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रेत को खेत बनाकर किसान कमा रहे लाखों रुपये
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श्रावस्ती। राप्ती के रेत में इस समय चारों तरफ हरियाली ही हरियाली है। किसान रेत को खेत बनाकर इससे लाखों रुपये कमा रहे हैं। यहां किसान आर्गेनिक व शून्य लागत पर खीरा, ककड़ी, लौकी, कद्दू, करैला, तरबूज व खरबूज पैदा कर रहे हैं। यहां किसान तीन माह की खेती से पूरे साल का खर्चा निकाल रहे हैं।
राप्ती नदी को वैसे तो श्रावस्ती का शोक कहा जाता है। यहां बाढ़ के समय हजारों ग्रामीण बेघर हो जाते हैं। खेतों में लगी फसल तबाह हो जाती है। लेकिन यह मात्र तीन महीने बरसात के समय ही होता है। इसके बाद राप्ती नदी की रेत सोना उगलने लगती है। रेत में किसान शून्य लागत पर तीन माह के अंदर लाखों कमा लेते हैं। किसान राप्ती की रेत में सब्जी व फल उगाते हैं। इस फसल पर न तो किसी खाद की जरूरत है। न ही किसी कीटनाशक की, पानी भी नदी से मुफ्त मिल जाता है। खाद की आवश्यकता इसलिए नहीं होती कि बाढ़ के बाद पूरी रेत में गाद जमा होती है। जिसका लाभ किसान उठाते हैं।
कहने को तो यह रेत है। लेकिन बाढ़ के समय आई गाद इसकी उर्वरा शक्ति बढ़ा देता है। इसलिए केवल किसानों को इस रेत में बीज डालने की आवश्यकता होती है। वहीं जब पानी की आवश्यकता होती है। तो राप्ती नदी से पानी यहां पहुंचा दिया जाता है। कीटनाशक का उपयोग यहां न के बराबर होता है। इसीलिए पूरी पैदावार आर्गेनिक ही होती है। यहां एक पौधे से 50 से 100 फल तक मिल जाते हैं। हर पौधे से तीन दिन के बाद फल तोड़े जाते हैं। यहां मुख्यत: तरबूज, खरबूजा, लौकी, तरोई, करेला जैसी लता वाली सब्जियों और फलों की ही खेती होती है।
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राप्ती के किनारे खेती करने वाले विनोद कुमार निषाद का कहना है कि हर साल नवंबर माह में जब राप्ती का पानी घटने लगता है तो हम लोग रेत को खेती के योग्य बनाने लगते हैं। आशाराम पटेल का कहना है कि पहले रेत को बराबर कर जमीन को समतल बनाया जाता है। इसके बाद डेढ़ से दो फिट गहरी बड़ी-बड़ी नालियां बनाई जाती हैं। इन नालियों में एक तरफ बीज बो दिए जाते हैं। रामसमुझ बताते हैं कि तरबूज की फसल नवंबर में बोई थी। अप्रैल में फसल तैयार हो गई थी। रेत में खेती करना मेहनत का काम है। लेकिन पैदावार अच्छी होती है।
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राप्ती नदी को वैसे तो श्रावस्ती का शोक कहा जाता है। यहां बाढ़ के समय हजारों ग्रामीण बेघर हो जाते हैं। खेतों में लगी फसल तबाह हो जाती है। लेकिन यह मात्र तीन महीने बरसात के समय ही होता है। इसके बाद राप्ती नदी की रेत सोना उगलने लगती है। रेत में किसान शून्य लागत पर तीन माह के अंदर लाखों कमा लेते हैं। किसान राप्ती की रेत में सब्जी व फल उगाते हैं। इस फसल पर न तो किसी खाद की जरूरत है। न ही किसी कीटनाशक की, पानी भी नदी से मुफ्त मिल जाता है। खाद की आवश्यकता इसलिए नहीं होती कि बाढ़ के बाद पूरी रेत में गाद जमा होती है। जिसका लाभ किसान उठाते हैं।
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कहने को तो यह रेत है। लेकिन बाढ़ के समय आई गाद इसकी उर्वरा शक्ति बढ़ा देता है। इसलिए केवल किसानों को इस रेत में बीज डालने की आवश्यकता होती है। वहीं जब पानी की आवश्यकता होती है। तो राप्ती नदी से पानी यहां पहुंचा दिया जाता है। कीटनाशक का उपयोग यहां न के बराबर होता है। इसीलिए पूरी पैदावार आर्गेनिक ही होती है। यहां एक पौधे से 50 से 100 फल तक मिल जाते हैं। हर पौधे से तीन दिन के बाद फल तोड़े जाते हैं। यहां मुख्यत: तरबूज, खरबूजा, लौकी, तरोई, करेला जैसी लता वाली सब्जियों और फलों की ही खेती होती है।
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राप्ती के किनारे खेती करने वाले विनोद कुमार निषाद का कहना है कि हर साल नवंबर माह में जब राप्ती का पानी घटने लगता है तो हम लोग रेत को खेती के योग्य बनाने लगते हैं। आशाराम पटेल का कहना है कि पहले रेत को बराबर कर जमीन को समतल बनाया जाता है। इसके बाद डेढ़ से दो फिट गहरी बड़ी-बड़ी नालियां बनाई जाती हैं। इन नालियों में एक तरफ बीज बो दिए जाते हैं। रामसमुझ बताते हैं कि तरबूज की फसल नवंबर में बोई थी। अप्रैल में फसल तैयार हो गई थी। रेत में खेती करना मेहनत का काम है। लेकिन पैदावार अच्छी होती है।