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भारत जैसा दुनिया में कोई देश नहीं
ब्यूरो/अमर उजाला सिद्धार्थनगर
Updated Thu, 31 Mar 2016 10:58 PM IST
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शोहरतगढ़ के राम कथा में झूमते श्रद्धालु।
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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भारत को छोड़कर विश्व में कोई भी ऐसा देश का नाम नहीं है, जिसे लोग माता कह कर पुकार सके। परंपराओं, संस्कृति व संतों के कारण भारत देश की कीर्तियां आज भी दुनिया में विद्यमान है। हमारे देश के लोगों को गर्व होना चाहिए कि हम भारतीय हैं और अपने देश को भारत माता कह कर पुकारते है।
मां ही ऐसा स्वरूप है, जिसमें सभी समाहित हो जाते हैं।
यह उद्गार कथा वाचक श्रीकौशलजी महाराज ने कही। वीरेंद्र ग्रामीण स्टेडियम में संगीतमय भव्य रामकथा के पांचवें दिन मां सीता व भगवान राम के स्वयंवर पाठ का वर्णन करते हुए संत श्रीकौशलजी महाराज ने कहा कि नारी के आंखो में करुणा, वाणी में मधुरता, कर्मठता, सौम्यता, स्थिरता व लज्जा के वशीभूत होनी चाहिए।
जिसे देख लोग नमन करने को विवश हो जाएं। हमारे देश में नारी की पूजा होती है। श्रद्धालुओं का आह्वान करते हुए कहा कि अपने देश को बनाए रखो। यूरोपीय संस्कृति को भारत में प्रवेश किसी भी कीमत न होने दो। हमारा देश संत, ऋषि मुनियों का देश है।
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संत कौशलजी ने कहा कि एक पुरुष के बिगडने से एक व्यक्ति बिगड़ता है, जबकि नारी के बिगडने से परिवार, समाज व देश कलंकित हो जाता है। इसलिए नारी को अपने स्वाभिमान व आचरण को सहेज कर रखना चाहिए।
मंच पर बैठे संत कौशल जी ने योग गुरु रामदेव बाबा को नमन करते हुए कहा कि दुनिया को योग के जरिए बाबा रामदेव ने जो हंसाने का काम किया है। वह लोगों के दिर्घायु व मानसिक शांति का एक दवा है। तीन कार्य के बिना मनुष्य का मिलाप भगवान से नहीं हो सकता। इसलिए मनुष्य को संत के शरण में रहना चाहिए।
सत्संग में जाना चाहिए।
संत जब अपने भक्त को याद कर लेता है। तब भक्त की मुलाकात ईश्वर से हो जाती है। जीवन के चार स्वरूपों का वणज्न करते हुए संत श्री कौशलजी ने कहा कि बाल्यावस्था, किशोरावस्था, युवावस्था, वृद्ध अवस्था चार चरण मनुष्य आयुवार पहुंचता है। सबकी अलग-अलग रचनाएं है।
श्रद्धाभाव की भूख, प्यास बढनी चाहिए। इससे ही परमात्मा से मिलने का मौका मिलता है। भगवान भक्त से मिलने की आशा करें वह भाव की पराकाष्ठा है और जब भक्त करें तो भाव। संत कौशलजी ने कहा कि नेत्र ही पाप व पुण्य का प्रवेश द्वार है।
इसलिए अपने नेत्रों को वश में रखना चाहिए। सच्ची भक्ति विनम्रता, सभ्यता में इतनी ताकत होती है कि पत्थर भी मुस्कुरा देते हैं। उन्होंने सीता स्वयंवर का विस्तार से वर्णन किया। राम-सीता स्वयंवर संपन्न होते ही दीर्घा में बैठे हजारों श्रद्धालु भक्ति भाव में लीन होकर नाचने-गाने लगे।
मुख्य यजमान राजेंद्र, झब्बू, कौशलेंद्र रहे। इस दौरान भाजपा के पूवज् प्रदेश अध्यक्ष सूर्य प्रताप शाही, रानी शाही, युवा भाजपा नेता गोविंद माधव, संतोष पोद्दार, तारकेश्वर, पूनम परसरामका, सीमा परसरामका, गीता परसरामका, अनीता परसरामका, डॉ.उमा सराफ, रुपम अग्रवाल, राशिका पोद्दार, चारू पोद्दार, शिल्पी अग्रवाल, वंशिका पोद्दार, प्रधान श्याम सुंदर चौधरी, डॉ.उमेश चंद शुक्ल, लालजी त्रिपाठी, डॉ.आरपी सिंह, डॉ.नलिनीकांत मणि त्रिपाठी, परमात्मा पांडेय, सच्चिदानंद चौबे, कन्हैया पासवान, विजय परसरामका, सतीश मित्तल, संतोष बोरा, पार्वती पोद्दार, ऊषा बोरा, राधारमण त्रिपाठी, अनीता, सुमन आदि मौजूद रहे।
