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थाईलैंड से आए उपासकों ने की विशेष प्रार्थना
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आनंद बोधि पर प्रार्थना करते थाईलैंड से आए अनुयायी।
- फोटो : SRAWASTI
कटरा (श्रावस्ती)। बौद्ध तपोस्थली श्रावस्ती शुक्रवार को अनुयायियों से गुलजार रही। थाईलैंड से आए अनुयायियों ने आनंद बोधि पर पारंपरिक रीतिरिवाज में विश्व शांति के लिए विशेष पूजन किया। इसके बाद तपोस्थली के विभिन्न मूमेंटों का भ्रमण कर उनकी ऐतिहासिक जानकारी भी ली।
पूजन के दौरान बौद्ध भिक्षु दीपालोक महाथेरो ने कहा कि बुद्ध की शिक्षा अत्यंत व्यावहारिक है। उसमें किसी भी तरह के रहस्यों और आडंबरों के लिए कोई स्थान नहीं है। उनका चिंतन प्राणियों के व्यापक दुखों के कारण की खोज से प्रारंभ होता है। वह युवा जीवन के लिए दुखों के अत्यंत निरोध का उपाय ही बताते रहे।
उन्होंने ऐसे प्रश्नों का उत्तर देने से इंकार कर दिया जिसमें उन्हें अव्याकरणीय, अव्याख्येय करार दिखा। भगवान बुद्ध ने जिस धर्मचक्र का प्रवर्तन किया, अथवा जिस मार्ग का उन्होंने उपदेश किया। उसे मध्यमा प्रतिपद कहा जाता है। परस्पर विरोधी दो अंतों या अतियों का निषेध कर भगवान ने मध्यम मार्ग प्रकाशित किया है। मनुष्य का स्वभाव है कि वह बड़ी आसानी से किसी अंत में पतित हो जाता है। और उस अंत को अपना पक्ष बनाकर उसके प्रति आग्रहशील हो जाता है। यह ही सारे मानवीय विभेदों, संघर्षों और दुखों का मूल है।
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मध्यमा प्रतिपद अनाग्रहशीलता है, और समस्याओं से मुक्ति का सर्वोत्तम राजपथ हैं। इसका क्षेत्र अत्यंत व्यापक है। इसमें अनंत संभावनाएं निहित है। सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक समस्याओं के समाधान में भी इसकी उपयोगिता संभावित हैं। शील, समाधि और प्रज्ञा या दर्शन के क्षेत्र में ही उसकी प्राचीन व्याख्या उपलब्ध होती हैं। पूजन के दौरान बौद्ध भिक्षु आनंद सागर, धर्मसागर, सुखसागर, नागलोक, नाग ज्योति आदि मौजूद रहे।
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पूजन के दौरान बौद्ध भिक्षु दीपालोक महाथेरो ने कहा कि बुद्ध की शिक्षा अत्यंत व्यावहारिक है। उसमें किसी भी तरह के रहस्यों और आडंबरों के लिए कोई स्थान नहीं है। उनका चिंतन प्राणियों के व्यापक दुखों के कारण की खोज से प्रारंभ होता है। वह युवा जीवन के लिए दुखों के अत्यंत निरोध का उपाय ही बताते रहे।
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उन्होंने ऐसे प्रश्नों का उत्तर देने से इंकार कर दिया जिसमें उन्हें अव्याकरणीय, अव्याख्येय करार दिखा। भगवान बुद्ध ने जिस धर्मचक्र का प्रवर्तन किया, अथवा जिस मार्ग का उन्होंने उपदेश किया। उसे मध्यमा प्रतिपद कहा जाता है। परस्पर विरोधी दो अंतों या अतियों का निषेध कर भगवान ने मध्यम मार्ग प्रकाशित किया है। मनुष्य का स्वभाव है कि वह बड़ी आसानी से किसी अंत में पतित हो जाता है। और उस अंत को अपना पक्ष बनाकर उसके प्रति आग्रहशील हो जाता है। यह ही सारे मानवीय विभेदों, संघर्षों और दुखों का मूल है।
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मध्यमा प्रतिपद अनाग्रहशीलता है, और समस्याओं से मुक्ति का सर्वोत्तम राजपथ हैं। इसका क्षेत्र अत्यंत व्यापक है। इसमें अनंत संभावनाएं निहित है। सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक समस्याओं के समाधान में भी इसकी उपयोगिता संभावित हैं। शील, समाधि और प्रज्ञा या दर्शन के क्षेत्र में ही उसकी प्राचीन व्याख्या उपलब्ध होती हैं। पूजन के दौरान बौद्ध भिक्षु आनंद सागर, धर्मसागर, सुखसागर, नागलोक, नाग ज्योति आदि मौजूद रहे।