{"_id":"5f43c7338ebc3e3cf326f0c9","slug":"shahidne-karbala-siddharthnagar-news-gkp3628656169","type":"story","status":"publish","title_hn":"शहीदाने कर्बला की याद में मजलिस ए मातम","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
शहीदाने कर्बला की याद में मजलिस ए मातम
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
शहीदाने कर्बला की याद में मजलिस-ए-मातम
हल्लौर कस्बे में मोहर्रम पर मजलिस मातम हुआ
अमर उजाला ब्यूरो
हल्लौर। कर्बला में 72 साथियों के साथ शहादत देने वाले हजरत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की याद में मनाए जाने वाले माह-ए-मुहर्रम की चार तारीख को हल्लौर में कई स्थानों पर मजलिस मातम कर लोगों ने नजराना-ए-अकीदत पेश किया। हल्लौर के अली हसन स्थित इमामबाड़ा में मजलिसों का दौर चल रहा है। सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए मजलिस में मौलाना जमाल हैदर ने कर्बला के शहीदों की शान पेश की। उन्होंने इमामबाड़ा बाबुल बाबा में भी मजलिस पढ़ी। मौलाना जमाल हैदर ने खिताब करते हुए कहा कि इमाम हुसैन अलै. की शहादत इंसानियत का पैगाम देती है। इस्लाम में किसी भूखे की भूख मिटाने से पहले उसका धर्म को नहीं पूछा जाता। इस्लाम में किसी पर जुल्म करने वाला मुसलमान नहीं हो सकता। इस मोहर्रम के माह से 1380 साल पहले पैगंबर हजरत मोहम्मद सल्ललाहुअलैहि वसल्लम के नवासे हजरत इमाम हुसैन अलै. को भूखा, प्यासा, बेदर्दी के साथ कर्बला में शहीद कर दिया गया। जिसकी याद में हर साल सारी दुनिया में गम मनाया जाता है। मजलिस के पहले हैदरे कर्रार ने मरसिया पढ़ा। मजलिस में अरशी रिजवी, वीरू, आफताब, कैफी, ताकीब, लाल बाबू, राजू और मंटू आदि मौजूद रहे।
विज्ञापन
हल्लौर कस्बे में मोहर्रम पर मजलिस मातम हुआ
अमर उजाला ब्यूरो
हल्लौर। कर्बला में 72 साथियों के साथ शहादत देने वाले हजरत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की याद में मनाए जाने वाले माह-ए-मुहर्रम की चार तारीख को हल्लौर में कई स्थानों पर मजलिस मातम कर लोगों ने नजराना-ए-अकीदत पेश किया। हल्लौर के अली हसन स्थित इमामबाड़ा में मजलिसों का दौर चल रहा है। सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए मजलिस में मौलाना जमाल हैदर ने कर्बला के शहीदों की शान पेश की। उन्होंने इमामबाड़ा बाबुल बाबा में भी मजलिस पढ़ी। मौलाना जमाल हैदर ने खिताब करते हुए कहा कि इमाम हुसैन अलै. की शहादत इंसानियत का पैगाम देती है। इस्लाम में किसी भूखे की भूख मिटाने से पहले उसका धर्म को नहीं पूछा जाता। इस्लाम में किसी पर जुल्म करने वाला मुसलमान नहीं हो सकता। इस मोहर्रम के माह से 1380 साल पहले पैगंबर हजरत मोहम्मद सल्ललाहुअलैहि वसल्लम के नवासे हजरत इमाम हुसैन अलै. को भूखा, प्यासा, बेदर्दी के साथ कर्बला में शहीद कर दिया गया। जिसकी याद में हर साल सारी दुनिया में गम मनाया जाता है। मजलिस के पहले हैदरे कर्रार ने मरसिया पढ़ा। मजलिस में अरशी रिजवी, वीरू, आफताब, कैफी, ताकीब, लाल बाबू, राजू और मंटू आदि मौजूद रहे।