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मां ही ऐसा स्वरूप है, जिसमें सभी समाहित हो जाते हैं।
यह उद्गार कथा वाचक श्रीकौशलजी महाराज ने कही। वीरेंद्र ग्रामीण स्टेडियम में संगीतमय भव्य रामकथा के पांचवें दिन मां सीता व भगवान राम के स्वयंवर पाठ का वर्णन करते हुए संत श्रीकौशलजी महाराज ने कहा कि नारी के आंखो में करुणा, वाणी में मधुरता, कर्मठता, सौम्यता, स्थिरता व लज्जा के वशीभूत होनी चाहिए।
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जिसे देख लोग नमन करने को विवश हो जाएं। हमारे देश में नारी की पूजा होती है। श्रद्धालुओं का आह्वान करते हुए कहा कि अपने देश को बनाए रखो। यूरोपीय संस्कृति को भारत में प्रवेश किसी भी कीमत न होने दो। हमारा देश संत, ऋषि मुनियों का देश है।
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संत कौशलजी ने कहा कि एक पुरुष के बिगडने से एक व्यक्ति बिगड़ता है, जबकि नारी के बिगडने से परिवार, समाज व देश कलंकित हो जाता है। इसलिए नारी को अपने स्वाभिमान व आचरण को सहेज कर रखना चाहिए।
मंच पर बैठे संत कौशल जी ने योग गुरु रामदेव बाबा को नमन करते हुए कहा कि दुनिया को योग के जरिए बाबा रामदेव ने जो हंसाने का काम किया है। वह लोगों के दिर्घायु व मानसिक शांति का एक दवा है। तीन कार्य के बिना मनुष्य का मिलाप भगवान से नहीं हो सकता। इसलिए मनुष्य को संत के शरण में रहना चाहिए।
सत्संग में जाना चाहिए।
संत जब अपने भक्त को याद कर लेता है। तब भक्त की मुलाकात ईश्वर से हो जाती है। जीवन के चार स्वरूपों का वणज्न करते हुए संत श्री कौशलजी ने कहा कि बाल्यावस्था, किशोरावस्था, युवावस्था, वृद्ध अवस्था चार चरण मनुष्य आयुवार पहुंचता है। सबकी अलग-अलग रचनाएं है।
श्रद्धाभाव की भूख, प्यास बढनी चाहिए। इससे ही परमात्मा से मिलने का मौका मिलता है। भगवान भक्त से मिलने की आशा करें वह भाव की पराकाष्ठा है और जब भक्त करें तो भाव। संत कौशलजी ने कहा कि नेत्र ही पाप व पुण्य का प्रवेश द्वार है।
इसलिए अपने नेत्रों को वश में रखना चाहिए। सच्ची भक्ति विनम्रता, सभ्यता में इतनी ताकत होती है कि पत्थर भी मुस्कुरा देते हैं। उन्होंने सीता स्वयंवर का विस्तार से वर्णन किया। राम-सीता स्वयंवर संपन्न होते ही दीर्घा में बैठे हजारों श्रद्धालु भक्ति भाव में लीन होकर नाचने-गाने लगे।
मुख्य यजमान राजेंद्र, झब्बू, कौशलेंद्र रहे। इस दौरान भाजपा के पूवज् प्रदेश अध्यक्ष सूर्य प्रताप शाही, रानी शाही, युवा भाजपा नेता गोविंद माधव, संतोष पोद्दार, तारकेश्वर, पूनम परसरामका, सीमा परसरामका, गीता परसरामका, अनीता परसरामका, डॉ.उमा सराफ, रुपम अग्रवाल, राशिका पोद्दार, चारू पोद्दार, शिल्पी अग्रवाल, वंशिका पोद्दार, प्रधान श्याम सुंदर चौधरी, डॉ.उमेश चंद शुक्ल, लालजी त्रिपाठी, डॉ.आरपी सिंह, डॉ.नलिनीकांत मणि त्रिपाठी, परमात्मा पांडेय, सच्चिदानंद चौबे, कन्हैया पासवान, विजय परसरामका, सतीश मित्तल, संतोष बोरा, पार्वती पोद्दार, ऊषा बोरा, राधारमण त्रिपाठी, अनीता, सुमन आदि मौजूद रहे।