर्यात को बढ़ावा देने के लिए जिला प्रशासन की ओर से आठ व नौ नवंबर को सम्मेलन आयोजन की तैयारी है। कालानमक की खेती करने वाले किसानों, व्यापारियों व निर्यातकों की मानें तो कालानमक चावल (बुद्धा राइस) क्रेता-विक्रेता सम्मेलन से एक बड़ा बाजार मिल रहा है।
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कहते हैं कि बोधगया में ज्ञान प्राप्ति के बाद महात्मा बुद्ध शाक्य गणराज्य (कपिलवस्तु) लौट रहे थे। वह रास्ते में जिले के मौजूदा बजहा गांव में रुके, जहां महात्मा बुद्ध ने गांव के कुछ किसानों को अपनी झोली से मुट्ठी-मुट्ठी भर धान दिया। कहा, इसे खेतों में लगाएं, इसकी खुशबू हमेशा हमारी याद दिलाती रहेगी। इसके बाद से यहां काला नमक धान की खेती सिलसिला शुरू हुआ और काला नमक चावल को बुद्ध का महाप्रसाद नाम भी मिला।
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आज यह काला नमक चावल विभिन्न देशों में सिद्धार्थनगर की मिट्टी की खुशबू बिखेर रहा है। बौद्धकालीन काला नमक चावल और बुद्ध के इस संदेश का जिक्र चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अपने यात्रा वृतांत में भी किया है। सेहत के लिहाज से बेहद फायदेमंद काला नमक चावल की मांग विश्व बाजार में तेजी से बढ़ रही है। इसके साथ ही काला नमक चावल महात्मा बुद्ध की क्रीड़ास्थली कपिलवस्तु के बाद सिद्धार्थनगर जिले को विश्व पटल पर एक नई पहचान दे रहा है।
2017 में हुआ आडीओपी, विदेशों तक पहुंच गई खुशबू : तीन दशक पहले तक कालानमक का जिले में अच्छा उत्पादन होता था। धीरे-धीरे सिंचाई की व्यवस्था धराशायी होती गई और साल 2017 तक बुवाई का रकबा 25 सौ से 28 सौ हेक्टेयर के बीच सिमट कर रह गया था।
2017 में सिद्धार्थनगर आए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कालानमक चावल की सुगंध देश-विदेश तक पहुंचाने के उद्देश्य से से ओडीओपी में शामिल किए जाने की घोषणा की। मुख्यमंत्री की इस घोषणा ने किसानों को उत्साह दिया और मौजूदा समय में करीब 15 हजार हेक्टेयर में कालानमक धान की खेती हो रही है। इसके साथ ही ओडीओपी में शामिल कालानमक चावल तमाम देशों की रसोई में अपनी खुशबू बिखेर रहा है।
अंग्रेजों ने भी दिया था काला नमक धान की खेती को बढ़ावा : ब्रिटिश हुकूमत के दौरान लार्ड विलियम पेपे और बर्ड ने जिले में तत्कालीन मेटुका (अब बर्डपुर) में हो रही नील की खेती को खत्म कराकर कालानमक धान की खेती शुरू कराई थी।

काला नमक धान को सिंचाई की ज्यादा जरूरत पड़ती है। भरपूर पानी के लिए मरथी, मझौली, बजहा, बटुआ आदि सागरों का निर्माण कराया और पूरे क्षेत्र में नहरों का जाल बिछाया गया था। इसी कारण जिले के बर्डपुर क्षेत्र को कालानमक की खेती के लिए सबसे मुफीद माना जाता रहा है।
वर्तमान में सिद्धार्थनगर और आसपास के 11 जिलों में इसकी खेती हो रही है, जिससे सीधे तौर पर 10 हजार से अधिक किसान लाभान्वित हो रहे हैं।
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