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विशेष वर्षावास पूजा में जुटे जापानी अनुयायी
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कटरा (श्रावस्ती)। जापान से 40 सदस्यीय दल सोमवार शाम बौद्ध तपोस्थली पहुंचा। दल में शामिल सदस्यों ने जहां गंध कुटि पर विशेष वर्षावास पूजा की, वहीं घंटा बजाकर विश्व शांति की कामना की।
जापान से 40 सदस्यीय दल सोमवार की शाम बौद्ध तपोस्थली श्रावस्ती पहुंचा। दल में शामिल सदस्यों ने गंध कुटि पर विशेष वर्षावास पूजा की। इसके बाद दल के सदस्य विश्व शांति घंटा पार्क पहुंचे। जहां उन्होंने भ्रमण कर ऐतिहासिक जानकारी प्राप्त की। वहीं घंटा बजाकर विश्व शांति की कामना भी की।
इस दौरान बौद्ध भिक्षुओं ने उपासकों को विश्व शांति घंटा की विशेषताएं बताईं। उन्होंने बताया कि यह घंटा जापान सरकार ने प्रदान किया था। यहां से दुनिया को शांति का संदेश मिला। इसी मान्यता के चलते यहां विश्व शांति घंटा लगाया गया था। भगवान बुद्ध के जीवन काल में यह कोशल देश की राजधानी थी।
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इसे बुद्ध कालीन भारत के छह महानगरों चंपा, राजगृह, श्रावस्ती, साकेत, कोशांबी व वाराणसी में से एक माना जाता था। श्रावस्ती के नाम के विषय में कई मत प्रतिपादित है। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार अवत्थ श्रावस्ती नामक एक ऋषि यहां रहते थे। जिनके नाम के आधार पर इस नगर का नाम श्रावस्त पड़ गया था।
महाभारत के अनुसार श्रावस्ती नाम श्रावस्त नाम के एक राजा के नाम पर पड़ा। ब्राह्मण साहित्य, महाकाव्यों एवं पुराणों के अनुसार श्रावस्त का नामकरण श्रावस्त या श्रावास्तक के नाम के आधार पर हुआ था। श्रावास्तक युवनाय का पुत्र था ओर पृथु की छठी पीढ़ी में उत्पन्न हुआ था।
वही इस नगर के जन्मदाता थे ओर उन्हीं के नाम पर इसका नाम श्रावस्ती पड़ गया। महाकाव्यों एवं पुराणों में श्रावस्ती को राम के पुत्र लव की राजधानी बताया गया है। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार यहां 57 हजार लोग रहते थे। कौशल नरेशों की आमदनी सबसे ज्यादा इसी नगर से हुआ करती थी।
यह चौड़ी गहरी खाई से घिरा हुआ था। इसके अतिरिक्त इसके इर्द गिर्द एक सुरक्षा दीवार थी। जिसमें हर दिशा में दरवाजे बने हुए थे। हमारी प्राचीन कला में श्रावस्ती के दरवाजों का अंकन हुआ है। चीनी यात्री फाहयान ओर हवेनसांग ने भी श्रावस्ती के दरवाजों का उल्लेख किया है। इस मौके पर काफी संख्या में अनुयायी मौजूद रहे।
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जापान से 40 सदस्यीय दल सोमवार की शाम बौद्ध तपोस्थली श्रावस्ती पहुंचा। दल में शामिल सदस्यों ने गंध कुटि पर विशेष वर्षावास पूजा की। इसके बाद दल के सदस्य विश्व शांति घंटा पार्क पहुंचे। जहां उन्होंने भ्रमण कर ऐतिहासिक जानकारी प्राप्त की। वहीं घंटा बजाकर विश्व शांति की कामना भी की।
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इस दौरान बौद्ध भिक्षुओं ने उपासकों को विश्व शांति घंटा की विशेषताएं बताईं। उन्होंने बताया कि यह घंटा जापान सरकार ने प्रदान किया था। यहां से दुनिया को शांति का संदेश मिला। इसी मान्यता के चलते यहां विश्व शांति घंटा लगाया गया था। भगवान बुद्ध के जीवन काल में यह कोशल देश की राजधानी थी।
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इसे बुद्ध कालीन भारत के छह महानगरों चंपा, राजगृह, श्रावस्ती, साकेत, कोशांबी व वाराणसी में से एक माना जाता था। श्रावस्ती के नाम के विषय में कई मत प्रतिपादित है। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार अवत्थ श्रावस्ती नामक एक ऋषि यहां रहते थे। जिनके नाम के आधार पर इस नगर का नाम श्रावस्त पड़ गया था।
महाभारत के अनुसार श्रावस्ती नाम श्रावस्त नाम के एक राजा के नाम पर पड़ा। ब्राह्मण साहित्य, महाकाव्यों एवं पुराणों के अनुसार श्रावस्त का नामकरण श्रावस्त या श्रावास्तक के नाम के आधार पर हुआ था। श्रावास्तक युवनाय का पुत्र था ओर पृथु की छठी पीढ़ी में उत्पन्न हुआ था।
वही इस नगर के जन्मदाता थे ओर उन्हीं के नाम पर इसका नाम श्रावस्ती पड़ गया। महाकाव्यों एवं पुराणों में श्रावस्ती को राम के पुत्र लव की राजधानी बताया गया है। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार यहां 57 हजार लोग रहते थे। कौशल नरेशों की आमदनी सबसे ज्यादा इसी नगर से हुआ करती थी।
यह चौड़ी गहरी खाई से घिरा हुआ था। इसके अतिरिक्त इसके इर्द गिर्द एक सुरक्षा दीवार थी। जिसमें हर दिशा में दरवाजे बने हुए थे। हमारी प्राचीन कला में श्रावस्ती के दरवाजों का अंकन हुआ है। चीनी यात्री फाहयान ओर हवेनसांग ने भी श्रावस्ती के दरवाजों का उल्लेख किया है। इस मौके पर काफी संख्या में अनुयायी मौजूद रहे।