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मोबाइल टॉवर के रेडिएशन से घट रहा शहद उत्पादन
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श्रावस्ती। टॉवरों का जगह जगह बिछा जाल, शहद उत्पादकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा है। इन मोबाइल टॉवरों से निकल रहे रेडिएशन के कारण मधुमक्खियां या तो पलायन कर गईं या फिर खत्म हो रही हैं। इन्हीं कारणों से जहां पहले भिनगा जंगल को शहद का केंद्र माना जाता था, वहीं अब यहां शहद का छत्ता ढूंढे नहीं मिल रहा है।
भिनगा के जंगलों से निकलने वाली शहद की मिठास कभी लखनऊ, कानपुर व गाजियाबाद जैसे शहरों तक पहुंचती थी। शहद संग्रह के लिए वन विभाग बाकायदा टेंडर निकालता था। लाखों रुपये का राजस्व भी मिलता था। जंगल से संग्रहीत शहद में औषधीय गुण होने के कारण इसकी मांग भी खूब थी। अब भिनगा नगर व जंगल के किनारे लगभग चौदह मोबाइल टॉवर खड़े हो गए हैं। यहां तक कि कुछ मोबाइल टॉवरों की जंगल से दूरी 100 मीटर भी नहीं है। टॉवरों से निकलने वाले रेडिएशन का दुष्प्रभाव जंगल में मधुमक्खियों पर भी पड़ा। इसी के चलते जहां भिनगा, ककरदरी व अवध रखौना जंगली क्षेत्र में मधुमक्खियों के 35-40 किलो वजन के छत्ते दिखाई देते थे, वहीं अब कहीं-कहीं ही छत्ते देखने को मिल रहे हैं।
कई वर्षों से भिनगा जंगल में शहद संग्रह का कार्य कर रहे भिनगा नगर निवासी जगजीवन बताते हैं कि पंद्रह वर्ष पूर्व से वह इस जंगल से शहद ले जा रहे हैं। जंगल के अंदर की सड़क पटरी को छोड़ते ही बड़े-बड़े छत्ते दिखाई देते थे। यहां तक कि जंगल के अंदर पाकड़ के एक पेड़ में प्रति वर्ष 60-65 छत्ते लगते थे। इन्हीं छत्तों से निकले शहद से ठेकेदार की पूंजी निकल आती थी। अब जंगल में दिनभर घूमने के बाद 15-20 किलो शहद ही दिनभर में एकत्र हो पाता है। आईटी से जुड़े कुछ विशेषज्ञों की मानें तो मधुमक्खियों की तादाद में हो रही कमी का कारण टॉवर से निकलने वाला रेडिएशन है। आईटी जानकारों की बात सही निकली तो कुछ दिन में भिनगा के जंगल की मिठास ढूंढे नहीं मिलेगी। इस संबंध में डीएफओ एपी यादव बताते हैं कि छत्तों की संख्या में कमी तो आई है, लेकिन यह कमी कितनी है इसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है। मधुमक्खियों की कमी का कारण भी वह स्पष्ट रूप से नहीं बता सके ।
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मधुमक्खियां चलते समय आवाज निकालती है। यह आवाज एक सिग्नल होता है। इसी से वह अपना रास्ता तय करती हैं। मोबाइल टॉवरों से इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेज निकलती हैं। इसका प्रभाव मधुमक्खियों के सिग्नल पर पड़ता है। इसी के साथ पक्षियों पर भी प्रभाव पड़ता है जिससे उनकी मौत भी हो सकती है।
- डॉ. जेपी सिंह, आईटी विशेषज्ञ
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भिनगा के जंगलों से निकलने वाली शहद की मिठास कभी लखनऊ, कानपुर व गाजियाबाद जैसे शहरों तक पहुंचती थी। शहद संग्रह के लिए वन विभाग बाकायदा टेंडर निकालता था। लाखों रुपये का राजस्व भी मिलता था। जंगल से संग्रहीत शहद में औषधीय गुण होने के कारण इसकी मांग भी खूब थी। अब भिनगा नगर व जंगल के किनारे लगभग चौदह मोबाइल टॉवर खड़े हो गए हैं। यहां तक कि कुछ मोबाइल टॉवरों की जंगल से दूरी 100 मीटर भी नहीं है। टॉवरों से निकलने वाले रेडिएशन का दुष्प्रभाव जंगल में मधुमक्खियों पर भी पड़ा। इसी के चलते जहां भिनगा, ककरदरी व अवध रखौना जंगली क्षेत्र में मधुमक्खियों के 35-40 किलो वजन के छत्ते दिखाई देते थे, वहीं अब कहीं-कहीं ही छत्ते देखने को मिल रहे हैं।
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कई वर्षों से भिनगा जंगल में शहद संग्रह का कार्य कर रहे भिनगा नगर निवासी जगजीवन बताते हैं कि पंद्रह वर्ष पूर्व से वह इस जंगल से शहद ले जा रहे हैं। जंगल के अंदर की सड़क पटरी को छोड़ते ही बड़े-बड़े छत्ते दिखाई देते थे। यहां तक कि जंगल के अंदर पाकड़ के एक पेड़ में प्रति वर्ष 60-65 छत्ते लगते थे। इन्हीं छत्तों से निकले शहद से ठेकेदार की पूंजी निकल आती थी। अब जंगल में दिनभर घूमने के बाद 15-20 किलो शहद ही दिनभर में एकत्र हो पाता है। आईटी से जुड़े कुछ विशेषज्ञों की मानें तो मधुमक्खियों की तादाद में हो रही कमी का कारण टॉवर से निकलने वाला रेडिएशन है। आईटी जानकारों की बात सही निकली तो कुछ दिन में भिनगा के जंगल की मिठास ढूंढे नहीं मिलेगी। इस संबंध में डीएफओ एपी यादव बताते हैं कि छत्तों की संख्या में कमी तो आई है, लेकिन यह कमी कितनी है इसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है। मधुमक्खियों की कमी का कारण भी वह स्पष्ट रूप से नहीं बता सके ।
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मधुमक्खियां चलते समय आवाज निकालती है। यह आवाज एक सिग्नल होता है। इसी से वह अपना रास्ता तय करती हैं। मोबाइल टॉवरों से इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेज निकलती हैं। इसका प्रभाव मधुमक्खियों के सिग्नल पर पड़ता है। इसी के साथ पक्षियों पर भी प्रभाव पड़ता है जिससे उनकी मौत भी हो सकती है।
- डॉ. जेपी सिंह, आईटी विशेषज्ञ