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Siddharthnagar News: बच्चों की रीढ़ से द्रव्य निकालने में कांपते हैं डॉक्टरों के हाथ
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- माधव प्रसाद त्रिपाठी मेडिकल कॉलेज में जेई, एईएस के लिए प्रशिक्षित दो चिकित्सक के स्थानांतरण के बाद बेपटरी हुई व्यवस्था
- रीढ़ से पानी निकालकर जांच के बाद पुष्ट होती है जेई, एईएस का मरीज है या नहीं
- दवा से ठीक न होने पर अब कर दे रहे रेफर
संवाद न्यूज एजेंसी
सिद्धार्थनगर। दिमागी बुखार सहित अन्य संक्रामक बीमारियों पर काबू पाने के लिए दस्तक सहित सरकार की ओर से कई अभियान चलाया जा रहा है, जिससे बच्चों को इन बीमारियों से बचाया जा सके। स्थिति यह है कि माधव प्रसाद त्रिपाठी मेडिकल कॉलेज में भर्ती होने वाले जेई, एईएस के संदिग्ध मरीजों की जांच ही नहीं हो पा रही है। कारण जेई, एईएस बीमारी से निपटने के लिए प्रशिक्षित रहे दो बालरोग विशेषज्ञ का स्थानांतरण हो चुका है। वहीं मरीज के रीढ़ से पानी निकालकर जांच के लिए भेजते थे और बीमारी होने की रिपोर्ट मिलती थी। अब कोई जांच करने के लिए आगे नहीं आ पा रहा है। बच्चों की रीढ़ से द्रव्य निकालने में उनके हाथ कांप जा रहे हैं। इसलिए मरीजों को देखकर केवल दवा देते हैं। जैसे ही हालत बिगड़ती है, रेफर कर देते हैं। अगर यही हाल रहा तो अक्तूबर जेई, एईएस का मुख्य समय माना जाता है, जिसमें बड़ी दिक्क्त होती है।
जनपद नेपाल बॉर्डर से सटा होने के कारण हर वर्ष बारिश के सीजन में जलभराव और अन्य कारणों से जनजनित बीमारी फैलती है। इसमें दिमागी बुखार जेई, एईएस प्रमुख है, जिसमें बच्चों को कई दिनों तक बुखार के साथ झटका आता है। इसके अलावा अन्य दिक्कतें होती हैं। बीमारी की सही जानकारी के लिए बीमार बच्चे के रीढ़ से पानी निकालकर जांच के लिए भेजा जाता है। पिछले 9 दिन के आंकड़ों पर गौर करें तो माधव प्रसाद त्रिपाठी मेडिकल पीआईसीयू वार्ड में 72 मरीज भर्ती हो चुके हैं। स्वास्थ्य विभाग से जुड़े लोगों के मुताबिक बच्चों की रीढ़ की हड्डी से पानी निकालकर जेई, एईएस की जांच नहीं हो पा रही है। इसके विशेषज्ञ रहे डॉ. शैलेंद्र कुमार और डॉ. संजय चौधरी के स्थानांतरण के बाद जांच करने वाला कोई विशेषज्ञ नहीं है। ऐसे में इलाज से मरीजों को ठीक करने का प्रयास करते हैं। ठीक होने पर तो उन्हें घर भेज दिया जाता है। अगर स्थिति बिगड़ी है तो गोरखपुर मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिया जा रहा है। अगर यहां जांच होती तो बच्चों को रेफर नहीं होना पड़ता। ऐसे में बच्चों के साथ ही उनके परिजनों को ले जाने में दिक्कत होती है। पर जिम्मेदार इससे बेखबर हैं। इस संबंध में प्राचार्य डॉ. एके झा ने बताया कि हमें ऐसी जानकारी नहीं है कि संदिग्ध मरीजों के रीढ़ से पानी निकालकर जांच नहीं हो रहा है। क्योंकि हर चिकित्सक प्रशिक्षित होता है। क्यों जांच नहीं कर रहें इसके बारे में पूछेंगे।
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झटके के साथ बुखार वाले रोगियों की संख्या बढ़ी
मौजूदा समय में झटके साथ बुखार के रोगियों के संख्या बढ़ गई है। 15 बेड के पीआईसीयू वार्ड में किसी-किसी दिन 20 मरीज हो जा रहे हैं। ऐसे में जो छोटे बच्चे हैं, उन्हें एक बेड पर दो लोगों को कर दिया जा रहा है। सभी बच्चे झटके के साथ बुखार से ग्रसित होकर आ रहे हैं।
