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संसाधन नाकाफी, फेल हो जाएगा जिला अस्पताल
अमर उजाला ब्यूरो/सिद्धार्थनगर
Updated Sat, 19 Dec 2015 11:45 PM IST
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जिले के सबसे बड़े अस्पताल की परीक्षा होने जा रही है। इसमें फर्स्ट आने पर 50 लाख रुपये मिलेंगे। अगर अस्पताल पास भी हो जाए तो सांत्वना के रूप में तीन लाख रुपये पक्का है।
मगर यह तभी होगा, जब अस्पताल की व्यवस्थाएं बेहतर होंगी।मौजूदा हाल को देखें तो यहां का जिला अस्पताल तय मानकों पर कहीं से भी खरा नहीं उतर रहा। न तो साफ-सफाई के बेहतर इंतजाम हैं और न ही अन्य सुविधाओं का। सबसे बड़ी चुनौती मानव संसाधन की है। डॉक्टर, कर्मचारी का टोटा है। स्वीकृत पद तो दूर की बात, सर्जन-फिजिशियन जैसे जरूरी डॉक्टर भी नहीं है।
राज्य स्तरीय परीक्षा में अब चंद दिन शेष रह गए हैं। ऐसे में जिला अस्पताल इन मानकों पर खरा उतरते हुए पुरस्कार की दौड़ में खुद को कैसे शामिल कर पाएगा, सबके लिए चुनौती बनी हुई है। सिर्फ कुर्सी की राजनीति करने वाले जनप्रतिनिधियों को तो इससे कोई इत्तेफाक है नहीं, प्रतिष्ठा आम लोगों की दांव पर है। जरा सोचिए जिस धरा पर दया-करुणा के प्रणेता भगवान बुद्ध का बसेरा था, वहां का सबसे बड़ा अस्पताल मरीजों की सेवा के तय शर्तों को पूरा कर पाने में विफल होगा तो देश-प्रदेश में जिले की क्या छवि बनेगी।
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मगर यह तभी होगा, जब अस्पताल की व्यवस्थाएं बेहतर होंगी।मौजूदा हाल को देखें तो यहां का जिला अस्पताल तय मानकों पर कहीं से भी खरा नहीं उतर रहा। न तो साफ-सफाई के बेहतर इंतजाम हैं और न ही अन्य सुविधाओं का। सबसे बड़ी चुनौती मानव संसाधन की है। डॉक्टर, कर्मचारी का टोटा है। स्वीकृत पद तो दूर की बात, सर्जन-फिजिशियन जैसे जरूरी डॉक्टर भी नहीं है।
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राज्य स्तरीय परीक्षा में अब चंद दिन शेष रह गए हैं। ऐसे में जिला अस्पताल इन मानकों पर खरा उतरते हुए पुरस्कार की दौड़ में खुद को कैसे शामिल कर पाएगा, सबके लिए चुनौती बनी हुई है। सिर्फ कुर्सी की राजनीति करने वाले जनप्रतिनिधियों को तो इससे कोई इत्तेफाक है नहीं, प्रतिष्ठा आम लोगों की दांव पर है। जरा सोचिए जिस धरा पर दया-करुणा के प्रणेता भगवान बुद्ध का बसेरा था, वहां का सबसे बड़ा अस्पताल मरीजों की सेवा के तय शर्तों को पूरा कर पाने में विफल होगा तो देश-प्रदेश में जिले की क्या छवि बनेगी।
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