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बौद्धकालीन धरोहर उपेक्षित

siddharthnagar Updated Tue, 17 Apr 2018 11:27 PM IST
उपेक्षा की मार झेल रहा सलारगढ़ का टीला।
उपेक्षा की मार झेल रहा सलारगढ़ का टीला। - फोटो : अमर उजाला
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सिद्धार्थनगर। महात्मा बुद्ध की जन्मस्थली पर ही उनकी अनमोल धरोहरों को संजोने में जिम्मेदार नाकाम साबित हो रहे हैं। हाल यह है कि हजारों वर्ष पुरानी बौद्धकालीन कई धरोहरें जिले में उपेक्षित हैं। पुरातत्व विभाग ने इन धरोहरों को संरक्षित श्रेणी में रखा है, बावजूद उनकी सुरक्षा और नियमित देख-रेख से बेपरवाह हैं। जिम्मेदारों का पूरा ध्यान सिर्फ पिपरहवा में स्थित स्तूप पर ही टिका हुआ है। उसके आस-पास स्थित अन्य बौद्धकालीन धरोहरों पर ध्यान नहीं है। खुले परिसर में सुरक्षा विहीन इन धरोहरों का तेजी से क्षरण हो रहा है, जिम्मेदार इससे बेखबर हैं।
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नेपाल सीमा पर स्थित कपिलवस्तु शाक्य गणराज्य की राजधानी और महात्मा बुद्ध की जन्मस्थली रही है। इसके आस-पास के क्षेत्र में कई चरणों में हुई खुदाई में तमाम बौद्धकालीन अवशेष प्राप्त हुए हैं। इसमें पिपरहवा स्थित स्तूप मुख्य है, जिसके नीचे से भगवान बुद्ध का अस्थि कलश भी पाया गया था। इसी से चंद मीटर दूर गनवरिया में राजप्रासाद (महल) के अवशेष मिले थे। सलारगढ़ में बौद्धकालीन इमारत, पिपरी में टीले के नीचे से मंदिर के अवशेष खुदाई में मिले हैं। लिहाजा इन क्षेत्रों को पुरातत्व विभाग ने विरासत मानते हुए संरक्षित घोषित किया है। प्रत्येक स्थल पर इसका बोर्ड भी लगा है, मगर इन संरक्षित क्षेत्रों की सुरक्षा भगवान भरोसे है। पिपरहवा स्तूप को छोड़ दें तो अन्य तीनों स्थल उपेक्षा के शिकार हैं। इनकी देख-रेख, सुरक्षा और संरक्षण के माकूल इंतजाम नहीं है। सबसे बुरी स्थिति सलारगढ़ की है। जहां बौद्धकालीन इमारत की न तो घेेरेबंदी की गई है और न ही सुरक्षा का ही कोई प्रबंध है।


धरोहरों का संक्षित परिचय और स्थिति :
गनवरिया : अस्सी के दशक में उत्खनन के दौरान यहां बौद्धकालीन कपिलवस्तु नगर का रिहायशी क्षेत्र होने के प्रमाण मिले थे। यहां मध्य में एक बड़ा कुआं भी है। कुल 26 कमरों वाले इस परिसर को किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति का आवास या कपिलवस्तु का राजप्रासाद (महल) होने का दावा किया गया है। इस पूरे क्षेत्र को संरक्षित घोषित करते हुए पुरातत्व विभाग ने बाउंड्री कर दी है। हालांकि इसके अलावा संरक्षण की कोई अन्य व्यवस्था नहीं है। परिसर में प्रवेश के बाद लोग इमारतों के ऊपर चहलकदमी करते रहते हैं। इससे प्राचीन पत्थरों की चमक धूमिल होती जा रही है। गाहे-बगाहे क्षेत्रीय मजदूरों के हाथों से इसकी साफ-सफाई करा दी जाती है।

पिपरी : बर्डपुर-कपिलवस्तु मार्ग पर पिपरी गांव में वर्ष 2014-15 में पुरातत्व विभाग ने खुदाई कराई थी। यहां एक टीले की खुदाई से मंदिर के अवशेष पाए गए थे। इसके बाद इस क्षेत्र को संरक्षित घोषित करते हुए घेरेबंदी कर दी गई थी। खुदाई के बाद से अंदर की स्थिति जस की तस है। मुख्य प्रवेश गेट पर तालाबंदी के कारण इस रास्ते से तो लोग अंदर नहीं जा पाते, मगर करीब पांच से छह फीट ऊंची बाउंड्री फांद कर बच्चे अक्सर अंदर घुस जाते हैं।

सलारगढ़ : मझौली सागर के पास स्थित इस क्षेत्र को भी पुरातत्व विभाग ने संरक्षित किया है। इस क्षेत्र को तत्कालीन अस्तबल की संज्ञा दी जाती है। संरक्षण के नाम पर यहां सिर्फ बोर्ड ही टंगा है। न कोई घेरेबंदी की गई और न ही कोई देख-रेख करने वाला है। ऐसे में लोग आसानी से टीले के पास तक जाकर छेड़छाड़ और खुदाई करते रहते हैं।

क्षेत्र में मौजूद बौद्धकालीन इमारतों को संरक्षित घोषित किया गया है। समय-समय पर इसकी साफ-सफाई होती रहती है। पिपरी, सलारगढ़ में पार्ट टाइम कर्मचारी नियुक्त हैं, जबकि गनवरिया व पिपरहवा के लिए स्थाई तैनाती है। संरक्षित क्षेत्रों की बाउंड्री की जा चुकी है। सलारगढ़ की बाउंड्री का प्रस्तावित है। गनवरिया में भी पिपरहवा की तरह गार्डन तैयार करने को पत्र लिखा गया है। पिपरी के लिए भी प्रयास किया जाएगा। -अखिलेश तिवारी, पुरातत्व सर्वेक्षण प्रभारी, श्रावस्ती मंडल।

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