चार दिन में ही सूरज को भूला प्रशासन

Siddhartha nagar Updated Fri, 24 Jan 2014 05:45 AM IST
d आशुतोष मिश्र
सिद्धार्थनगर। जोगिया ब्लॉक के हाटा खास गांव में सात जिंदगियों को बचाते हुए झुलस कर सूरज की मौत हो गई। लेकिन उसकी बहादुरी पर स्थानीय प्रशासन ने ही सवाल खड़े कर दिए हैं। जनप्रतिनिधियों और सामाजिक कार्यकर्ता एक ओर जहां जोर-शोर से सूरज की बहादुरी का बखान करते हुए उसे वीरता पुरस्कार दिलाने की मांग कर रहे हैं, वहीं स्थानीय प्रशासन कह रहा है कि आखिर उसने कौन सा बहादुरी का काम किया है।
ऐसे में अब नेऊसा गांव निवासी संजय के लाडले सूरज की वीरता को कितना सम्मान मिल पाएगा, इसको लेकर संशय खड़ा हो गया है। फौरी मदद दिलाने के बाद स्थानीय प्रशासन के रवैये को हर आम और खास सराह रहा था, लेकिन अब उसकी बातों पर लोगों को अचरज है। स्थानीय प्रशासन की ओर से कहा जा रहा है कि सूरज की बहादुरी को लेकर कोई साक्ष्य नहीं उपलब्ध है। ऐसे में उसके लिए वीरता पुरस्कार से संबंधित पत्र नहीं लिखा जा सकता। जनप्रतिनिधियों से जब प्रशासन के इस रवैये को लेकर बात की गई तो उन्होंने इसे संवेदनहीनता ठहराया।
कई गवाह, फिर भी साक्ष्य का रोना
बड़ी बात यह है कि सूरज की बहादुरी को लेकर स्थानीय प्रशासन के अलावा कहीं कोई संशय नहीं है। दलगत राजनीति से इतर सभी बड़े नेताओं एवं जनप्रतिनिधियों ने उसकी बहादुरी की तहेदिल से प्रशंसा करते हुए उसके लिए वीरता पुरस्कार की सिफारिश की है। खुद जिलाधिकारी ने इस संबंध में तहसील प्रशासन से पत्र मिलने के बाद उसे संस्तुति सहित अग्रसारित करने की बात कही थी। लेकिन अब स्थानीय प्रशासन साक्ष्य नहीं होने की बात कह रहा है। जबकि इस मामले में दुर्घटना के बाद से ही सूरज के हाथों बचाए गए उसके सभी रिश्तेदार 14 वर्षीय इस किशोर की शौर्य गाथा गा रहे हैं। गांव के लोगों ने भी सूरज की बहादुरी पर गर्व जताया। इस वीर की बहादुरी के किस्से अखबारों ने भी प्रमुखता से छापे। लेकिन अब प्रशासन इन साक्ष्यों की जगह आखिर कौन से साक्ष्य तलाश रहा है, इस पर भी सवाल उठने लगे हैं।
कैसे दिए जाते हैं मरणोपरांत पुरस्कार
तहसील प्रशासन के संवेदनहीन बयानों के बाद सवाल खड़ा हो गया है कि आखिर मरणोपरांत वीरता पुरस्कार कैसे दिए जाते हैं। एक बहादुर किशोर की मौत के कारण उसकी वीरता पर तहसील प्रशासन सवालिया निशान लगा रहा है। साक्ष्य नहीं होने की बात कहते हुए अधिकारी कह रहे हैं कि जब वह खुद ही मर गया तो कैसी बहादुरी। सवाल यह भी है कि क्या वीरता के सभी मामलों में वीडियो रिकॉर्डिंग देखकर या फिर वीर के बयान के बाद ही पुरस्कार दिए जाते हैं।
सूरज ने कौन सा बहादुरी का काम किया है, जिसकी बात लोग कर रहे हैं। सूरज को वीरता पुरस्कार दिलाने के लिए कोई पत्र नहीं लिखा जा रहा है।
-अयोध्या प्रसाद, एसडीएम बांसी
तहसील प्रशासन ने पीड़ित परिवार को पूरी मदद मुहैया कराई है। पूरे घटनाक्रम में सूरज की ओर से बहादुरी दिखाने जैसा कोई साक्ष्य नहीं है। घटना में वह खुद भी मर चुका है।
-ओमप्रकाश गुप्ता, तहसीलदार बांसी
सूरज को वीरता पुरस्कार दिलाने के लिए अखबारों का संज्ञान लेकर मैं खुद शासन को पत्र लिखूंगा।  यदि तहसील प्रशासन पत्र नहीं लिखता है तो भी मैं सूरज की वीरता को सम्मानित करने के लिए संस्तुति करूंगा। जहां तक संभव होगा सूरज के परिवार की मदद की जाएगी।
-एमपी मिश्र, डीएम
ोये प्रशासन की संवदेनशून्यता की पराकाष्ठा है। यह प्रशासन की जिम्मेदारी है कि उसकी बहादुरी को लेकर साक्ष्य जुटाए। हैं। प्रशासन को गांव में जाकर लोगों से प्रतिक्रिया लेनी चाहिए। इस संबंध में जिलाधिकारी से मिलूंगा और सीएम को पत्र भी लिखूंगा।
-जगदंबिका पाल, सांसद
बहादुर की वीरता को सम्मान और परिवार को सहायता दिलाने के लिए प्रदेश सरकार को पत्र लिखा है। सूरज ने सात लोगों की जान बचाकर बहुत बहादुरी का काम किया है। उसकी वीरता पर सवाल उठाना संवेदन हीनता है। ऐसे अफसरों पर कार्रवाई होनी चाहिए। डीएम से बात करूंगा।
-माताप्रसाद, विधानसभा अध्यक्ष

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