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हल्लौर गांव में गूंज उठी सदाएं
ब्यूरो/अमर उजाला सिद्धार्थनगर
Updated Mon, 27 Jun 2016 10:36 PM IST
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अली के शहादत दिवस पर हल्लौर में निकाले गए अलम ताबूत के जुलूस में शामिल अकीदतमंद।
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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डुमरियागंज। शिया मुसलमानों के पहले इमाम हजरत अली के यौमे शहादत के मौके पर सोमवार को शिया बाहुल्य कस्बा हल्लौर में मर्सिया मजलिस का आयोजन किया गया। बारिश के बावजूद अकीदतमंदों ने अलम ताबूत का जुलूस निकालकर पूरे जोश-खरोश से नौहा मातम किया। शहादत दिवस को लेकर मर्सिया मजलिस नौहा मातम का सिलसिला शुक्रवार की रात से ही शुरू हो गया था, जो सोमवार की देर शाम तक चलता रहा। पूरा कस्बा शोक और गम में डूबा रहा हर तरफ हाय अली की सदाएं बुलंद होती रहीं।
हजरत अली के यौमे शहादत 21 रमजान की सुबह 5 बजे जामा मस्जिद हल्लौर में मर्सिया मजलिस हुई। मर्सियाख्वानी हैदरे कर्रार व उनके हमनवा ने की। मजलिस में मौलाना वसीम रजा जैदी ने कहा कि दुनिया में पहला आतंकवादी हमला कूफा शहर (इराक) में एक नमाजी पर मस्जिद में नमाज पढ़ने के दौरान आज से 1355 साल पहले 19 रमजान 40 हिजरी (27 जनवरी सन 661) को हुआ था।
वह नमाजी कोई आम आदमी नहीं बल्कि प्यारे नबी हजरत मोहम्मद मुस्तफा के दामाद व शियों के पहले इमाम हजरत अली थे। मौला अली की दो दिन बाद 21वीं रमजान की सुबह शहादत हो गई। गरीबों और मजलूमों के मसीहा व इस्लाम धर्म का रक्षक मौला अली दुनिया से रुखसत हो गए। उन्होंने कहा कि हजरत अली की याद में हर साल रमजान की 19, 20 व 21 रमजान को उनकी शहादत मनाई जाती है।
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हजरत अली की शहादत का जिक्र सुनकर मजलिस में मौजूद अकीदतमंद रोने लगे। मजलिस के बाद अलम ताबूत का जुलूस निकाला गया, जो इमामबाड़ा हुसैनिया बाबुल, अली असगर के रौजे व जनाबे सकीना के रौजे से होता हुआ इमामबाड़ा हुसैनिया अली हसन पहुंचा। बाद में जुलूस हल्लौर के मुख्य चौराहे पर पहुंचा, जहां हजरत अली के शहादत दिवस पर तकरीर का आयोजन हुआ।
यहां मौलाना वसीम रजा जैदी, जमाल हैदर, अजीम हैदर, फरीद हैदर, जानशीन अहमद, नफीस अहमद, हबीबुल हसन आदि ने हजरत अली की शहादत को बयां किया। इस दौरान मौलाना वसीम रजा जैदी, सबीह हैदर, काजिम मेंहदी, डॉ. नायाब रिजवी, अजीम हैदर, मो. इमरान, शमसाद, नौशाद, अफरोज, अकबर मेंहदी, ताकीब रिजवी, डॉ. खुर्शीद रिजवी, इंतजार कदर, शम्मू, मजहर अब्बास, कसीम रिजवी, नौशा, अली कदर, अफरोज, पिंकू, यूसुफ, वजीर हैदर, शमशुल, तन्नू, नन्हें आदि अकीदतमंद मौजूद रहे।
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हजरत अली के यौमे शहादत 21 रमजान की सुबह 5 बजे जामा मस्जिद हल्लौर में मर्सिया मजलिस हुई। मर्सियाख्वानी हैदरे कर्रार व उनके हमनवा ने की। मजलिस में मौलाना वसीम रजा जैदी ने कहा कि दुनिया में पहला आतंकवादी हमला कूफा शहर (इराक) में एक नमाजी पर मस्जिद में नमाज पढ़ने के दौरान आज से 1355 साल पहले 19 रमजान 40 हिजरी (27 जनवरी सन 661) को हुआ था।
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वह नमाजी कोई आम आदमी नहीं बल्कि प्यारे नबी हजरत मोहम्मद मुस्तफा के दामाद व शियों के पहले इमाम हजरत अली थे। मौला अली की दो दिन बाद 21वीं रमजान की सुबह शहादत हो गई। गरीबों और मजलूमों के मसीहा व इस्लाम धर्म का रक्षक मौला अली दुनिया से रुखसत हो गए। उन्होंने कहा कि हजरत अली की याद में हर साल रमजान की 19, 20 व 21 रमजान को उनकी शहादत मनाई जाती है।
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हजरत अली की शहादत का जिक्र सुनकर मजलिस में मौजूद अकीदतमंद रोने लगे। मजलिस के बाद अलम ताबूत का जुलूस निकाला गया, जो इमामबाड़ा हुसैनिया बाबुल, अली असगर के रौजे व जनाबे सकीना के रौजे से होता हुआ इमामबाड़ा हुसैनिया अली हसन पहुंचा। बाद में जुलूस हल्लौर के मुख्य चौराहे पर पहुंचा, जहां हजरत अली के शहादत दिवस पर तकरीर का आयोजन हुआ।
यहां मौलाना वसीम रजा जैदी, जमाल हैदर, अजीम हैदर, फरीद हैदर, जानशीन अहमद, नफीस अहमद, हबीबुल हसन आदि ने हजरत अली की शहादत को बयां किया। इस दौरान मौलाना वसीम रजा जैदी, सबीह हैदर, काजिम मेंहदी, डॉ. नायाब रिजवी, अजीम हैदर, मो. इमरान, शमसाद, नौशाद, अफरोज, अकबर मेंहदी, ताकीब रिजवी, डॉ. खुर्शीद रिजवी, इंतजार कदर, शम्मू, मजहर अब्बास, कसीम रिजवी, नौशा, अली कदर, अफरोज, पिंकू, यूसुफ, वजीर हैदर, शमशुल, तन्नू, नन्हें आदि अकीदतमंद मौजूद रहे।