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- रीढ़ से पानी निकालकर जांच के बाद पुष्ट होती है जेई, एईएस का मरीज है या नहीं
- दवा से ठीक न होने पर अब कर दे रहे रेफर
संवाद न्यूज एजेंसी
सिद्धार्थनगर। दिमागी बुखार सहित अन्य संक्रामक बीमारियों पर काबू पाने के लिए दस्तक सहित सरकार की ओर से कई अभियान चलाया जा रहा है, जिससे बच्चों को इन बीमारियों से बचाया जा सके। स्थिति यह है कि माधव प्रसाद त्रिपाठी मेडिकल कॉलेज में भर्ती होने वाले जेई, एईएस के संदिग्ध मरीजों की जांच ही नहीं हो पा रही है। कारण जेई, एईएस बीमारी से निपटने के लिए प्रशिक्षित रहे दो बालरोग विशेषज्ञ का स्थानांतरण हो चुका है। वहीं मरीज के रीढ़ से पानी निकालकर जांच के लिए भेजते थे और बीमारी होने की रिपोर्ट मिलती थी। अब कोई जांच करने के लिए आगे नहीं आ पा रहा है। बच्चों की रीढ़ से द्रव्य निकालने में उनके हाथ कांप जा रहे हैं। इसलिए मरीजों को देखकर केवल दवा देते हैं। जैसे ही हालत बिगड़ती है, रेफर कर देते हैं। अगर यही हाल रहा तो अक्तूबर जेई, एईएस का मुख्य समय माना जाता है, जिसमें बड़ी दिक्क्त होती है।
जनपद नेपाल बॉर्डर से सटा होने के कारण हर वर्ष बारिश के सीजन में जलभराव और अन्य कारणों से जनजनित बीमारी फैलती है। इसमें दिमागी बुखार जेई, एईएस प्रमुख है, जिसमें बच्चों को कई दिनों तक बुखार के साथ झटका आता है। इसके अलावा अन्य दिक्कतें होती हैं। बीमारी की सही जानकारी के लिए बीमार बच्चे के रीढ़ से पानी निकालकर जांच के लिए भेजा जाता है। पिछले 9 दिन के आंकड़ों पर गौर करें तो माधव प्रसाद त्रिपाठी मेडिकल पीआईसीयू वार्ड में 72 मरीज भर्ती हो चुके हैं। स्वास्थ्य विभाग से जुड़े लोगों के मुताबिक बच्चों की रीढ़ की हड्डी से पानी निकालकर जेई, एईएस की जांच नहीं हो पा रही है। इसके विशेषज्ञ रहे डॉ. शैलेंद्र कुमार और डॉ. संजय चौधरी के स्थानांतरण के बाद जांच करने वाला कोई विशेषज्ञ नहीं है। ऐसे में इलाज से मरीजों को ठीक करने का प्रयास करते हैं। ठीक होने पर तो उन्हें घर भेज दिया जाता है। अगर स्थिति बिगड़ी है तो गोरखपुर मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिया जा रहा है। अगर यहां जांच होती तो बच्चों को रेफर नहीं होना पड़ता। ऐसे में बच्चों के साथ ही उनके परिजनों को ले जाने में दिक्कत होती है। पर जिम्मेदार इससे बेखबर हैं। इस संबंध में प्राचार्य डॉ. एके झा ने बताया कि हमें ऐसी जानकारी नहीं है कि संदिग्ध मरीजों के रीढ़ से पानी निकालकर जांच नहीं हो रहा है। क्योंकि हर चिकित्सक प्रशिक्षित होता है। क्यों जांच नहीं कर रहें इसके बारे में पूछेंगे।
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झटके के साथ बुखार वाले रोगियों की संख्या बढ़ी
मौजूदा समय में झटके साथ बुखार के रोगियों के संख्या बढ़ गई है। 15 बेड के पीआईसीयू वार्ड में किसी-किसी दिन 20 मरीज हो जा रहे हैं। ऐसे में जो छोटे बच्चे हैं, उन्हें एक बेड पर दो लोगों को कर दिया जा रहा है। सभी बच्चे झटके के साथ बुखार से ग्रसित होकर आ रहे हैं।
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